स्थानांतरण व आन्दोलन जैसे मुद्दों पर | Jokhim News

Sunday, July 23, 2017

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स्थानांतरण व आन्दोलन जैसे मुद्दों पर

जल्दबाजी व बिना किसी समझबूझ के, लिऐ जा रहे फैसलों के कारण शक के दायरें मे है त्रिवेन्द्र सरकार शराब व खनन के मुद्दे पर भारी विरोध व किरकिरी के बावजूद अपनी ही धुन में चल रही त्रिवेन्द्र सिंह रावत के नेतृत्व वाली उत्तराखंड की पूर्ण बहुमत वाली सरकार अब भ्रष्टाचार को लेकर जनता के निशाने पर है। हांलाकि सरकार को काम करते हुये अभी इतना वक्त नही हुआ कि उससे जुड़े भ्रष्टाचार के मुद्दे बाहर आकर-जनचर्चाओं का विषय बन सके लेकिन सरकार की घोषणाओं के बावजूद चारधाम यात्रियों से हवाई सेवाओं के लिऐ वसूला जा रहा अंधाधुंध किराया और सरकार द्वारा नौकरशाही में किये गये फेरबदल के क्रम में कुमाँऊ कमिश्नर का स्थानातंरण समेत तमाम ऐसे मुद्दे है जो यह साबित करते है कि भ्रष्टाचार मुक्त सरकार देने का वादा कर प्रदेश की सत्ता के शीर्ष पर काबिज भाजपाई मतदाताओं की खिल्ली उड़ा रहे है। यह ठीक है कि सरकार राज-काज को ढर्रे पर लाने अथवा अपनी जरूरत व व्यवहारिकता के हिसाब से अधिकारियों की स्थानांतरण करती रहती है और नौकरशाही को स्थानांतरित करने के सरकारी अधिकार क्षेत्र पर प्रश्न चिन्ह नही लगाया जा सकता लेकिन वर्तमान सरकार के कार्यकाल की शुरूवात में ही जिस प्रकार जिला अधिकारी बागेश्वर के बदले जाने पर जनता ने सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया है और अब कुमाऊँ कमिश्नर सेंथिल पांडियन के स्थानांतरण को एनएच-74 घोटाले की जांच प्रभावित करने की नीयत से देखा जा रहा है, उसे देखते हुऐ यह स्पष्ट हो जाता है कि भाजपा के नेताओं ने सत्ता के शीर्ष पर काबिज होेते ही अपना खेल शुरू कर दिया है। ठीक इसी प्रकार शराब बिक्री के मामले में यह माना जा सकता है कि सरकारी कामकाज को व्यवस्थित बनाये रखने के लिऐ आवश्यक राजस्व की प्राप्ति एवं अवैध शराब की बिक्री पर रोक लगाने के लिऐ सरकार का शराब के कानूनी व्यवसाय को चलाये रखना व प्रोत्साहन देना आवश्यक है लेकिन सरकारी तंत्र ने यह नही भूलना चाहिए कि लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के तहत गठित सरकारें सीधे तौर पर जनता के प्रति जवाबदेह है और अगर स्थानीय जनता का एक बड़ा हिस्सा (जिसमें लगभग सभी महिला मतदाताओें की सहमति शामिल है) यह नही चाहता कि उसके निवास, ग्राम, ब्लाॅक अथवा जिले के आसपास शराब की बिक्री हो तो सरकार ने शराब के दुकानों को बंद करने के लिऐ आन्दोलन कर रही महिलाओं के खिलाफ पुलिसियाँ कार्यवाही करने के स्थान पर अपनी आय के नये श्रोत तलाशने व शराब की बिक्री को हतोत्साहित करने के प्रयास शुरू कर देने चाहिए। हमने देखा कि राज्य की वर्तमान सरकार किस प्रकार शराब व खनन के माध्यम से राजस्व प्राप्त करने के लिऐ आम आदमी के हितों की अनदेखी कर रही है और सत्ता के शीर्ष पर कब्जेदारी के लिऐ देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक के माध्यम से कई तरह के झूठे वादे व घोषणाऐं करवाने वाले भाजपा के तमाम वरीष्ठ नेता राज्य सरकार के अस्तित्व में आने के बाद से ही अन्र्तध्यान हो गये है। तो क्या यह मानकर चलना चाहिऐं कि त्रिवेन्द्र सिंह रावत उत्तराखंड के तमाम वरीष्ठ भाजपाईयों से तालमेल