बदलाव की जरूरतों के बावजूद | Jokhim News

Monday, December 11, 2017

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बदलाव की जरूरतों के बावजूद

विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों और नारों के बावजूद हालात जस के तस।
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर देश के तमाम कोनों में आयोजित सेमीनारों व अन्य कार्यक्रमों में एक बात स्पष्ट रूप से आयी कि हम सब, मानवजनित प्रदूषण व प्रकृति के साथ अनावश्यक छेड़छाड़ के चलते अपनी मानवीय सभ्यता व संस्कृति के लिऐ खतरा पैदा कर चुके है तथा प्रकृति द्वारा प्रदत्त संसाधनों के आवश्यकता से अधिक दोहन व आधुनिकतम तकनीकी का उपयोग करते हुऐ सबसे आगे निकल जाने की होड़ ने हमें मजबूर किया है कि हम अपने इर्द-गिर्द हो रहे प्रकृति के बदलावों को अनदेखा करें लेकिन पिछले कुछ दशकों मे सख्त हुऐ अन्र्तराष्ट्रीय कानूनों व मानवीय सभ्यता को बचाने के लिऐ सजग हुऐ वैज्ञानिको या पर्यावरण विदों की चिन्ता को देखते हुऐ यह जरूरी हो गया है कि हम प्रकृति और पर्यावरण संरक्षण के महत्व को समझे। हमारे देश के प्रधानमंत्री ने हालातों की गंभीरता को समझते हुऐ सत्ता संभालते ही ‘स्वच्छ भारत अभियान‘ का नारा दिया और गंगा समेत तमाम नदियों को गंदे पानी का नाला बनने से रोकने के लिऐ न सिर्फ विभिन्न महत्वाकांक्षी परियोजनाऐं शुरू की गयी बल्कि एनजीटी जैसी स्वयत्तशासी संस्थाओं को मजबूती प्रदान कर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में नई पहल करने की कोशिश की गयी लेकिन इस पूरी कवायद का कोई नतीजा निकलता नही दिख रहा क्योंकि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में साफ-सफाई का संदेश देने के लिऐ उठाया गया झाड़ू केवल एक राजनैतिक स्टंट मात्र बनकर रह गया और नेताओं ने स्वच्छता अभियान के नाम पर झाड़ू के साथ फोटो खिंचाकर मीडिया में देना अपना एक निजी शौक बना लिया जबकि नदियों को साफ-सुथरा और अविरल प्रवाह वाला बनाने सम्बन्धी प्रयास भी राजनैतिक भी साबित हुऐ तथा गंगा की सफाई के नाम पर अरबों रूपया खर्च कर भ्रष्टाचार की एक अलग गंगा बहाने के बाद हम आज उससे भी बुरी स्थिति में है जहाँ से हमने यह साफ-सफाई का नारा दिया था। हांलाकि एनजीटी जैसी संस्थाऐं अच्छा काम कर रही है लेकिन इनकी कार्यशैली में भी राजनैतिक हस्तक्षेप से इनकार नही किया जा सकता और इस तथाकथित रूप से स्वयत्तशासी संस्थान द्वारा बार-बार अपने फैसले पलटना या फिर गंभीर शिकायतों व खामिंयों के बावजूद कुछ नामचीन लोगों को यूं ही छोड़ देना यह साबित करता है कि यह संस्था भी गरीबमार के अलावा कुछ नया नही कर पायी। कितना आश्चर्यजनक तथ्य है कि उत्तराखंड में गौमुख से निकलने वाली गंगा का जल ऋषिकेश तक पूर्ण रूप से शुद्ध व पिये जाने योग्य है लेकिन एनजीटी समेत तमाम संस्थाओं व गंगा बचाओं का आवहन करने वाले तमाम स्वंयसेवकों या सरकारी कारिन्दो की जोर-जबरदस्ती के चलते इस पहाड़ी प्रदेश में ठप हो चुके विकास कार्योे ने यहाँ के स्थानीय निवासियों को गंगा समेत तमाम छोटी-बड़ी नदियों के रख-रखाव व पर्यावरणीय संतुलन के प्रति उदासीन बना दिया है। