नारों ओर वाहवाही के बीच | Jokhim News

Monday, December 11, 2017

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नारों ओर वाहवाही के बीच

सरकार द्वारा चलायी जा रही तमाम योजनाओं व प्रचार-प्रसार में दिख रहा है स्थानीय सोच का आभाव।
जल संचय-जीवन संचय, पर्यावरण जागरूकता और स्वच्छ भारत अभियान जैसे नारों से गूंजता उत्तराखंड इन दिनों वाकई सुकून की स्थिति में है क्योंकि प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में रूक-रूक कर हो रही बरसात ने न सिर्फ जंगलों में लगने वाली भीषण आग के काबू में किया है बल्कि बारिश के इस पानी ने सूखते जल-श्रोतो व तेजी से कम होते जा रहे भूगर्भीय जल स्तर को भी पुर्नजीवन दिया है। हांलाकि इस बेमौसम की बारिश के चलते होने वाली बादल फटने की घटनाओं व आपदा का खतरा लगातार बना हुआ है और लगातार अवरूद्ध हो रहे सड़क मार्ग में जान-माल के बढ़ रहे खतरे ने गर्मी के इस मौसम में पहाड़ों की ओर रूख करने वाले पर्यटकों के अलावा स्थानीय यातायात व कामकाज को भी प्रभावित किया है लेकिन इस सबके बावजूद यह कहने में कोई हर्ज नही है कि इस साल पहाड़ों पर हो रही यह बेमौसम की बारिश देश व दुनिया के लिऐ लाभदायक है। शायद यहीं वजह है कि बादलों की इस मेहरबानी से उत्साहित सरकार अपनी जनता को पानी की बूंद-बूंद बचाने, वातावरण में आ रहे बदलाव के प्रति सचेत रहते हुये वृक्षारोपण को बढ़ावा देने तथा खुले में शौच करने की जगह शौचालय का निर्माण करते हुये पाॅलीथीन का उपयोग रोकने जैसे संदेश देना चाहती है और इसके लिऐ त्रिवेन्द्र सिंह रावत सरकार ने अपने मन्त्रियों समेत भाजपा के तमाम छोटे-बड़े कार्यकर्ताओं को मैदान में उतार रखा है लेकिन अगर सरकारी तंत्र की कार्यशैली पर गौर करें तो ऐसा प्रतीत होता है कि सरकारी मशीनरी इन तमाम मंत्रालयों व सरकार की सोच पर पलीता लगाने में जुटी है। सर्वप्रथम पेयजल व्यवस्था की बात शुरू करें तो पहली ही नजर में दिखने वाला सरकारी पाईप लाईनों का रिसाव और जल-निगम अथवा जल संस्थान के माध्यम से बांटे जाने वाले अंधा-धुंध पानी के कनैक्शन खुद ही अपनी कहानी कह देते है तथा शौचालय में पानी के फ्लेश टैंक में एक बोतल रेत डालकर पानी बचाने की बात करने वाले सरकारी तंत्र का भूमिगत् जल के अंधाधुंध दोहन पर मौन खटकता है लेकिन इस सबके बावजूद पहाड़ के नालों और खालों के अलावा प्रदेश के मैदानी इलाकों में पाट दिये गये कुछ तालाबों को पुर्नजीवित करते हुये सरकारी भवनों में वर्षा के जल संचय की दिशा में किये जा रहे प्रयास आशाविंत करते है और यह महसूस होता है कि प्रदेश का प्रत्येक नागरिक अगर अपनी जिम्मेदारी समझे तो वाकई में हम कई मामलों में आत्मनिर्भर व बेफिक्र हो सकते है। यह ठीक है कि सरकारी तंत्र में अफसरशाही की फौज और अधीनस्थों की मौज के चलते योजनाओं को अमलीजामा पहनाने में बड़ा वक्त लगता है और अधिकांश मामलों में यह देखा जाता है कि सरकारी मंत्रणा के बाद बनने वाली तमाम परियोजनाऐं अमल में लाये जाने से पूर्व ही अपना स्वरूप खो बैठती है लेकिन इसके लिऐ सिर्फ राज्य की नौकरशाही व राजनीतिज्ञों को ही जिम्मेदार नही माना जा सकता और न ही इस तथ्य को पूरी तरह प्रमाणित किया जा सकता है कि सरकारी तंत्र में चलने वाले कमीशनखोरी के खेल ने हमारी पूरी व्यवस्था को ही तबाह कर दिया है। अगर व्यापक दृष्टिकोण से देखा जाय तो यह तथ्य स्वंय में स्पष्ट हो जाता है कि जनहित के कार्यों को लेकर जनता की संवेदनशीलता तेजी से घटी है और वह खुद इस तथ्य पर ध्यान नही देना चाहती कि सरकारी संरक्षण में चल रही तथाकथित जनहितकारी परियोजनाओं की वास्तविक स्थिति क्या