राजनैतिक कलाबाजियों के बीच | Jokhim News

Sunday, July 23, 2017

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राजनैतिक कलाबाजियों के बीच

आखिरकार निपट ही गया उत्तराखंड की पूर्ण बहुमत सरकार का बजट सत्र उत्तराखंड सरकार द्वारा वर्ष 2017-18 का बजट विधानसभा के माध्यम से पारित किया जा चुका है और सरकार स्थानांतरण विधेयक व लोकपाल विधेयक सदन पटल पर रखकर अपनी सौ दिन की उपलब्धि के रूप में जनता के बीच जाने का मन बना रही है। इन दोनों महत्वपूर्ण विधेयकों पर सदन में कब चर्चा होगी और यह कब तक यह कानून के रूप में सामने आयेंगे, इस संदर्भ में अभी कोई निश्चित घोषणा नही की जा सकती लेकिन सरकार इन मसलों पर वाहवाही लूटने का मन बना चुकी है और सरकार ने एक ही झटके में त्रिपाठी आयोग की रिपोर्ट सदन पटल पर रखकर अपने मुख्यमंत्री पर लगातार लग रहे ढ़ैंचा बीज घोटाले के आरोंपो से फौरी तौर पर राहत पा ली है। हांलाकि घोटाले का यह जिन्न दोबारा बाहर निकलेगा या नहीं या फिर इस सरकार के कार्यकाल में भी लोकायुक्त का गठन हो पायेगा या नही, यह तमाम सवाल भविष्य के गर्भ में है और राजनेताओं व राजनीति के स्वभाव को जानने वाली जनता हाल-फिलहाल इस तरह की बहस में उलझने के मूड में भी नही है लेकिन यह तय है कि इस तरह एक साथ कई दांव चलकर त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने न सिर्फ विपक्ष का मुंह बंद कर दिया है बल्कि सरकार के भीतर रहकर ही त्रिवेन्द्र रावत पर एक कमजोर मुख्यमंत्री होने का आरोप लगा रहे अपने मंत्रीमण्डल के तमाम साथियों व मंत्रीमण्डल में जगह न मिलने से अनमनाऐं सत्ता पक्ष के तमाम वरीष्ठ विधायकों को एक संदेश देने का भी प्रयास किया है। विधायक निधि में ठीक-ठाक बढ़ोत्तरी कर मुख्यमंत्री द्वारा स्थानीय स्तर पर जनप्रतिनिधियों को खुश करने का प्रयास किया गया है तथा चालू विधानसभा सत्र के दौरान एनएच-74 का मुद्दा जोर-शोर से उठने पर सरकार ने त्वरित छापेमारी के बाद अपना पक्ष मजबूत किया है। सरकार के लिये यह भी राहत का विषय है कि सीबीआई ने एनएच-74 मामले की जाँच को अपने हाथ में लेने का मन बना लिया है तथा चालू सत्र के दौरान विपक्ष द्वारा सत्ता पक्ष पर साधे गये अनेक तीर भोंथरे साबित हो रहे है। यह ठीक है कि सरकार के पास प्रदेश भर में चल रहे शराब विरोधी आंदोलनों का कोई जवाब नही है और न ही सत्ता पक्ष कर्मचारियों की बदहाल स्थिति, पदोन्नति में आरक्षण या फिर बेरोजागरी जैसे मुद्दे पर कोई घोषणा करने की स्थिति में है लेकिन हाल-फिलहाल यह तमाम मुद्दे सरकार के लिये चिन्ता का विषय नहीं है क्योंकि अभी उसे किसी चुनावी मोर्चे पर नही जाना और न ही विभिन्न सामाजिक व राजनैतिक मुद्दों पर आन्दोलन कर रही जनता अभी इस स्थिति में है कि वह सरकार से अपने वोटो का हिसाब मांग सके। हाॅ इतना जरूर है कि कांग्रेस ने चालू बजट सत्र के दौरान जो गैरसेंण का मुद्दा उठाया है और जिसे लेकर प्रदेश सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत विधानसभा के बाहर धरने के बाद गैरसेंण बचाओ यात्रा का नाम देकर रूद्रप्रयाग व आस-पास के पहाड़ी क्षेत्रों मे माहौल को गरम करने का प्रयास कर रहे है, उससे भाजपा को स्थानीय स्तर पर कुछ नुकसान हो सकता है लेकिन इसकी भरपाई के लिऐ भाजपा ने अभी से रणनैतिक रूप से पहाड़ बनाम मैदान का मुद्दा उठाना शुरू कर दिया है और चालू विधानसभा सत्र के दौरान यह तथ्य कई बार सामने आया कि प्रश्नकाल अथवा अन्य मामलों में पहाड़ व पहाड़ी क्षेत्र की समस्याऐं उठाये जाने पर भाजपा के कुछ विधायकों द्वारा पहाड़ शब्द का बार-बार जिक्र करने का विरोध किया गया जिस पर सदन की ओर से कोई ऐतराज नही