अतिक्रमण के खिलाफ | Jokhim News

Friday, August 18, 2017

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अतिक्रमण के खिलाफ

एक मुहिम के अंदाज में राजधानी दून से हुआ यह आगाज काबिलेतारीफ।
उत्तराखंड सरकार के शहरी विकास मंत्री मदन कौशिक ने प्रदेश की राजधानी दून में बेतरतीब तरीकें से बढ़ रहे अतिक्रमण को लेकर एक अच्छी पहल की है और अच्छी बात यह है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत समेत राजधानी देहरादून के अन्य तमाम विधायकों व भाजपा के अन्य जिम्मेदार पदाधिकारियों ने शहरी विकास मंत्रालय की इस कार्यवाही में टांग अड़ाने या फिर सरकारी कामकाज में बाधा डालने का कोई प्रयास नही किया है। हांलाकि सरकार द्वारा एक ही झटके में अंजाम दी गयी इस कार्यवाही के खिलाफ राजधानी के व्यापारियों ने बंद का आवहन किया है और व्यापारी समुदाय में भाजपा की ठीक-ठाक पैठ को देखते हुऐ भाजपा के कुछ नेता आगे से इस तरह की कोई भी कार्यवाही अंजाम दिये जाने से पहले व्यापारी वर्ग को विश्वास में लिये जाने के नाम पर अतिक्रमण को लेकर किये जा रहे फैसलों की रफ्तार धीमी करने की कोशिशों में जुट गये है लेकिन आम जनता के नजरिये से देखे तो जनता सरकार के इस फैसले से खुश दिखाई दे रही है और कुछ उत्साही नौजवानों ने अतिक्रमण के खिलाफ इस सरकारी कार्यवाही को उत्तराखंड की पूर्ण बहुमत वाली भाजपा सरकार द्वारा अपने कार्यकाल के शुरूवाती सौ दिनोें में हासिल की गयी पहली बड़ी उपलब्धि का दर्जा दिया है। यह ठीक है कि सरकार द्वारा एक अभियान की तर्ज पर की गयी इस तोड़-फोड़ के चलते कुछ सौ परिवारों के लिऐ रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया और ठीक रमजान के महिने में ईद के बिल्कुल नजदीक हुई इस कार्यवाही से कुछ परिवारों का त्योंहारी आनन्द प्रभावित होना भी तय है लेकिन अगर वाकई में देखा जाय तो इसके लिऐ सरकारी दोषी नही है बल्कि सरकारी तंत्र द्वारा समय-समय पर अतिक्रमणकारियों को चेतावनी व अतिक्रमण हटाने की सलाह देकर अवैध निर्माण पर अंकुश लगाने की कोशिश की जाती रही है और अतिक्रमणकारियों को मिलने वाली राजनैतिक शह ने हमेशा ही उनके हौसले बुलन्द किये है। उत्तराखंड राज्य के इतिहास में यह पहला किस्सा है जब सरकार ने वाकई में दिलेरी से काम लिया है और राजनैतिक नफे-नुकसान का आंकलन छोड़कर पूरी ईमानदारी के साथ लक्ष्य तक पहुंचने की कोशिशें शुरू हुई है लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार का यह हौसला ठीक इसी तरह कायम रहेगा और सरकार प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में लगातार घनी होती जा रही तमाम अवैध बस्तियों व छुटभय्यै नेताओं द्वारा पैसे लेकर सरकारी जमीन पर बसायी गयी रिहायशी कालोनियों के मामले में भी अपनी यह मुहिम जारी रखेेगी। अगर वाकई ऐसा होता है तो छोटे-मोटे आन्दोलनों या फिर एक-दो दिन के बंद के बाद कई व्यवस्थाऐं अपने आप ढ़र्रे पर आ जायेंगी और राज्य में अमनो सुकून चाहने वाली जनता, वर्तमान सरकार की जय-जयकार कर उठेगी लेकिन सवाल यह है कि इन अवैध बस्तियो व नाजायज कालोनियों को अपना वोट-बैंक मानने वाले नेता क्या इस तरह की कार्यावाहियों को आसानी से अंजाम तक पहुंचने देंगे और शहरी व कस्बाई क्षेत्रों में रहने वाली सामान्य जनता सड़कों पर लगने वाले जाम के चलते लगातार बढ़ते जा रहे प्रदूषण से निजात पा सकेगी। वैसे देखा