असमंजसता भरे माहौल में | Jokhim News

Tuesday, August 22, 2017

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असमंजसता भरे माहौल में

हालातों का मारा किसान समझ नही पा रहा है कि आन्दोलन के अलावा उसके पास और रास्ता क्या है?
क्या वजह है कि केन्द्र की मोदी सरकार किसानों, गरीबो और मजदूरों की आवाज आम जनता तक पहुंचने नही देना चाहती और शान्ति व्यवस्था कायम रखने के नाम पर मेहनतकश वर्ग के एक बड़े हिस्से के आन्दोलनों पर से आम आदमी का ध्यान हटाने के लिऐ इनसे जुड़ी तमाम खबरों को घोषित व अघोषित रूप से रोका जा रहा है । इस वक्त पूरे देश का किसान त्राहि-त्राहि कर रहा है और सरकार की गलत नीतियों के चलते उसे अपने उत्पादों की पूरी लागत भी नही मिल पा रही जबकि सरकारी शह पर बिचैलियें न सिर्फ मौज कर रहे है बल्कि आम आदमी की सेहत से जुड़ी समस्याआंे को दरकिनार करते हुऐ तमाम तरह के नकली उत्पाद धड़ल्ले से बाजार में उतारे जा रहे है। हमने देखा कि कुछ भी समय पूर्व दिल्ली के जन्तर-मन्तर में जुटा दक्षिण भारत से आये किसानों का जत्था सरकार द्वारा किसी भी तरह की तवज्जों न दिये जाने के कारण अपनी पेशाब तक पीने को मजबूर हुआ और अब मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र के किसान अपनी अनदेखी के विरोध में सड़कों पर आन्दोलन के जरिये सरकार का ध्यान आकृष्ट करने की कोशिश कर रहे है लेकिन अफसोसजनक है कि सरकारी तंत्र इन किसानों की समस्याओ का सीधा समाधान ढ़ूंढ़ने की जगह इनके जलसों,रैलियों अथवा प्रदर्शन के दौरान सीधे तौर पर गोलाबारी करवा रहा है जिसके चलते समस्या किसी समाधान के स्तर पर पहुंचने के स्थान पर बढ़ती ही जा रही है। हांलाकि सरकार के घायलों एवं मृतकों के लिऐ मुआवजा व सरकारी नौकरी जैसी तमाम घोषणाओं के माध्यम में आन्दोलनकारियों का आक्रोश कम करने की कोशिश की है तथा आफवाहों को फेलने से रोकने के लिऐ इन्टरनेट के प्रयोग को प्रतिबन्धित करने व समाचारों पर सेंसरशिप लागू किये जाने जैसी आंशकाओं को भी बल मिला है लेकिन सरकारी तंत्र किसी भी कीमत पर उन समस्याओं पर विचार करने के लिऐ तैयार नही है जिनकी वजह से किसानों का यह आन्दोलन भड़का हुआ है। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि किसानों के इस आन्दोलन में वर्तमान तक भागीदारी करने वाले कुल किसानों में उनकी संख्या ज्यादा है जो आर्थिक रूप से मजबूत व राजनैतिक रूप से संगठित है और शायद यही वजह है कि आन्दोलन कर रहे किसानो की सरकारी तंत्र द्वारा गोली मारकर हत्या करने के बावजूद भी यह आन्दोलन अभी हद से ज्यादा भड़का नही है लेकिन यह तय है कि अगर सरकार समय रहते किसानो की समस्या का समाधान नही करती तो छोटी जोत वाले किसानो के कमजोर तबके की भागीदारी इस आन्दोलन को भड़काकर न सिर्फ देशव्यापी बना सकती है बल्कि इन स्थितियों में हो सकता है कि किसानों के इस आन्दोलन पर उस वर्ग या उन नेताओं का नियन्त्रण भी न रहे जो कि वर्तमान में इसका नेतृत्व करने का दावा कर रहे है और जिन्हें लेकर यह उम्मीद की जा रही है कि सरकार द्वारा किसानों की समस्याओं पर सकारात्मक रूप से वार्ता का आश्वासन देकर यह आन्दोलन टाला जा सकता है । यह ठीक है कि किसानों को एक झटके में ही कर्ज मुक्त कर देना या फिर उनके बिजली और पानी के बिल माफ कर देना किसी भी सरकारी व्यवस्था के लिऐ आसान नही है और न ही कोई भी सरकार कृषि उत्पादों की कीमत दोगुनी या तीन गुनी कर बाजार मंें मंहगाई बढ़ने का खतरा मोल ले सकती है लेकिन किसान को भी अपनी लागत के अलावा अपनी मेहनत का पूरा मूल्य मिलना चाहिएं और कृषि को भी उद्योग का दर्जा देते हुऐ विभिन्न स्तर पर