हुआ। जाहिर है कि भाजपा के तमाम विधायक व शीर्ष नेतृत्व यह मानता है कि उत्तराखंड राज्य में पहाड़ बनाम मैदान का कोई विभेद नही है और शायद यहीं वजह है कि उत्तराखंड की भाजपा सरकार, प्रदेश की राजधानी गैरसेंण ले जाने अथवा वहाँ निर्मित विधानसभा में कोई सत्र या मंत्रीमण्डल बैठक आयोजित करने के मामले में कोई रूचि नही लेना चाहती। भाजपा अपने राजनैतिक लाभ के लिऐ इस तथ्य को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत करती रही है कि उत्तराखंड राज्य का आन्दोलन व गठन उत्तर-प्रदेश के कुछ पहाड़ी हिस्सों के असन्तुलित विकास व लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के बेहतर इस्तेमाल के लिऐं छोटी इकाईयों के गठन की आवश्यकता के नाम पर हुआ था तथा इस राज्य की मांग करने वाली जनता ने प्रदेश के तमाम पर्वतीय भू-भाग को इस राज्य से जोड़ने व इसकी राजधानी गैरसेंण रखने की मांग पूरी प्रमुखता से उठायी थी। तत्कालीन केन्द्र सरकार ने राज्य के गठन के वक्त उ.प्र. के कुछ मैदानी इलाको को इस प्रदेश से जोड़कर न सिर्फ राजनैतिक संतुलन बिगाड़ने की कोशिश की बल्कि उस समय गठित की गयी अन्तरिम सरकार ने स्थायी राजधानी के रूप में गैरसेंण का चयन करने के स्थान पर देहरादून को अस्थायी राजधानी को नाम देते हुये एक बड़ा राजनैतिक खेल-खेला जिसका खामियाजा इस प्रदेश की जनता आज भी भुगत रही है और उत्तराखंड राज्य आन्दोलन के शुरूवाती दौर से ही अपने एक अलग नाम के साथ अलग आन्दोलन चलाने के नाम पर बिखराव की स्थिति पैदा करने की कोशिशें करने वाले लोग आज भी उन्हीं कोशिशों में जुटे हुऐ है। शायद यहीं वजह है कि भाजपा की वर्तमान सरकार द्वारा विधानसभा में प्रस्तुत वर्तमान बजट में भी पहाड़ को लेकर कोई सोच नही है और पहाड़ो को सिर्फ खनन व शराब के जरिये राजस्व बटोरने तक सीमित रखने की चाह रखने वाले भाजपा के तमाम बड़े नेता व मंत्री पहाड़ों पर पटवारी से लेकर जिला स्तर तक के अधिकारियों की नियुक्ति व स्थानांतरण के मामले में कुछ भी करने से बचते नजर आते है। पहाड़ो के स्कूलों में मास्टर तथा अस्पतालों में डाॅक्टर का न होना सदन में बजट सत्र के दौरान चर्चा का मुद्दा ही नही बन पाता है तथ प्रतिवर्ष आने वाली करोड़ों की पेयजल व अन्य विकास योजनाओं के बावजूद पहाड़ अभी भी प्यासा और जस का तस है। इस सबके बावजूद पहाड़ की जमीन व अपनी पुरखों की थाती से प्रेम करने वाले कुछ लोग आज भी विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष करते हुये अपने छोटे-छोटे खेतों को उपजाऊ बनाये रखने तथा पलायन कर चुके पहाड़ वासियों को इस मिट्टी से जो रखने के लिऐ संघर्ष कर रहे है और यहां पर यह कहने में कोई हर्ज नही है कि पूर्ववर्ती हरीश रावत सरकार द्वारा इन संघर्षशील मानसिकता वाले लोगों का उत्साहवर्धन करने के लिऐ पिछले तीन वर्षो में विभिन्न योजनाओं के माध्यम से अनेक प्रावधान किये गये थे लेकिन अफसोसजनक है मौजूदा सरकार द्वारा इन्हें महत्वहीन मानते हुये बजट मंे कोई जगह नही दी गई है। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि जोर-जबरदस्ती वाले अंदाज में निपटाये गये इस बजट के बाद सरकार अपनी उपलब्धियों का ढ़ि़ढ़ोरा पीटते हुऐ ‘सरकार की सफलता के सौ दिन‘ के नाम पर कितने ही आयोजन व विज्ञापन क्यों न करें और इस सरकार को सदन के भीतर दो-तिहाही बहुमत भले ही क्यों न प्राप्त हो, लेकिन इसे एक लोकप्रिय एवं जन संवेदनाओं से जुड़ी सरकार नही कहा जा सकता क्योंकि इसके नेता जनभावनाओं को समझकर फैसले लेने की जगह बहुमत को आधार बनाते हुये जनता पर अपने फैसले थोंपने का काम कर रहे हैं ।

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