जाये तो यह सबकुछ नियमतः व कानूनी रूप से आसान लगता है और हमारे न्यायालय व ज्वलन्त समस्याओं को लेकर जनहित याचिकाऐं दायर करने वाले कुछ जांबाज किस्म के लोग इन दिशाओं में जनता व सरकारी तंत्र का ध्यान आकृर्षित करते रहते है लेकिन राजनैतिक लालच व कभी कभी मानवीय दृष्टिकोण से भी इस प्रकार की समस्याओं का निदान आसान नही रह जाता और न ही व्यापक जनहित के नाम पर बनने वाली सरकारें इस प्रकार की कार्यवाहियों को अंजाम देने से पहले अथवा बाद प्रभावित जनता के आवास या रोजगार की दृष्टि से उसके पुर्नवास को लेकर उत्सुक नजर आती है। हालातों के मद्देनजर व्यापक जनहित के नजरियें से की जाने वाली इस प्रकार की तमाम कार्यवाहियों के बावजूद इस तरह के मामलों में सरकार की छवि तानाशाह सी बन जाती है और प्रभावित लोगों के पक्ष में खड़ा जन समूह यह संदेश देने का प्रयास करता है कि सरकार उसके साथ अत्याचार कर रही है लेकिन राजधानी देहरादून में सामने आये इस घटनाक्रम में सरकार की वाहवाही हो रही है और व्यापारी एकता की बदौलत एक सफल बंद के आयोजन के बावजूद यह नही माना जा सकता कि पीड़ित पक्ष सरकार की कार्यवाही को रोकने, प्रभावित करने या फिर जनता को अपने पक्ष में आन्दोलित करने में सफल रहा है जबकि इस एक कार्यवाही को अंजाम देने के बाद वर्तमान तक प्रभावी फैसले लेने के मामले में असफल बतायी जा रही त्रिवेन्द्र सिंह रावत के काम करने के तरीके को लेकर तारिफे हो रही है और ऐसा प्रतीत हो रहा है कि अपने सौ दिन के कार्यकाल की उपलब्ध्यिाँ जनता तक पहुंचाने के लिऐ बेताब नजर आ रही सरकार को राजधानी देहरादून की जनता के सवालों का जवाब देने का वाजिब बहाना मिल गया है। यकीन जानियें कि अगर सरकार इसी तरह के अन्य छोटे-छोटे फैसलेे लेकर प्रदेश के अन्य हिस्सों में भी जनता की समस्याओं समाधान की दिशा में न्यायोचित कदम उठाये तो न सिर्फ भाजपा का राजनैतिक आधार मजबूत होगा बल्कि बेतरतीब तरीके से बस रहे उत्तराखंड के तमाम शहरों व कस्बाई क्षेत्रों में अतिक्रमण,सड़क के जाम व एक क्षेत्र विशेष में बढ़ते दिख रहे जनसंख्या के दबाव जैसी समस्याओं पर काबू पाया जा सकेगा। राजधानी देहरादून समेत उत्तराखंड के विभिन्न नगरों व कस्बाई इलाकों को पर्यटन से जोड़ने के लिये जरूरी है कि इन क्षेत्रों की साफ-सफाई व्यवस्था का विशेष ध्यान रखा जाय और साफ-सफाई को बनाये रखने व शहरों या कस्बों को व्यवस्थित रूप से बसाने के लिऐ जरूरी है कि अतिक्रमण व अवैध बस्तियों के निर्माण को हतोत्साहित किया जाय। इस नवगठित राज्य में देखा जा सकता है कि यहाँ अपराध तेजी से बढ़ रहे है और तेजी से फेल रहे शहर व कस्बे देश ही नही बल्कि विदेशों से आने वाले आंतकियों व अपराधियों की शरणगाह बनते जा रहे है। इन हालातों में यह जरूरी है कि सरकार दूसरे राज्यों अथवा अनजान जगहों से आकर उत्तराखंड में बसने की कोशिश करने वाले परिवारों, श्रमिकों, छात्र-छात्राओं व अन्य धन्देबाजों पर नजर बनाये रखे और यह तभी संभव है जबकि प्रदेश के तमाम वैध-अवैध निर्माणों व रिहायशी इलाकों पर सरकारी तंत्र की पैनी नजर हो। इसलिऐं सरकारी तंत्र को चाहिऐं कि वह और ज्यादा तेजी के साथ अतिक्रमण व अवैध कब्जों को खाली कराने की अपनी मुहिम चलाये तथा जनसामान्य को यह अनुभूति दे कि सरकार की कोशिश राज्य को वाकई रामराज्य की ओर ले जाने की है।

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