सरकारी आयोजनों के बीच | Jokhim News

Sunday, July 23, 2017

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सरकारी आयोजनों के बीच

काफल पार्टी जैसे विभिन्न आयोजनों के बहाने जनता को संदेश देने में सफल रहा विपक्ष ।
सदन में विधायकों की सीमित संख्या के बावजूद सत्ता पक्ष की घेराबंदी में कामयाब दिखता विपक्ष वास्तव में नेता प्रतिपक्ष के रणनैतिक कौशल का परिचय देता है तथा नम्र स्वभाव वाले, मृदुभाषी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रीतम सिंह सदन के भीतर कंधे से कंधा मिलाकर नेता प्रतिपक्ष डा0 श्रीमती इन्दिरा हृदयेश का मनोबल बढ़ाते दिखाई देते है। हांलाकि सत्ता पक्ष के तमाम सदस्य सदन में चल रही चर्चाओं के दौरान पूर्ववर्ती सरकार के कामकाज का हवाला देते हुये जब कांग्रेस की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लगाते है तो विपक्ष के कुछ कम अनुभवी सदस्य तैश में आते दिखाई देेते है लेकिन संसदीय कार्य की अनुभवी मंत्री रह चुकी इन्दिरा हृदयेश अपने पक्ष को शांत रखते हुये सरकार से कार्यवाही करने अथवा आरोंपियों की गिरफ्तारी, जैसी मांगों के माध्यम से सदन का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करती है और सरकार को स्पष्ट रूप ये यह समझाये जाने की कोशिश की जाती है कि गलती चाहे किसी भी संगठन अथवा नेता के कार्यकाल की हो, व्यापक जनहित में उसे ठीक किया जाना व दोषियों को चिन्हित किया जाना आवश्यक है। ठीक इसी क्रम में सदन के बाहर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाते हुऐ दिखाई देते है और एनएच-74 से लेकर सदन द्वारा प्रस्तुत किये गये बजट के पहाड़ विरोधी होने जैसे तमाम मुद्दे हरीश रावत द्वारा कांग्रेस कार्यकर्ताओं की मदद से सड़क पर धरना देकर उठाये जाते है। इतना ही नही हरिद्वार में गंगा के किनारे तप करने के नाम पर वह प्रदेश व देश के किसानो की समस्याओं के साथ खुद को सम्बद्ध करते हुये आन्दोलनकारी किसानों पर हुई पुलिसिया गोलाबारी व किसानों की दुखद हत्या को लेकर दुख प्रकट करते है और अपने अस्थाई कार्यालय में काफल पार्टी का आयोजन कर पहाड़ के छोटे जोत वाले किसानों व पहाड़ की संस्कृति या खानपान को लेकर सरकार की विमुखता की ओर भी जनता का ध्यान आकृर्षित करने का प्रयास किया जाता है। हरीश रावत के इन तमाम प्रयासों में स्थानीय विधायकों व संगठन के कुछ चितपरिचित चेहरों के अलावा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष प्रीतम सिंह की मौजूदगी पूरे दल-बल के साथ लगभग हर जगह दिखती है और हरीश रावत की कार्यशैली को जाने-पहचाने बगैर उनपर ‘इकला चलो‘ वाले अंदाज में कांग्रेस को तोड़ने या गुटबाजी का आरोंप लगाने वाले राजनीतिज्ञों व मीडिया से जुड़े तमाम पत्रकारों को उनके तमाम प्रश्नों के जवाब के अलावा यह समझ में आ जाता है कि आखिर हरीश रावत लगातार चार बार लोकसभा का चुनाव हारने के बावजूद कैसे अपने राजनैतिक कद को इस तरह बड़ा करते रहे। यह अलग बात है कि कुछ सम्मानित नेता या पत्रकार संकेतो को समझना नही चाहते और जमीनी स्तर पर कांग्रेस की मजबूती को ध्यान में रखते हुये किये जा रहे हरीश रावत के प्रयासों में उन्हें गुटबाजी की बू आती है लेकिन हरीश रावत इस तरह की तमाम चर्चाओं और व्यक्तिगत् सम्मान की चिन्ता किये बिना कांग्रेस को मजबूती देने के प्रयासों में लगे हुये है और तीन माह से भी कम के इस भाजपाई कार्यकाल में जनता ने यह कहना शुरू कर दिया है कि इससे कहीं ज्यादा बेहतर हरीश रावत सरकार का कार्यकाल था। यह ठीक है कि प्रदेश की जनता ने विधानसभा चुनावों के माध्यम से कांग्रेस को बुरी तरह नकारा है और सरकार के मुखिया समेत तमाम कद्दावर नेताओं को मिली चुनावी हार यह इशारा करती है कि हरीश रावत व उनके सहयोगी, जनता