सौ दिन चले अढ़ाई कोस | Jokhim News

Thursday, November 23, 2017

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सौ दिन चले अढ़ाई कोस

पूरे तामझाम के साथ अपने सौ दिन के कामकाज को जनता की अदालत में रखने के लिऐ आगे आये त्रिवेन्द्र सिंह रावत ।
उत्तराखंड की नवगठित भाजपा सरकार अपने सौ दिन के कामकाज का लेखा-जोखा जनता की अदालत में रखने को बेताब नजर आ रही है और इसके लिऐ पूरी तैयारी के साथ मैदान में उतरे त्रिवेन्द्र सिंह रावत के पास जनता को रिझाने के लिऐ स्मार्ट सिटी व लोकपाल के गठन या स्थानातंरण विधेयक जैसे तमाम शिगूफे है लेकिन अगर हकीकत में देखा जाय तो अपने अस्तित्व में आने के साथ ही तमाम तरह के जनान्दोलनों का दंश झेल रही त्रिवेन्द्र सिंह रावत के नेतृत्व वाली इस सरकार के समक्ष प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में आन्दोलनरत् शराब विरोधी महिलाओं को शांत करना तथा अपने अंधकारमय भविष्य के लिऐ संघर्ष कर रहे लगभग पाँच हजार पांच सौ अतिथि शिक्षकों से निपटना एक बड़ी चुनौती है। इसके अलावा विपक्ष पर राजकोष खाली करने का आरोंप लगाते हुऐ केन्द्र सरकार के डबल इंजन का भरोसा देकर जनता को यह अस्वस्त करना कि उसके द्वारा चुनी गयी पूर्ण बहुमत की सरकार व्यापक जनहित में पूरी तरह प्रयास कर रही है, सत्ता पक्ष की मजबूरी भी है और आगामी लोकसभा चुनावों के मद्देनजर भाजपा की जरूरत भी और इसके लिऐ समय-समय पर इस तरह के आयोजनों के माध्यम से ही संदेश आगे बढ़ाया जा सकता है लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकारी तंत्र के भरोसे और नौकरशाही की भाषा में लिखे संदेशों के दम पर कोई भी सरकार अपनी उपलब्धियाँ, काम करने का तरीका व आगामी योजनाऐं जनपक्ष के सामने रखकर जनता की प्रतिक्रिया व अपेक्षा जान सकती है। मौजूदा ढ़ाँचे में यह सबकुछ इतनी आसानी से संभव नहीं लगता और शायद यहीं वजह भी है कि छोटे राज्यों में लगातार पांच साल सरकार चलाने के बाद नेता व सत्ताधारी दल जनता की नजरों में खटकनें लगता है तथा सत्ता के तख्त पलट को नियति का खेल मानकर स्वीकार कर लिया जाता है लेकिन सवाल यह है कि क्या सत्ता के शीर्ष पर काबिज कोई दल या व्यक्ति यह चाहता है कि वह अपनी शक्तियों व समय का पूरा सद्पयोग न कर ऐसे हालात पैदा करें कि आने वाले इतिहास में उसे कोसा जाये। जानकारी का आभाव व अवसरों की कमी ऐसे हालात पैदा कर देते है कि सरकारी तंत्र चाहकर भी उस लक्ष्य को हासिल नही कर पाता जो कि एक चुनौती के रूप में उसने स्वीकार किया था तथा नौकरशाही के भरोसे चल रही उत्तराखंड की राजनीति में नेताओं से झूठे आश्वासन दिलवाकर कानूनी प्रक्रियाओं व संवैधानिक दायित्वों का मजाक उड़ाने में मास्टरी कर चुकी आईएस लाॅबी बार-बार ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करती है कि सरकार को जाने अनजाने में शर्मिन्दा होना पड़ता है लेकिन कमाल की बात है इन गलतियों के लिऐ किसी वरीष्ठ अधिकारी को दण्डित होते नही देखा गया है बल्कि अगर इतिहास पर नजर डाले तो विपक्ष में रहकर इन अफसरों की कार्यशैली का विरोध करने वाले नेता व राजनैतिक दल सत्ता को शीर्ष को हासिल करते ही इन्हें उपकृत करते नजर आते है। ऐसा ही कुछ इन पिछले सौ दिनों में भी हुआ है और इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि सत्ता पर कब्जेदारी के इन शुरूवाती सौ दिनों में ही ढ़ैचा बीज घोटाले के आरोंपो से मुक्त होने की जल्दबाजी में मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने न सिर्फ वरीष्ठ नौकरशाह ओमप्रकाश को भी बेदाग साबित कर दिया है बल्कि वर्तमान में वह उत्तराखंड