सरकारी छूटों व सुविधाओं से नवाजा जाना चाहिऐं, ऐसा आन्दोलन कर रहे किसानों के नेताओं का ही नही बल्कि देश भर में कृषि व्यवसाय से जुड़े किसानों व कृषि कार्याें में लगे मजदूरों का मानना है। यह वाकई अफसोसजनक है कि प्रकृति द्वारा निशुल्क प्रदत्त पानी जैसे उत्पाद को स्वच्छ करने के नाम पर कई छोटी-बड़ी कम्पनियों द्वारा न्यूनतम् बीस रूपये या इससे कहीं अधिक कीमत पर इसे बेचा जा रहा है लेकिन सरकार किसान की हाड़तोड़ मेहनत के बाद धरती का सीना फोड़कर उत्पादित किये जाने वाले गेहूं की कीमत खुले बाजार में बीस रूपये भी करने को तैयार नही है और न ही आम आदमी को रोटी उपलब्ध कराने वाले को कोई अतिरिक्त सुविधा दिये जाने के बारे मे किसी सरकार द्वारा अबतक विचार किया गया है। कितना आश्चर्यजनक है कि किसान के खेत से उत्पादित आलू को कोई दो रूपये किलो की कीमत पर भी खरीद कर तैयार नही है लेकिन आलू चिप्स सौ रूपये से लेकर पाचं सौ रूपये प्रति किलो की दर से पैकेट बन्द कर आसानी से बाजार में बेचे जा रहे है। ठीक यही स्थिति टमाटर या अन्य कृषि उत्पादों की भी है और मजे की बात यह है कि किसानों तक लाभ की अधिकतम् कीमत पहुंचाने का दावा करने वाली विभिन्न सहकारी समितियाँ व सरकारी विभाग किसानों के ही पैसे पर मौज ले रहे है जबकि किसान अपने उत्पादन की सही कीमत ना मिलने या फिर बिचैलियों के लूट तंत्र के चलते खुद का असहाय महसूस कर रहा है। हालातों के मद्देनजर सरकार को चाहिऐं था कि वह किसानों की समस्याओं पर गंभीरता से विचार करते हुऐ आन्दोलरत् किसान नेताओं की बात सुनती और समस्या का वाजिब समाधान तलाशने की कोशिश की जाती लेकिन भक्तों के भरोसे सरकार चला रहे देश के बड़बोले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किसानों की समस्याओं पर गंभीरता में विचार करने के स्थान पर किसानों के इस आन्दोलन को बगावत की संज्ञा दी ओर न सिर्फ आन्दोलनकारियों से सड़कों पर ही निपटने के लिऐ अपने सशस्त्र गुण्डों व पुलिस की फौज को यह जिम्मेदारी सौंपी बल्कि किसानों के जीन्स की पेन्ट पहनने पर ओछे सवाल उठाते हुऐ विपक्ष को इस पूरे आन्दोलन व अराजकता के लिऐ जिम्मेदार बताया। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विपक्ष का तो काम ही है कि वह सरकार की कमियों और नाकामियों की ओर सरकारी तंत्र का ध्यान आकृर्षित करंे लेकन कांग्रेस मुक्त ही नही बल्कि विपक्ष मुक्त भारत की बात करने वाली भाजपा यह चाहती है कि विवादित नारों, जातिवाद, भेदभाव, धार्मिक अराजकता व वैमनस्य को इस कदर बढ़ावा दिया जाय कि जनसामान्य की वाजिब समस्याओं पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करने वाला या फिर जनान्दोलनों के जरियें सरकारी तंत्र तक आम आदमी की समस्याऐं पहुंचाने की कोशिश करने वाला कोई भी जिम्मेदार कंधा शेष न रहे। शायद यहीं वजह है कि पहली बार सत्ता के शीर्ष पर पहुंची भाजपा ने केन्द्र में सरकार बनाने के बाद से ही अपना पूरा ध्यान विपक्ष को नेस्तानाबूद करने, अन्य राज्यों की सत्ता हथियाने या फिर धार्मिक वैमनस्यता व कट्टरवाद बढ़ाने पर केन्द्रित किया हुआ है और व्यापक जनहित के जरिये जनता का मन जीतकर मत लेने की रणनीति अपनाने की जगह भाजपा के नीतिनिर्धारक कुछ बड़े पूंजीपतियों के हित साधकर प्रचार तंत्र को अपने काबू में लेने व डर का साम्राज्य कायम कर सत्ता पर अपनी कब्जेदारी कायम रखने की रणनीति पर काम कर रहे है। हालातों के मद्देनजर यह रणनीति हाल-फिलहाल के लिऐ कुछ कारगर भी मालुम दे रही है लेकिन इसका असर कितनी देर तक बना रहेगा, कहाँ नही जा सकता।

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