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Monday, December 11, 2017

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जनता के नजरिये से

एक छलावा भर है उत्तराखंड सरकार द्वारा राज्य की विधानसभा में प्रस्तुत किया गया बजट।
उत्तराखंड की पूर्ण बहुमत वाली भाजपा सरकार सदन में अपना पहला वार्षिक बजट प्रस्तुत कर चुकी है और सरकार के समर्थकों के हिसाब से जनता पर कोई नया कर न लगाकर राज्य सरकार ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है लेकिन इस पूरे बजट में सरकार ने कहीं भी यह स्पष्ट नही किया है कि वह अपने बजट घाटे को किस तरह पूरा करने वाली है और जिस परिवर्तन के सब्जबाग दिखाकर वह सत्ता के शीर्ष तक पहुंची है, परिवर्तन के उस नारे की इस बजट में जगह कहाँ है? यह ठीक है कि चुनावी नारो व यथार्थ में बड़ा फर्क होता है और सत्ता के शीर्ष को हासिल करने के बाद राजकोष की वास्तविक स्थिति समझने वाली सरकार हमेशा ही यह घोषणा करती है कि पूर्ववर्ती सरकारों ने राज्य अथवा राष्ट्र के खजाने को पूरी तरह खाली करके आर्थिक कंगाली के से हालत पैदा कर रखे है लेकिन इस सबके बावजूद हमने किसी राजनेता को अपने या अपनी सरकार के खर्चो में कटौती करते नही देखा और न ही कोई सरकार विभिन्न सरकारी आयोजनों या फिर सम्मानित जनप्रतिनिधियों के वेतन आदि भत्तों में कटौती करती नजर आयी। हाँ इतना जरूर है कि आर्थिक तंगी का रोना रोकर राजनैतिक दुराग्रह से प्रेेरित लोग पिछली सरकार द्वारा की गयी तमाम जनहितकारी घोषणाओं के निरस्त करने अथवा चल रहे विकास कार्याे को ठप करने की कोशिश जरूर करते है तथा बदले की भावनाओं से लिये गये इन निर्णयों के चलते अक्सर छोटे-छोटे काम करने वाले ठेकेदारों व अन्य कार्मिकों के भुगतान लंबे समय तक लटक जाते है लेकिन सरकार अथवा जनता को इसका कोई फायदा नही होता और न ही जनता इस किस्म की पैतरेबाजी को ज्यादा गंभीरता से लेती है। हमने देखा है कि सरकार द्वारा प्रस्तुत किये गये घाटे के बजट की प्रतिपूर्ति के लिऐ खुले बाजार से पैसा जुटाने में नाकाम रही हरीश रावत सरकार को पिछले दो वर्षो में किस तरह आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा और पहली बार दल-बदल के चलते अस्थिर हुई राज्य सरकार के दौर में सरकारी विभागों ने किस प्रकार चतुराई के साथ बाजारों, कर्मकारों व ठेकेदारों के भुगतान पर अघोषित रोक लगा दी। ठीक इसी अंदाज में गुजरे वित्तीय वर्ष के दौरान भी सरकार बदलते ही नौकरशाही का अंदाज बदल गया और इसका खामियाजा सरकारी विभागों के साथ जुड़कर काम कर रहे ठेेकेदारों या फिर अन्य बाइन्डरों ने उठाना पड़ा। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि सरकार द्वारा सदन में प्रस्तुत किया जा रहा घाटे का बजट सिर्फ स्थानीय जनता को ही सामूहिक कर्ज की दिशा में नही धकेल रहा बल्कि बेरोजगार युवाओं के तमाम समूह जो रोजगार के आभाव के चलते विभिन्न काम धंधों के माध्यम से अपनी रोजी-रोटी जुटाने की कोशिश कर रहे थें, आज सरकार की इन्हीं कोशिशें के चलते कर्ज के बोझ से दबे पड़े है और सरकारी तंत्र यह सोचकर खुश है कि उसने जनता पर को नया कर न लगाते हुऐ भी एक विकासोन्मुख बजट प्रस्तुत किया है। यह ठीक है कि नेताओं के पास कोई जादू की छड़ी नही है कि वह सत्ता के शीर्ष को संभालते ही सबकुछ ठीक-ठाक कर ले, इसलिऐं अक्सर सरकारों द्वारा सत्ता संभालने के बाद कुछ समय की मांग की जाती है और अक्सर देखा गया है कि राज्य अथवा राष्ट्र को विकास के पथ पर ले जाने के लिऐ स्वनिर्धारित समय सीमा के भीतर ही सत्तापक्ष व विपक्ष दूसरे चुनावों मे उलझकर रह जाता है और पिछली तमाम बातें बेमानी