सरकार के सबसे ताकतवर अधिकारी साबित हो रहे है। कहने का तात्पर्य यह है कि बदली हुई प्राथमिकताओं के साथ सत्ता के शीर्ष पर काबिज भाजपा हाल-फिलहाल पहाड़ों से होने वाले पलायन, शिक्षा की बदहाल व्यवस्था, प्रदेश में चरमराती स्वास्थ्य व्यवस्था या फिर पेयजल, विद्युत आपूर्ति और चरमराती सड़क यातायात सुविधाओं के कारण पिछले दिनों सामने आयी तमाम सड़क दुर्घटनाओ व इनसे होने वाली मानवीय क्षति के बारे में कुछ भी कहने के मूड में नही है और न ही इन तमाम समस्याओें का प्राथमिकता के आधार पर सामाधान किया जाना अब सरकार को जरूरी लगता है । उपरोक्त के स्थान पर सरकार विद्यालयों में अध्यापकों के लिऐ ड्रेस कोड निर्धारित करने या फिर महिला अध्यापिकाओं को साड़ी पहनाकर प्रदेश के तमाम महाविद्यालयों में छात्र-छात्राओं के लिऐ ड्रेस कोड निर्धारित करते हुऐ छात्र संघ चुनावों पर पाबन्दी लगाने जैसी प्राथमिकताओं पर काम कर रही है तथा राजस्व वसूली के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिऐ देशी व अंग्रेजी शराब की सुदूरवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों व ग्रामीण आँचलों में उपलब्धता सुनिश्चित कराया जाना उसके लक्ष्य मेें शामिल हो गया है। इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिऐ शराब की दुकानों के बाहर सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित किया जाना व दुकानों के लिऐ जगह की अनउपलब्धता पर मोबाइल वैनो में शराब बेचा जाना सरकार को जरूरी लग रहा है और सरकारी तंत्र पूरी एकजुटता के साथ इन लक्ष्यों को प्राप्त करने में जुटा हुआ है। लक्ष्य प्राप्ति की राह में बाधा मानी जा रही महिला आन्दोलनकारियों पर धड़ल्ले से मुकदमें दर्ज कर उन्हें डराया व धमकाया जा रहा है तथा वाहवाही लूटने की नीयत से किये गये ‘निजी स्कूलों द्वारा पुनः प्रवेश शुल्क वापस किये जाने या फिर अभिभावकों को तयशुदा दुकानों से किताबें खरीदने के लिऐ बाध्य करने जैसे‘ तमाम आदेश हवा में उड़ाये जा चुके है। यह ठीक है कि शौचालय मुक्त घोषित किया जा चुका उत्तराखंड खुद में एक बड़ी उपलब्धि है लेकिन बरसात के इस मौसम में उफनती नालियाँ व चोक हो चुकी सीवर लाइनों से होता गंदे पानी का रिसाव, यत्र-तत्र लगे कूड़े के ढ़ेरो के साथ सरकारी तंत्र को मुँह चिढाता प्रतीत हो रहा है। यह स्थिति किसी एक शहर या कस्बे की नही है बल्कि सम्पूर्ण प्रदेश का कमोवश यहीं हाल है और इसे उदाहरण की तरह प्रस्तुत करते हुऐ ग्रामीण अंचलों के नेता प्रदेश के लगभग हर कोने में नगर पंचायत, नगर निगम या नगर पालिका के सीमा विस्तार का विरोध कर रहे है। हाँ इतना जरूर है कि पिछले दिनों राजधानी देहरादून में अतिक्रमण के खिलाफ बजा सरकारी डण्डा तथा एक बड़ी कार्यवाही के बावजूद अपने फैसले पर अड़ी सरकार जनता को ढ़ांहस बंधाने में कामयाब जरूर रही है और यह माना जा रहा है कि एक पूर्ण बहुमत सरकार के राजनीति से हटकर लिये गये कुछ ऐसे फैसले उत्तराखंड की तस्वीर संभाल सकते है। उपरोक्त के आलावा भाजपा में इतने दिग्गजों की मौजूदगी के बावजूद शीर्ष स्तर पर तालमेल कायम रखते हुये सामजस्य बनाये रखना तथा तमाम विरोधाभास के बावजूद राज्य सरकार के सलाना बजट को विधानसभा के माध्यम से पारित करते हुये जनता की अदालत में रखना समेत ऐसी तमाम अनेक उपलब्धियाँ है जिनसे जनता को भले ही कुछ हासिल न हो लेकिन इनका प्रचार-प्रसार सौ दिन के सरकारी कामकाज को एक संतुष्टि प्रदान जरूर करेंगा। लिहाजा तैयार हो जाईये सरकार अपनी सौ दिन की उपलब्धियों के साथ आपके द्वार पहुंच रही है।

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