बनाकर चलने में कामयाब नही हो पा रहे है और ठीक चुनावी मौसम में या फिर इससे पहले कांग्रेस में हुई बगावत के दौरान कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आने वाले तथा चुनाव जीतकर मंत्री तक बन जाने वाले कई भाजपाई विधायक वर्तमान मुख्यमंत्री के लिऐ सरदर्द बन गये है। हांलाकि महत्वाकांक्षाऐं खुद को भाजपा व संघ का कर्मठ कार्यकर्ता कहने वाले विधायकों की भी कम नही है और मंत्रीमण्डल में रिक्त दो स्थानों समेत भाजपा के विधायक मण्डल में मुख्यमंत्री पद के भी अनेक काबिल दावेदार है लेकिन हालातों के मद्देनजर हाल-फिलहाल शान्ति बनी हुई है और अन्दर के झगड़े व सरकार की कार्यशैली को लेकर उफान मार रहा गुस्सा अभी ख्ुालकर बाहर नही आ रहा किन्तु बहुत ज्यादा लंबे समय तक यथास्थिति कायम रह पायेगी, यह कह पाना मुश्किल है। लिहाजा संगठन के शीर्ष स्तर पर तालमेल बनाने की कोशिशें शुरू हो गयी है और अपनी कुर्सी पर मंडराते खतरे को देखते हुऐ त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने भी पूरी जोर-शोर के साथ सरकारी योजनाओं व तीन साल में केन्द्र सरकार द्वारा प्राप्त उपलब्धियों का अलाप शुरू कर दिया है लेकिन उनका र्दुभाग्य यह है कि प्रदेश की जनता ही नहीं बल्कि भाजपा के तमाम समर्थक भी उनकी कार्यशैली में उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सी कर्मठता और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत जैसी लोकप्रियता देखना चाहते है। अफसोसजनक है कि त्रिवेन्द्र सिंह रावत इससे कोसो दूर है और उनके बयानों में वह आक्रामकता व वाकपटुता नही है जो उनके विरोधियों का मुंह बंद कर सत्तापक्ष की ओर से उनकी कार्यशैली पर लग रहे प्रश्न चिन्हों का सधी हुई भाषा में जवाब दे सके। इस कमी को पूरा करने के लिऐ त्रिवेन्द्र सिंह रावत सरकार द्वारा अपनी ही सरकार के एक मंत्री को मीडिया के समक्ष बयान देने के लिऐ अधिकृत करते हुये सरकार का प्रवक्ता घोेषित किया गया और इलैक्ट्रानिक मीडिया के एक पत्रकार (एंकर) को मीडिया प्रभारी के रूप में सामने लाये जाने की घोषणा भी पूरे तामझाम के साथ की गयी लेकिन हालात अभी तक वही ‘ढ़ाक के तीन पात‘ वाले है और सरकारी स्तर पर आ रही खबरों या माननीयों के बयानों से दूर-दूर तक यह नहीं लग रहा है कि सरकार किसी भी स्तर पर अपना बचाव करना चाहती है। प्रदेश में चारधाम यात्रा समेत पर्यटन सीज़न चरम् पर है और अपने बजट सत्र के लिऐ तिथियों की घोषणा कर चुकी सरकार स्थानांतरण विधेयक व लोकपाल विधेयक को जनता की अदालत में प्रस्तुत करने के लिऐ तय समय सीमा की ओर आगे बढ़ रही है। इन हालातों में एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार को चाहिऐ था कि उसका मुखिया व तमाम मंत्री समावेत स्वर में पूरे जोर-शोर के साथ अपना पक्ष रखते हुऐ समाज में चल रही चर्चाओं पर रोक लगाने की कोशिश करते लेकिन सब ‘अपनी-अपनी ढ़पली और अपना अपना राग‘ वाले सुरो में अपनी बात कहने में लगे है तथा राज्य में कार्यक्रमों व सांस्कृतिक आयोजनों की बाढ़ सी आयी हुई प्रतीत होती है। लिहाजा यह समझ पाना मुश्किल है कि प्रदेश में चल रहे आन्दोलनों और सरकारी कामकाज के तौर-तरीको के खिलाफ जोर पकड़ती जा रही जन-चर्चाओं पर सरकार का पक्ष रखने के जिम्मेदारी किसकी है?

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