हो जाती है लेकिन अगर चुनावों के दौरान मतदाताओं ने विकास के नारे पर नेताओं की नही बल्कि देश के प्रधानमंत्री की बातों का भरोसा किया हो तो सरकार द्वारा विधानसभा पटल पर रखे गये इस बजट पर एक नजर डालने के बाद यह पूछने का हक तो हर मतदाता को है कि आॅखिर वह चुनावी जिक्र वाला डबल इंजन कहाँ गायब हो गया है। वर्तमान में सम्पूर्ण उत्तराखंड के लगभग हर कोने में शराब का विरोध जोरो पर है और सरकार द्वारा खोली जा रही अंग्रेजी अथवा देशी शराब की दुकानो के विरोध मे महिलाऐं अनावरत रूप से सड़कों पर है लेकिन सरकारी तंत्र जनमत की चिन्ता छोड़कर शराब के जरिये और अधिक राजस्व जुटाने के लिऐ फिक्रमंद है, इसलिऐं सरकार द्वारा प्रस्तुत बजट में राजस्व के रूप में प्राप्त होने वाली शराब की आय को प्रमुखता से स्थान दिया गया है। इतना ही नहीं, राज्य सरकार की सहयोगी व डबल इंजन होने का दावा करने वाली केन्द्र सरकार पर्यावरण सुरक्षा जैसे तमाम विषयों को विभिन्न सरकारी ऐजेन्सियों के माध्यम से जोर-शोर से उठाकर राज्य सरकार पर विभिन्न प्रकार के प्रतिबंध लगाने की पक्षधर दिखती है और लगातार बढ़ रहे पर्यावरणीय असंतुलन तथा खनन जैसे कारोबार के लगातार बिगड़ते जा रहे स्वरूप को देखकर केन्द्रीय ऐजेन्सियों द्वारा लगाये जा रहे तमाम प्रतिबंध गलत भी नही कहें जा सकते लेकिन राज्य सरकार की नजर में खनन राजस्व प्राप्ति का दूसरा बड़ा जरिया है और राज्य सरकार अपने हक-हकूकों के नाम पर खनन के अधिकार पाने के लिऐ विभिन्न स्तरों पर लड़ रही हैं । हांलाकि किसी भी सरकारी व्यवस्था के लिए यह संभव नही है कि उसके कर्ज की भरपाई अथवा रोजमर्रा के खर्चाे को चलाने के लिऐ केन्द्र सरकार द्वारा उसे एकमुस्त मोटी रकम दे दी जाय और राज्य सरकार इसे अपनी व्यवस्थाओं के सुदृढ़ीकरण अथवा जनता की मांग का नाम देकर राजस्व वसूली के तमाम पुराने तौर-तरीको को एक ही झटके में बदलकर रख दे लेकिन अगर राज्य सरकार चाहे तो वह नयी योजनाओं व सोच को आगे कर राजस्व वसूली के कुछ नये संसाधन व रोजगार के नये जरिये जुटाने की बात सरकारी बजट के माध्यम से जनता की अदालत में रख सकती थी और सरकार द्वारा अपने चुनावी वादों के अनुरूप पहाड़ों से पलायन रोकने, पहाड़ी जिलांे में कृषि को बढ़ावा देने, पर्यटन को रोजगार से जोड़ने या फिर सरकारी देख रेख में चल रही शिक्षा व्यवस्था को मजबूत व लोकप्रिय बनाने जैसे तमाम प्रावधानों को इस बजट के माध्यम से जनता के बीच रखा जाना चाहिऐ था। अफसोसजनक है कि सरकार द्वारा प्रस्तुत किये गये इस बजट में कुछ पुरानी व केन्द्र सरकार द्वारा चलायी जा रही योजनाओं को नया मुलम्मा लगाकर प्रस्तुत किये जाने के अलावा और ऐसा कुछ भी नही है जिसे उत्तराखंड राज्य के हित में कहा जा सके तथा वर्तमान सरकार द्वारा प्रस्तुत बजट की तुलना पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा प्रस्तुत बजट से करने पर यह भी स्पष्ट होता है कि बड़े-बड़े वादो व दावों के साथ सत्ता के शीर्ष पर पहुंची भाजपा की वर्तमान सरकार ने अपने इस बजट में लीक से हटकर चलने की थोड़ी भी कोशिश नही की है। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि पहाड़ी राज्य माने जाने वाले उत्तराखंड के इस बजट में पहाडों के विकास या पहाड़ी संस्कृति व परम्पराओं को आगे बढ़ाये जाने को कोई जिक्र ही नही है और बजट पर जाने वाली पहली नजर से ही यह साबित हो जाता है कि सिर्फ राजधानी के मामले में नही बल्कि विकास से जुड़े हर छोटे-बड़े फैसले को लेकर भी भाजपा के नेताओं ने अपने मैदानी इलाके से प्रेम को छुपाने की कोई कोशिश नही की है।

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