विकास के दावे व सुधार की गुजांइशों के बावजूद | Jokhim News

Sunday, July 23, 2017

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विकास के दावे व सुधार की गुजांइशों के बावजूद

जारी है अन्तहीन दुर्घटनाओं का सिलसिला यूँ तो उत्तराखंड में मौसम कब खराब हो जाय इसकी कोई गांरटी नही ली जा सकती लेकिन इस सबके बावजूद यहाँ आने वाले पर्यटक गर्मी के मौसम को यहाँ की यात्रा के लिऐ सबसे ज्यादा मुफीद मानते है और चारों धामों के अलावा हेमकुण्ड साहिब के कपाट खुलने व चिलचिलाती हुई गर्मी से निजात पाने की नीयत से अधिसंख्य पर्यटक गर्मी के इन दो महिनों में ही पहाड़ की ओर रूख करते है। उत्तराखंड में पर्यटन को व्यवसाय की तर्ज पर अपनाकर राजस्व अर्जित करने तथा रोजगार के नये संसाधन जुटाने का दावा करने वाली उत्तराखंड की सरकार राज्य निर्माण के बाद से ही इस दिशा में गंभीर पहल करने की घोषणा करती रही है और सरकारी घोषणाओं के क्रम में यहां पर्यटकों की संख्या में बढ़त महसूस भी की जा सकती है लेकिन ऐसा मालूम होता है कि एक बार पर्यटन के लिऐ पहाड़ की ओर रूख करने वाला पर्यटक यहां बार-बार आने को उत्साहित नही होता और हल्की-फुल्की बारिशों की शुरूवातों से ही स्थानीय स्तर पर आपदा आने या फिर व्यवस्था चैपट हो जाने की खबरों तथा खस्ताहाल सड़कों के चलते लगातार बढ़ रही सड़क दुघर्टनाओं की सख्ंया यहां की ओर रूख करने वाले पर्यटकों को दहला कर रख देती है। सरकारी स्तर पर हर बार गर्मी का सीज़न शुरू होने से पहले वनों में लगने वाली आग तथा बरसात की स्थिति में आने वाली आपदा अथवा सड़क दुघर्टना की स्थ्तिियों से निपटने के लिऐ कई-कई दिन तक अभ्यास कार्यक्रम चलाये जाते है और इस बार सब कुछ ठीक-ठाक वाले अंदाज में अधिकारियांे व सत्तापक्ष के नेताओं द्वारा यात्रियों को बेहतर सुविधाऐं देने का वादा किया जाता है लेकिन सही मौका आते-आते सरकारी व्यवस्थाओं की पोल खुलने लगती है और सरकार की इस बदइंतजामी को उजागर करने वाले मीडिया व विपक्ष पर सरकार विरोधी होने के आरोप लगाते हुऐ सत्तापक्ष अपनी नाकामियों को ढ़कने की कोशिशों के साथ आगामी वर्ष में अच्छी व्यवस्थाओं को अंजाम दिये जाने की कोशिशों में जुट जाता है। यह सिलसिला पिछले कई वर्षो से ऐसे ही चल रहा है और पहाड़ की ओर रूख करने वाले पर्यटक आगे आने वाले कुछ वर्षो में व्यवस्थाऐं ज्यादा बेहतर होने की उम्मीदों के साथ अपनी यात्राऐं व अन्य कार्यक्रम टालते जा रहे है। अगर विगत वर्षो में आयी आपदा के उपरांत हरीश रावत सरकार में चारधाम यात्रा मार्गो में हुऐ कुछ व्यस्थागत् सुधारों को छोड़ दिया जाय तो दूर-दूर तक ऐसा नही लगता कि हमारे नेता, सरकारी मशीनरी अथवा राजनैतिक दल उत्तराखंड में पर्यटन व्यवसाय को बचाने के लिऐ संवेदनशील भी है। पर्यटन और पर्यटकों की चिंता एक तरफ रखते हुऐ उन्हें मिलने वाली सामान्य अथवा विशिष्ट स्तर की छोड़ भी दिया जाय तो इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि सड़के पहाड़ की लाइफ लाईन है और रोजाना ही अपनी जिन्दगी से संघर्ष कर रहे हर सामान्य आदमी को इनकी जरूरत का अहसास हमेशा बना रहता है लेकिन हमारी सरकारें राज्य के तमाम सड़क मार्गो व इनपर चलने वाले वाहनों की दुरूस्ती को लेकर फिक्रमंद नही है और लगभग हर सड़क दुघर्टना के बाद उन्हीं रटे-रटाये जुमलों व कुछ छोटे-बड़े मुआवजे के साथ सरकारी तंत्र अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेता है जिसके बाद सबकुछ फिर पहले की ही तर्ज पर चलने लगता है। हांलाकि इसके लिऐ सिर्फ सरकार को ही दोषी नही माना जा सकता और इस तरह की विषम परिस्थ्तिियों में यात्रियों को मंहगी दर पर खान-पान की छोटी-छोटी वस्तुऐं उपलब्ध कराने या फिर फंसे हुऐ यात्रियों से अनाप-शनाप किराया वसूलकर उन्हें छोटे वाहनों के जरिये अधिक