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि हमारी पुरातन मान्यताओं व संस्कृति ने धार्मिक आंडबरों का सहारा लेकर प्राकृतिक संसाधनों को देवतुल्य मानते हुऐ अपनी जरूरत भर खनिज, वन उपज व जल ईत्यादि इनसे लेने का संदेश हमें दिया था लेकिन कुछ व्यवसायिक बुद्धि के ठेकेदारो ने वैज्ञानिकों तर्कों का सहारा लेकर हमें समझाया कि प्रकृति की इन अनमोल धरोहरों का दोहन कर पूंजी बाजार में बड़ा नाम कमाया जा सकता है। इसके ठीक दूसरी ओर धार्मिक रीति-रिवाजों व मान्यताओं के पीछे छुपे वैज्ञानिक कारणों पर तर्क-वितर्क करने के स्थान पर हमारे ही कुछ लोग लकीर के फकीर बन गये और उन्होंने प्रकृति के साथ सहभागिता निभाते हुऐ व्यवस्थाओं को दुरूस्त करने का प्रयास करने के स्थान पर अत्यधिक व अवैज्ञानिक दोहन के चलते तेजी से बिगड़ रहे पर्यावरणीय संतुलन को बिगाड़ने में ही अपना योगदान दिया। नतीजतन समाज व सामाजिक व्यवस्थाओं को दो तरफा नुकसान हुआ और व्यापक जनहित का दावा करने वाली सरकारी व्यवस्थाओं ने ‘लूट के इस खेल में राजस्व वसूली के नये साधन तलाशने शुरू कर दिये जिसके कारण सामाजिक असमानताऐं गहराने लगी और कल तक वन अथवा अन्य तमाम प्राकृतिक संसाधनों की अपने प्राणों की कीमत पर भी रक्षा करने का दावा करने वाली जनता अब इन्हें सरकारी टैक्स वसूली का जरिया मात्र मान इनके प्रति पूरी तरह उदासीन दिखाई देती है। कितना आश्चर्यजनक है कि पानी जैसी प्रकृति की नियामत पर सरकार न सिर्फ अलग- अलग तरीके का टैक्स वसूलती है बल्कि पानी के व्यवसायीकरण में लगे पूंजीपति वर्ग ने आदमी की औकात के हिसाब से इसकी अलग-अलग कीमतें निर्धारित कर दी है। ठीक इसी प्रकार सरकार व अन्य तमाम व्यवसायिक कम्पनियाँ गंगा के प्रति हमारे सम्मान व धार्मिक आस्था का व्यवसायिक लाभ उठाने के लिऐ इसका गंगाजल को न सिर्फ खुले बाजार में बेच रही है बल्कि इसकी पैकेजिंग के स्थान और मात्रा के हिसाब से इसे अलग-अलग कीमतों पर खुले बाजार में खरीदा जा सकता है। इस सबके बावजूद गंगा-यमुना समेत तमाम नदियों के उद्गम व बहाव वाले क्षेत्रों के इर्द-गिर्द बसे उत्तराखंड के लगभग सभी ग्रामीण, कस्बाई और शहरी इलाके रोजमर्रा की जिन्दगी में पानी की कमी से जूझ रहे है और सरकारी मशीनरी अपनी व्यवस्थाऐं सुदृढ़ करते हुये स्थानीय जनता को पेयजल उपलब्ध कराने के स्थान पर उसे वर्षा के जल को संग्रहित करते हुये पानी की बंूद बचाने और शौचालय के इस्तेमाल करने की नसीहत दे रही है। इन हालातों में अगर कोई कहे कि सरकारी तंत्र वाकई में पर्यावरण संरक्षण को लेकर संवेदनशील है और सरकारी अनुदान अथवा व्यय से होने वाली परिचर्चाओं के दौरान सामने आने वाले तथ्यों पर अमल भी किया जाता है, तो इसे एक गंभीर मजाक की संज्ञा दी जानी चाहिऐं तथा यह समझने की कोशिश की जानी चाहिऐं कि आखिर वह कौन से कारण है जो भारत जैसे संप्रभुता सम्पन्न राष्ट्र के नीति निर्धारकों को दो नावों में पैर रखकर चलने के लिऐ मजबूर करते है। हमने देखा कि देश की राजधानी दिल्ली समेत तमाम महानगरों में वातावरण में तेजी से घुलती जा रही जहरीली गैसों व ठोस अपद्रव्य के रूप वातावरण में बढ़ रहे कार्बन पार्टिकलों ने आम आदमी के जीवन को प्रभावित करना शुरू कर दिया है तथा उत्तराखंड समेत अनेक पर्वतीय राज्यों में बादलों के एक साथ एकजुट होकर एक ही स्थान पर बरस जाने (बादल फटने) की घटनाओं में स्पष्ट तौर पर महसूस की जा रही बढ़ोत्तरी ने दुरूह पर्वतीयत क्षेत्रों में आने वाली प्राकृतिक आपदाओं के दौरान जान-माल के नुकसान का खतरा बहुत बढ़ा दिया है। व्यापक जनहित की पैरोकार मानी जाने वाली लोेकतांत्रिक सरकारों की मजबूर है कि वह इस तरह की विषम परिस्थितियों मे जनसाधारण को यह संदेश दे कि सरकार उनकी कठिनाईयों व दर्द को भली-भांति समझ रही है और उसकी कोशिश इन तमाम समस्याओं के मूल में पहुंचने की है। ऐसा ही कुछ पर्यावरण संरक्षण एवं प्रदूषण उन्मूलन के मामले में भी हो रहा है और हम सरकारी प्रयासों को लेकर आशाविन्त होने के बावजूद आंशकाओ से घिरे हुऐ है।

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