बतौलेबाजी के तीन साल | Jokhim News

Sunday, July 23, 2017

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बतौलेबाजी के तीन साल

तेजी से आगे बढ़ रहे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की घेराबंदी में विपक्ष पूरी तरह नाकाम देश की सत्ता पर काबिज नरेन्द्र मोदी अपने तीन साल पूरे कर चुके है और इन पिछले तीन सालों में उन्होंने न सिर्फ देश के हर कोने में भाजपा का परचम लहराने का प्रयास किया है बल्कि चुनावी राजनीति के वह अकेले व एकमात्र ऐसे चेहरे रहे है जिनके नाम पर देश के लगभग हर कोने में वोटो की जमकर बरसात हुई है। हांलाकि यह आश्चर्यजनक हो सकता है कि अपने चुनावी वादो व नारो पर पूरी तरह अमल न करने के बावजूद लोग किस तरह मोदी जी की जुमलेबाजी पर भरोसा कर लेते है लेकिन यह सच है कि वर्तमान में नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय राजनीति के एकमात्र ऐसे चेहरे है जिसे समाज के हर वर्ग का समर्थन लगातार मिल रहा है और प्रधानमंत्री के रूप में उनके या उनकी सरकार द्वारा लिये गये कई निर्णयों से असहमति के बावजूद विपक्ष केन्द्र सरकार या भाजपा की घेराबंदी में नाकाम ही दिख रहा है। अगर हम तुलनात्मक आधार पर चर्चा करें तो यह स्पष्ट दिखता है कि पूर्ववर्ती मनमोहन ंिसंह सरकार की तरह ही मोदी सरकार में भी मंहगाई बेतरतीब बढ़ी है और देश के विभिन्न हिस्सों में आंतकवादी व अलगाववादी गतिविधियों में कोई कमी नही आयी है। ठीक इसी प्रकार रोजगार के अवसर कम हुऐ है और सरकार द्वारा वसूले जाने वाले करों में वृद्धि हुई है। किसानों द्वारा आत्महत्या करने का सिलसिला जारी है और पूर्व सैनिकों में भी अपनी पेंशन व अन्य देयको को लेकर आक्रोश थमा नही है। उपरोक्त के अलावा केन्द्र सरकार ने रसोई गैस में दी जाने वाली सरकारी सब्सिडी का दायरा सीमित करते हुऐ इसमें मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया को खुले बाजार को सौंप दिया है जबकि सरकारी सस्ते गल्ले की दुकानों में मिलने वाले राशन में कटौती जारी है और सरकार सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे लाभार्थी के खाते में पहुंचाने के नाम पर अन्य कई तरह की कटौतियाँ लागू करने की कोशिशें कर रही है लेकिन इस सबके बावजूद मोदी का जादू थमने का नाम नही ले रहा और मजे की बात यह है कि मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा व्यापक जनहित में नरेन्द्र मोदी को एक बार फिर मौका देने के मूड में दिखाई दे रहा है। यह ठीक है कि भारतीय लोकतातांत्रिक व्यवस्थाओं के तहत होने वाले चुनावों में जीत हासिल करना या फिर सरकार का गठन करना एक तकनीकी खेल है और मतविभाजन व मुद्दों के आधार पर मतदाताओं को एकजुट करने की जगह उन्हें नीतियोे, सिद्धान्तों या फिर धार्मिक एकता का पाठ पढ़ाकर एकजुट करने के खेल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व उनके समर्थक महारथ हासिल कर चुके है लेकिन भाजपा, मोदी या फिर मोदी समर्थकों की इन तमाम पैतरेबाजियों के खिलाफ कोई भी संगठित आवाज नही उठ रही है और न ही कोई जननेता मोदी सरकार की ज्यातियों के खिलाफ खड़ा होकर राष्ट्रीय जंग का ऐलान करने को तैयार दिख रहा है। हमने देखा कि देश के उच्चतम् न्यायालय द्वारा शराब की दुकानों को राष्ट्रीय राजमार्गो से हटाये जाने के संदर्भ में दिये गये निर्णय के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में लगातार शराब विरोधी आन्दोलन चल रहे है और सीधे तौर पर राज्य सरकारों का विषय होने के बावजूद कोई भी बड़ा नेता इन आन्दोलनों की कमान संभालने को तैयार नही है। क्या वजह है कि हमेशा मुद्दों की तलाश में रहने वाला विपक्ष आज मुद्दो की बात करने के स्थान पर केवल सत्तापक्ष पर आरोंप लगा अपने कर्तव्य की इतिश्री मान रहा है और सरकारों के कामकाज पर नजर रखने का दावा करने वाला मीडिया आम जनता की आवाज बनने की जगह सरकारी भोपू की तरह उन्ही खबरों को तवज्जों दे रहा है जो या तो सिर्फ सरकार का गुणगान करती हो या फिर जिन चर्चाओं पर बहस होने से जनमानस का ध्यान अपनी रोजमर्रा की समस्याओं से हटता हो। हांलाकि स्थानीय स्तर पर कुछ पत्र-पत्रिकाऐं व छोटे अखबार अपने सीमित प्रयासों से इन समस्याओं को उठाने व आम आदमी की आवाज बनने का प्रयास कर रहे है लेकिन केन्द्र सरकार ने बड़ी ही चालाकी के साथ उनपर बंदी की तलवार लटका दी है और संसाधनों के आभाव व धन की कमी से हमेशा ही जूझने वाले इन प्रकाशनों के मालिक धीरे-धीरे कर अपने हाथ पीछे खींचने लग गये है। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि देश के राजनैतिक इतिहास में पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता के शीर्ष पर पहुंचे किसी गैर कांग्रेसी राजनैतिक दल ने अपने शुरूवाती तीन साल का शासन बखूबी व बिना किसी विरोध के पूरा कर लिया है और मजे की बात यह है कि अपनी ही घोषणाओं को पूरा करने व योजनाओें की क्रियान्वित करने में पूरी तरह असफल रहने के बावजूद देश का विपक्ष एकजुटता के साथ सत्तापक्ष का विरोध करने की स्थिति में नही है। कितना आश्चर्यजनक है कि आज हमारे देश में बेरोजगारी व आय के नये संसाधन खड़े करने के लिऐ गंभीरता से चिन्तन करने को कोई तैयार नही है लेकिन तीन तलाक के मुद्दे पर सिर्फ न्यायालय ही नही बल्कि गली, मोहल्लों व चैराहों से लेकर टीवी चैनलों तक गरमागरम बहस का सिलसिला जारी है और मजे की बात यह है कि इस बहस में आगे बढ़कर भागीदारी के लिऐ वह वर्ग ज्यादा उत्सुक है जो इससे प्रभावित ही नही होता। ठीक इसी प्रकार नोटबंदी में हुई आम जनता को तकलीफ मौजूदा सरकार के लिये चिन्तन का नही बल्कि फक्र का विषय है और सड़क-चैराहों से लेकर सत्ता के उच्च सदनों तक में प्रधानमंत्री के घोषित-अघोषित प्रवक्ता इसे सरकार की ऐतिहासिक पहल बताते है तथा इसके तात्कालिक हानि-लाभ पर आंकड़ों के साथ चर्चा करने की स्थिति में वही इसके दूरगामी प्रभावों पर ज्यादा बल देते प्रतीत होते है। कुछ लोगों का मानना है कि अपने इन तीन सालों के शासनकाल मंे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश में अघोषित आपातकाल लागू कर दिया है और सरकारी मशीनरी व सीबीआई के दुरूपयोग द्वारा सरकार के विरोध में उठने वाले तमाम सुरो को एक-एक कर बंद किया जा रहा है या फिर विपक्षी नेताओं को सत्ता में बने रहने की गारन्टी पर अपने साथ आने केा मजबूर किया जा रहा है लेकिन मजे की बात यह है कि सरकार द्वारा किये जा रहे इस तरह के प्रयोगो का कहीं कोई विरोध नही है और न ही जनता विपक्ष के आरोंपो की बहुत ज्यादा गंभीरता से ले रही है बल्कि अगर इन पिछले दो-तीन सालों के प्रमुख राजनैतिक घटनाक्रमों पर गौर करें तो यह अंदाजा आता है कि भाजपा में शामिल होेनेे के बाद राष्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय राजनीति के अनेक चर्चित नाम चुनावी जीत हासिल कर सरकार में शामिल है और इस अंतराल में उनके भ्रष्टाचार व अन्य काले कारनामों को लेकर कहीं कोई चर्चा नही है जबकि केजरीवाल व राहुल गांधी जैसे नेताओं पर लगातार राजनैतिक व चारित्रिक हमले जारी है और आरक्षण की नाव पर बैठकर अपना राजनैतिक सफर शुरू करने का प्रयास करने वाले हार्दिक पटेल या फिर छात्रों व नौजवानों को एकजुट कर क्रान्ति का आवहन करने वाले कन्हैय्या जैसे नेता मैदान छोड़कर ही गायब है। हालातों के मद्देनजर यह अंदजाा लगाया जाना मुश्किल नही कि धीरे-धीरे कर अगले आम चुनाव की ओर बढ़ रहे देश प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने प्रतिद्वन्दियों को बहुत पीछे छोड़ते जा रहे है और यह कहने में भी कोई हर्ज नही है कि चुनाव दर चुनाव उनका कारंवा लगातार बढ़ा होता जा रहा है लेकिन सवाल यह है कि मोदी को सत्ता के शीर्ष पर स्थापित करने वाली जनता को इस उपलब्धि की एवज में क्या कुछ पारितोषिक मिलने वाला है। इस सवाल का स्पष्ट जवाब देने को भाजपा या मोदी में से कोई भी तैयार नही है क्योंकि अन्य तमाम नेताओं की तरह यह भी सपना के सौदागर है।

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