है या फिर सरकार द्वारा व्यापक जनहित में पारित किये गये बजट की उपयोगिता किस प्रकार निर्धारित की जा रही है। नतीजतन सरकारी कर्मचारी व नौकरशाह जनजागरूकता कार्यकर्मो के नाम पर डुगडुगी पीटकर सम्मानित जनप्रतिनिधियों के क्षेत्रीय कार्यक्रमों व दौरों के दौरान जनता को एकत्र करने या जनसभाओं को सफल बनाने को ही अपना उद्देश्य मान लेते है और योजना के पीछे छुपा अहम् उद्देश्य गौण होकर रह जाता है। शायद यहीं वजह है कि सहीं सोच व समाज की जरूरतों को ध्यान में रखने के बावजूद बनायी जाने वाली तमाम सरकारी योजनाऐं अपने परवान चढ़ने से पहले ही दम तोड़ जाती है और सरकारी तंत्र के तयशुदा ढांचे के तहत किये गये तमाम प्रावधानों के बावजूद देश के प्रधानमंत्री तक को स्वच्छ भारत का नारा देते हुये अपने हाथो में झांडू लेकर निकलना पड़ता है। समझ में नही आता कि अगर किसी सरकारी तंत्र का मुखिया तमाम ढ़ाचागत् व्यवस्थाओं को दरकिनार करते हुये खुद साफ-सफाई का नारा देकर जन सामान्य से अपने आस-पास स्वच्छता रखने का आवहन करता है तो इसे सरकारी तंत्र की असफलता और सरकार के मुखिया के अपने ही तंत्र पर अविश्वास का प्रतीक माना जाय या फिर समाज में आ रहे बदलाव का लेकिन ‘जो दिख रहा है, वो बिक रहा है‘ वाली तर्ज पर खुद को राजनैतिक रूप से जिन्दा रखने के लिऐ आवश्यक समझे जाने वाले टोटको की तरह यह तमाम फामूर्ले सामाजिक रूप से काफी कारगर साबित हो रहे है और यह कहने में कोई हर्ज नही है कि बिना किसी त्याग व बलिदान के सस्ती लोकप्रियता चाहने वाले राजनेता व जनप्रतिनिधि इन तौर-तरीकोे को हाथों हाथ ले रहे रहे है। सवाल यह है कि यह सबकुछ जो भी और जैसे भी चल रहा है उसे वैसे ही चलने दिया जाय या फिर स्थानीय जरूरतों व समय की पुकार को देखते हुऐ सरकार से गुहार की जाय कि वह सामयिक जरूरतों व देश-काल व परिस्थितियों के हिसाब से अपनी सोच में बदलाव लाये और दिल्ली व देहरादून के वातानुकूलित कमरों में बैठकर आम आदमी की समस्याओं पर चिन्तन करते हुये योजनाऐं बनाने का खेल खत्म हो। हमने देखा कि उत्तराखंड के सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों व दुरूह पर्वतीय इलाको को पेयजल उपलब्ध कराने के नाम पर समय-समय पर किस तरह का खेल हुआ और नेताओं व अधिकारियों के गठबंधन ने भूमिगत् पानी के श्रोतों के निकट हैण्डपम्प लगाकर या फिर पानी की टंकी व गूल निर्माण का खेल रचकर किस तरह वाहवाही व सरकारी धन दोेनों की लूट की लेकिन प्रकृति के इस स्वनिर्मित चक्र में जब मानवीय दखलंदाजी भारी पड़ने लगी तो सूखते प्राकृतिक जल श्रोतों व घटते भूमिगत जल को देख सरकार को एक बार फिर याद आया कि पर्यावरण को बचाने के लिऐ पेड़ लगाने व वर्षा के जल को संचित करने का एक अलग ही महत्व है। लिहाजा सरकार एक बार फिर ढ़ोल-तमाशें के साथ आपके द्वार आ रही है और तमाम सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार के साथ जनता से व्यापक जनसहयोग की अपील करते हुये हमारे माननीय जनप्रतिनिधि अपनी व अपनी पार्टी के नेताओं की तारीफो के पुल बांधते हुऐ अगले चुनावों की तैयारी में जुट गये प्रतीत होते है लेकिन दिल्ली व देहरादून से चली योजनाओं को पहाड़ों पर जस का तस प्रचारित व प्रसारित कर रहे इन जन के भाग्य विधाताओं अथवा इनका गुणगान करने वाले चमचों से कोई अगर इतना भर पूछ लें कि पहाड़ में होने वाले शौचालय निर्माण में इस्तेमाल के लिऐ पानी की व्यवस्था क्या है, तो तमाम नौकर शाही व सत्ता के शीर्ष पर काबिज नेता इस कदर बौखला उठते है कि आपको किसी भी क्षण राष्ट्रद्रोही घोषित किया जा सकता है।

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