दबाव की राजनीति | Jokhim News

Friday, June 23, 2017

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दबाव की राजनीति

समाचार पत्रों की बढ़ी तादात के साथ चुनिन्दा समाचार चैनलों व सोशल मीडिया पर मुखर आवाजों का गला घोंटने की रणनीति पर काम कर रही है वर्तमान केन्द्र सरकार।
एनडीटीवी के मुख्य कर्ताधर्ता प्रणव राय के कार्यालय समेत दिल्ली और देहरादून की तमाम परिसम्पत्तियों पर एक साथ हुई सीबीआई की छापेमारी यह दर्शाती है कि केन्द्र सरकार अब पूरी तरह मनमानी पर उतर आयी है तथा अपने खिलाफ उठने वाली किसी भी आवाज को रोकने के लिये उसे किसी भी हद तक जाने से कोई गुरेज नही है। हांलाकि सीबीआई एक स्वतंत्र संस्था है और प्रणव राय के आवास पर हुई छापेमारी का आधार तैयार करने के लिये उनके खिलाफ हुई पुलिस शिकायत को आधार बनाया गया है लेकिन यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि केन्द्र की नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार सीबीआई का उपयोग अपने पक्ष में करने अथवा धमकाकर विरोधी पक्ष को चुप कराने में महारत हासिल करते हुऐ अपनी पूर्ववर्ती सरकारों को बहुत पीछे छोड़ चुकी है। हमने पढ़ा और देखा है कि पूर्व प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी द्वारा देश पर थोपे गये आपातकाल के दौरान किस तरह सरकार के खिलाफ खबरें छापने वाले खबरनवीसों को जेल में डाला गया तथा तमाम सम्पादकों व अखबार मालिकों को यह ताकीद दी गयी कि समाचार पत्र में कोई भी समाचार छापने से पूर्व स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक स्वीकृति ली जाये लेकिन सबके बावजूद सरकार इतनी नीचे नही गिरी कि उसने बिकने या डरने से मना करने वाले अखबार मालिक का प्रकाशन बंद करने का षड़यंत्र रचा हो। मौजूदा दौर में हालात कतई बदले हुऐ है और सरकार का रवैय्या देखकर जनता यह अच्छी तरह समझ रही है कि सरकार कुछ पूंजीपति समूहों के निजी लाभ के लिऐ उनके प्रतिनिधि के तौर पर काम कर रही है तथा जनसाधारण को बातों के मकड़जाल में उलझाकर मोदी के पक्ष में करने की कोशिशें निरन्तरता से जारी है। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि समाचार जगत पर तेजी से पकड़ बनाने वाले सोशल मीडिया के एक बड़े हिस्से पर मोदी भक्तों का कब्जा है और बेरोक-टोक वाले अंदाज के साथ अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने वाले भाजपा के यह तथाकथित कार्यकर्ता किसी भी कीमत पर हिन्दूवादी मानसिकता वाले मतदाताओं को एकजुट कर निरन्तर रूप से अपना लक्ष्य को अंजाम दे रहे है। चुनावी मुहिम को ध्यान में रखते हुऐ हर वक्त साईबर युद्ध को तैयार यह तथाकथित कार्यकर्ता जिस अंदाज में चैबीसों घंटे व हर पोस्ट को लेकर सजग दिखाई देते है और जिस अंदाज में यह सामने वाले को देशद्रोही व भारत विरोधी होने की डिग्रिया बांटते रहते है,उससे यह तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि भाजपा के यह साइबर सिपाही बिना किसी शह और आर्थिक अनुदान के इतने सजग नही है लेकिन इन तथाकथित साईबर सिपाहियों के अल्पज्ञान और मुद्दे पर बहस करने के स्थान पर मोदी-मोदी या भाजपा के ऐजेण्डे मात्र का अलाप इन्हें ज्यादा देर मैदान में टिकने नही देता और भाजपा व सरकारी तंत्र की बहुत कोशिशों के बाद भी सोशल मीडिया पर विपक्ष जिन्दा दिखाई देता है तथा सरकार के कामकाज के तौर-तरीको की तारीफ से कहीं ज्यादा इसके नकारात्मक प्रभाव का विश्लेषण होता दिखाई देता है। ठीक इसी प्रकार इलैक्ट्रानिक मीडिया के एक बड़े हिस्से को भी मोदी के सहयोगी माने जाने वाले व्यवसायिक घरानों ने अपने कब्जे में ले लिया है या फिर विज्ञापन के लेन-देन व अन्य व्यवसायिक मजबूरियों के चलते तमाम टीवी चैनलों मालिकों ने सरकार के समक्ष घुटने टेक दिये है और इन तमाम चैनलों के एंकर जनता को वास्तविकता व जनसामान्य के हित-अहित से जुड़े समाचार दिखाने की जगह बे-सर-पैर की बहसों व मुद्दों में उलझा रहे है। अगर कोई टीवी चैनल अपने संसाधनों के दम पर इस लीक से हटकर चलने की कोशिश करता भी है तो उसका मुंह बंद करने के लिऐ अन्य तमाम तरह की टोटकेबाजी के अलावा अब सीबीआई को भी इस्तेमाल किया जा सकता हैं। हम यह नही कहते कि सीबीआई द्वारा अकारण ही प्रणव राय को परेशान किया जा रहा है या