की नब्ज पकड़ने में नाकामयाब रहे लेकिन अपनी इस हार के बावजूद हरीश रावत का राजधानी में डेरा डालकर डटे रहना और हर छोटे-बड़े मुद्दे पर सरकार व मीडिया का ध्यान आकृष्ट कराने के लिऐ नित नये तौर-तरीके अपनाना यह साबित करता है कि इस चुनावी हार के बावजूद हरीश रावत ने अभी हिम्मत नही हारी है। हमें पूरा विश्वास है कि आगामी वर्षा ऋतु के दौरान पहाड़ो पर आने वाली आपदाओं व सड़क दुर्घटनाओं के चलते बंद हो जाने वाले पहाड़ी मार्गो की समस्याओं को सरकार के समक्ष उठाते हरीश रावत उत्तराखंड के किसी भी कोने में नजर आ सकते है और अगर ऐसा होता है तो निश्चित जानियें कि स्थानीय जनप्रतिनिधियों व सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती है क्यांेकि पूर्व मुख्यमंत्री व विपक्ष के दमदार नेता के रूप में आपदा ग्रस्त पहाड़ी क्षेत्र में हरीश रावत की मौजूदगी सरकार को मजबूर करेगी कि वह इधर-उधर ध्यान लगाने की जगह न सिर्फ मूल समस्याओं पर ध्यान दें बल्कि अपने निर्वाचन क्षेत्रों व आपदाग्रस्त पहाड़ी क्षेत्रों तक भी अपनी पहुँच बनाये रखे। हमने देखा कि आपदा अथवा ऐसी ही अन्य तमाम परिस्थितियों के दौरान हमारा सरकारी तंत्र अक्सर उदासीन दिखाई देता है तथा जहाँ-जहाँ से टूटे सम्पर्क मार्ग अक्सर पहाड़ों पर होने वाली दुघर्टनाओं व जन समस्याओं के कारण बनते है। आपदा पीड़ित क्षेत्रों के दौरे के नाम पर इन तमाम क्षेत्रों के हवाई सर्वेक्षण अथवा सरकारी मन्त्रियों के कार्यक्रम के समय तत्पर व सतर्क दिखाई देने वाले सरकारी नुमाइन्दे दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रो तक जाने या फिर वहाँ की तकलीफों से रूबरू होने की हिम्मत ही नही जुटा पाते।उम्मीद की जानी चाहिऐं कि विपक्ष में रहकर जनसमस्याओं की ओर सरकार का ध्यान आकृष्ट करने की कोशिशों में जुटे कांग्रेस के तमाम नेता अपनी इस जिजीविषा को बनाये रखेंगे और बरसात के मौसम में हरीश रावत ही नही बल्कि कांग्रेस के तमाम छोटे-बड़े नेता आपदाग्रस्त पहाड़ों की टूटी-फूटी सड़कों और व्यवस्था विहीन सरकारी तंत्र से रूबरू होते दिखाई देंगे। लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के तहत विपक्ष का कुल उद्देश्य अगली बार सत्ता हासिल करना मात्र नही है बल्कि सरकार के विपक्ष में बैठे नेता की यह जिम्मेदारी होती है कि वह जनता के दुख-दर्द व तकलीफ को और ज्यादा नजदीक से महसूस करें तथा जनतांत्रिक व्यवस्थाओं के जरिये सरकार पर यह दबाव डाले कि वह त्वरित गति से उन समस्याअें का निदान करे। अगर उत्तराखंड की नवगठित विधानसभा को इस नजरिये से देखा जाय तो कांग्रेस सदन की भीतर और बाहर अपने कर्तव्य का अनुपालन करने में न सिर्फ सफल नजर आ रही है बल्कि कांग्रेस सरकार में लगातार पाँच साल तक वरीष्ठ मंत्री रही इन्दिरा हृदयेश पूरी बेबाकी के साथ बिना किसी हिचकिचाहट के सदन के भीतर और बाहर अपनी सरकार की गलतियो को स्वीकारते हुये वर्तमान सत्ता पक्ष से इनसे सबक लेने व अनियमिताओं की जाँच कराने का अनुरोध करती दिखाई देती है। सत्ता पक्ष के काम करने के तौर-तरीकों और पूर्ण बहुमत पर अतिविश्वास को देखते हुऐ यह नही कहा जा सकता कि सत्ता पक्ष, विपक्ष के अनुभवों से कोई सबक लेने के तैयार है और न ही सरकार के मन्त्रियों अथवा मुख्यमंत्री ने अभी तक यह इशारा दिया है कि वह विपक्ष के नेताओं द्वारा मुद्दों पर सरकार के ध्यानाकृर्षण के लिऐ आजमायें जा रहे तौर-तरीके को जरा भी गंभीरता से ले रहे है। लिहाजा अभी यह कहना मुश्किल है कि सरकार विपक्ष के अनुभवों से सबक लेते हुये अपनी कार्यशैली में कोई बदलाव लायेगी और राज्य में पहली बार बनी एक पूर्ण बहुमत की सरकार के नेतृत्व में प्रदेश का संर्वागीण विकास होगा।

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