सुरक्षित जगहों तक पहुंचा दिया जाना व्यवसायिक दृष्टिकोण का ही एक हिस्सा मान लिया जाता है लेकिन इस प्रकार की वारदातें हमारी छवि पर दूरगामी प्रभाव डालती है और अपनी छुट्टियों का कुछ हिस्सा पहाड़ो के मनोरम वातावरण में बिताने की इच्छा रखने वाले तमाम पर्यटक व इस पहाड़ी प्रदेश के मूल निवासी अपना मन मसोसकर रह जाते है। यह ठीक है कि सरकार के पास मौजूद संसाधन सीमित है और इन सीमित संसाधनो के दायरें में रहकर तमाम व्यवस्थाऐं एक साथ दुरूस्त नही की जा सकती लेकिन सरकार द्वारा यह सुनिश्चित किया जाना तो आवश्यक है कि उसके दिशा-निर्देशों पर बन रही सड़क अथवा अन्य निर्माण कार्यो की न्यूनतम् उम्र क्या होगी और इन सुविधाओं का अपने व्यक्तिगत् हितो के लिऐ इस्तेमाल करने वाले आमोंखास को इसके एवज में क्या शुल्क देय होगा। चार-धाम यात्रा समेत उत्तराखंड के तमाम तीर्थो व ऐतिहासिक पर्यटक स्थलों की ओर रूख करने वाले तीर्थ यात्री व पर्यटक यह मानकर चलते है कि इस दुरूह यात्रा में छुटपुट कष्ट होना तो अवश्यम्भावी है और यात्रा सीज़न के दौरान पेश आने वाली कोई आकस्मिक दुघर्टना जीवन-मृत्यु के सवाल पर एक प्रश्चचिन्ह खड़ा कर सकती है लेकिन अगर सरकार के जिम्मेदार मंत्री या फिर नौकरशाह ही यह बयान देने लगे कि चार धाम यात्रा अथवा उत्तराखंड के किसी अन्य धार्मिक स्थल की यात्रा करने वाला यात्री यात्रा के दौरान होने वाली किसी दुघर्टना में मृत्यु होने की स्थिति में सीधे मोक्ष को प्राप्त होगा, तो इन स्थितियों में इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ना लाजमी है। प्रदेश में नयी सरकार के अस्तित्व में आने के बाद देश के प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति के अलावा कई अन्य काबीना मन्त्रियों व विशिष्टजनों द्वारा किये गये चार धाम मन्दिरों के दर्शन के बाद एकबारगी के लिऐ ऐसा लगा था कि हिन्दुत्व को अपना प्राथमिक आधार मानने वाली भाजपा के राज में उत्तराखंड के दिन बहुरेेंगे और देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कथनों के अनुसार केन्द्र के साथ ही साथ उत्तराखंड में भी भाजपा के सत्ता में आ जाने से लगने वाला विकास का डबल इंजन प्रदेश के हालात बदलकर रख देगा लेकिन अपने कार्यक्रमों के दौरान उत्तराखंड के हितो को लेकर चुप्पी ओढ़े रहे केन्द्र सरकार के तमाम मंत्री व नेता तथा विकास के नाम पर अपने अग्रजों का गुणगान करते हुऐ पहाड़ों पर रेल व आल वेदर रौड जैस शिगूफे छोड़ते दिख रहे प्रदेश सरकार के सभी मंत्री इस तथ्य को प्रमाणित करते है कि भाजपा का नेतृत्व इस राज्य के वर्तमान हालातो को लेकर कतई भी चिन्तित नही है और न ही हाल-फिलहाल पहाड़ों की सड़कों के यातायात के लिऐ सुरक्षित होने व वाहनों के दुघर्टना मुक्त होने की उम्मीद की जा सकती है। पहाड़ी मार्गो पर लगातार खिसकते पत्थर, धंसती सड़के और बरसाती मौसम में सड़को पर आने वाले मलबे के अलावा क्षमता से अधिक सवारियांे के साथ चलने वाले डग्गामार वाहन, ऐसी समस्याऐं है जिनका निदान प्रशासनिक तत्परता व व्यवस्थागत् खामियों को दूर करके आसानी से ढ़ूंढ़ा जा सकता है लेकिन किसी भी सरकार अथवा नेता ने आज तक इस ओर पहल नही की है और न ही प्रदेश की जनता इन तमाम खामियों के खिलाफ एकजुटता के साथ आवाज उठाने को तैयार है। इसलिऐं पयर्टन की अपार संभावनाओं के बावजूद हम आज भी यह कहने की स्थिति में नही है कि व्यवसायिक दृष्टि व रोजगार श्रृजन की आवश्यकताओं को देखते हुऐ पर्यटन व्यवसाय को अपनाना इस राज्य की युवा पीढ़ी के लिऐ एक बेहतर विकल्प हो सकता है और विकल्प के आभाव में पहाड़ों से पलायन कर रही युवा पीढ़ी व नौनिहालों को हम सिर्फ लोकसंस्कृति या परम्पराओं के नाम पर पहाड़ों से बांधे नहीं रह सकते हैं।

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