फिर वह इतने ईमानदार और सुलझे हुऐ इंसान है कि उनके खिलाफ किसी भी तरह का मामला या मुकदमा दर्ज होना आश्चर्य का विषय है लेकिन यह साफ दिख रहा है कि इस मामले में सरकार का नजरिया भी स्पष्ट नही है और अपनी इस हरकत से मोदी सरकार देश के सभी बड़े मीडिया ग्रुपो को चुपचाप सरकार के पीछे-पीछे चलने का संदेश देना चाहती है। यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि सत्ता पर काबिज होने के तुरन्त बाद से ही देश की नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने एक नियोजित कार्यक्रम के माध्यम से देश के प्रिन्ट मीडिया को अपने काबू में रखने के प्रयास किये लेकिन पिं्रट मीडिया के समाचार पत्रो की बड़ी संख्या के अलावा अधिकांश समाचार पत्रों के स्वामियों के जनता से सीधे जुड़ाव के चलते जनमत के विरूद्ध चलने से इनकार के कारण नीतिगत् सुधारों के नाम पर तमाम लघु व छोटे समाचार पत्रों के विज्ञापन व अन्य सुविधाऐं बंद करते हुऐ उनके विरूद्ध दमनात्मक कार्यवाही शुरू हो गयी है और देश की आजादी के बाद शायद पहली बार है कि बड़ी संख्या में न सिर्फ समाचार पत्रों के आर.एन.आई निरस्त हुऐ है बल्कि उन्हें सरकार द्वारा विज्ञापन जारी करने वाली ऐजेन्सी डीएवीपी में भी पैनल से बाहर कर दिया गया है। कुल मिलाकर देखा जाय तो मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार की कार्यशैली देखकर यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि वह देश के प्रिंट, इलैक्ट्रॉनिक या सोशल मीडिया को अपने हिसाब से चलाना चाहती है और इसके लिऐ उसे अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर निकल कानूनी ताकत का गलत इस्तेमाल करने, असभ्य व अश्लील भाषा का इस्तेमाल करने या फिर नीतिगत् निर्णय के नाम पर सरकारी विज्ञापनों को देने की आर्हता बदलने और समाचारपत्रों के मालिकों को बेवजह की जाँच में उलझाने से कोई गुरेज नही है। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि भाजपा के बड़े नेताओं ने यह मान लिया है कि मीडिया के एक बड़े हिस्से का गला घोंटकर वह जनता के एक बड़े हिस्से तक सच पहुंचने से रोक सकते है या फिर सरकारी विज्ञापन से होने वाली आय के बंद होते ही समाचार जगत में त्राहि-त्राहि मचना निश्चित है लेकिन शायद सरकार यह नही जानती कि एक अच्छे पत्रकार को अपनी प्रतिभा निखारने व कुछ कर दिखाने का मौका विपरीत परिस्थितियों में ही मिलता है। हमें पूरा विश्वास है कि पत्रकारिता व समाचार जगत को अपने पक्ष में करने तथा विपक्ष को नेस्तनाबूद कर देने के इरादों के साथ सरकारी तत्र का दबाव मीडिया के कुछ हिस्सों पर जैसे-जैसे बढ़ेगा वैसे-वैसे ही सरकार की कारगुजारियों को लेकर पर्दे के पीछे चल रहे सत्ता वर्ग के खेलों के प्रति पत्रकारों की जिज्ञासा बढ़ती जायेगी और शीघ्र ही तमाम ऐसे समाचारों को लेकर हम आपके बीच होंगे, जिन्हें सरकार की सेहत के लिऐ अच्छा नही कहा जा सकता। भाजपा के लोग समाज में नफरत और संर्कीणता का बीज बोकर आगे बढ़ने की राह तलाश रहे है क्योंकि उन्हें लगता है कि समाज के एक विशेष हिस्से को साथ लेकर चलने के लिऐ विचारधारा की जंग के नाम पर नफरत का कारोबार किया जाना जरूरी है। अपने तय ऐजेण्डे के अनुसार सबकुछ पूंजीपतियों के एक छोटे समूह को सौंपकर वह देश की जनता के एक बड़े हिस्से को मानसिक व शारीरिक रूप से गुलाम बना लेना चाहते है तथा विरोधी पक्ष को नीचा दिखाने के लिऐ वह उसके सामाजिक बहिष्कार, कानूनी उत्पीड़न या फिर चारित्रिक हनन से भी परहेज करते प्रतीत नही होता। इन हालातों विपक्ष कहाँ पर टिक पायेगा या फिर भाजपा के नेतृत्व वाली केन्द्र अथवा विभिन्न राज्यों की सरकारों का विरोध कर असलियत जनता के सामने लाने की कोशिश कर रहे मीडिया का हश्र क्या होगा, यह तो वक्त बतायेगा लेकिन इतना तय है कि पिछले कुछ दशकों में जिन लोगों ने पत्रकारिता की एकरूपता व इसमें बढ़ती जा रही नीरसता से उकताकर इस क्षेत्र को छोड़ अन्य क्षेत्रों में अपना भाग्य आजमाने की सफल कोशिशें की थी उनमें से अनेक का रूझान एक बार फिर इस क्षेत्र की ओर बढ़ता प्रतीत हो रहा है और निश्चित जानियें कि मीडिया के क्षेत्र में यश व कुछ नये रास्ते तलाशने के लिऐ यह वक्त सबसे बेहतर है।

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