एक और नये मोर्चे की शुरूवात | Jokhim News

Friday, June 23, 2017

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एक और नये मोर्चे की शुरूवात

ग्रामीण क्षेत्रों को स्थानीय नगर निकायों में शामिल करने के विरूद्ध आन्दोलन की सुगबुगाहट शुरू ।
उत्तराखंड में पिछले दो महिने से भी अधिक समय से चल रहे शराब की दुकानों के विरोध के बाद अब लगभग पूरे प्रदेश में एक नये आन्दोलन की सुगबुगाहट साफ सुनाई दे रही है और यह तय है कि अगर सरकारी तंत्र व सत्ता पर काबिज नेताओं ने इस आन्दोलन की भी अनदेखी की तो, आने वाले कल में भाजपा को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते है। यह ठीक है कि शराबबंदी का मुद्दा अति संवेदनशील व महिलाओं से सीधा जुड़ा होने के बावजूद भी एक प्रदेश व्यापी आन्दोलन का रूप नही ले पाया और राज्य की नवगठित सरकार को स्थानीय स्तर पर चल रहे छुटपुट आन्दोलनों से अभी तक कोई विशेष राजनैतिक नुकसान भी नही हुआ क्योंकि किसी भी राजनैतिक दल ने इस आन्दोलन को बहुत ज्यादा तवज्जों नही दी और स्थानीय स्तर पर एकजुटता के आभाव में कोई भी बड़ा राजनैतिक या सामाजिक चेहरा महिलाओं के इस आन्दोलन को प्रदेशव्यापी रूप देने आगे नही आया लेकिन इस दूसरे मामले में हालत बिल्कुल जुदा है और इस मामले के सीधे तौर पर ग्रामीण क्षेत्र के नेताओं व जनप्रतिनिधियों से जुड़े होने के कारण इसके व्यापक विरोध की संभावना है। ध्यान रहे कि राज्य सरकार नगर निगम, नगर पालिका व नगर पंचायतों का दायरा बढ़ाते हुऐ कुछ नये ग्रामीण इलाकों को इसमें शामिल करना चाहती है और पूर्व में घोषित कई नगर पंचायतों व नगर पालिकाओं का सींमाकन किये जाने के अलावा कुछ अन्य नगर पालिकाओं को भी नगर निगम बनाये जाने की सुगबुगाहट भीतर ही भीतर चल रही है लेकिन सरकार की इस कवायद का ग्रामीण स्तर पर विरोध शुरू हो गया है तथा ग्रामीण क्षेत्रों में प्रदेश की तमाम नगर पालिकाओं, नगर निगमों या फिर नगर पंचायतों की कार्यशैली को लेकर सवाल दागे जा रहे है और यह स्पष्ट तौर पर दिखने लगा है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की अन्तिम कड़ी मानी जाने वाली ग्राम पंचायत तक के स्तर से सरकार की घेराबंदी की कोशिशें शुरू हो गयी है। प्रदेेश के मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को भी खुलकर इस आन्दोलन में कूदने से कोई हर्ज प्रतीत नही होता बल्कि कांग्रेस के तमाम वरीष्ठ नेताओं का मानना है कि न्याय पंचायत स्तर से उठने वाले इन सरकार विरोधी सुरों के साथ अपना सुर मिलकार कांग्रेसी न सिर्फ अपने खोये जनाधार को वापस पाने की प्रक्रिया को शुरू कर सकते है बल्कि स्थानीय जनता को भी यह संदेश दिया जा सकता है कि चुनावी हार के बाद अपने अन्दरूनी झगड़ों से ही हलकान नजर आ रहे इस राजनैतिक दल को जनता द्वारा नकारे जाने के बावजूद भी व्यापक जनहित की चिन्ता है। हकीकत में देखा जाय तो हाल ही के विधानसभा चुनावों में मिली भारी-भरकम जीत के बावजूद भाजपा की स्थिति प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत नही मानी जा सकती और राज्य की अधिकंाश ग्राम पंचायतों व विकास खण्डों पर कांग्रेसी विचारधारा वाले कार्यकर्ताओं की कब्जेदारी से इनकार नही किया जा सकता। उपरोक्त के अलावा प्रदेश की तमाम ग्राम सभाओं व ग्रामीण इलाकों को बढ़ रहे शहरीकरण के नाम पर नगर पालिकाओं, नगर निगमों अथवा नगर पंचायतों में शामिल किये जाने के फरमान के बाद इन तमाम ग्राम सभाओं व अन्य संवैधानिक पदो पर काबिज अथवा इनकी दावेदारी करने वाले ग्रामीण नेताओं के बीच पूर्ण बेरोजगारी के हालात पैदा हो जाने का खतरा है या फिर इन ग्राम पंचायतों के निकटवर्ती क्षेत्रों में दावेदारों की संख्या बढ़ने का अनुमान एक नयी तरह की राजनैतिक प्रतिद्वन्दिता को जन्म दे सकता है। इसलिऐ प्रदेश के तमाम ग्रामीण अंचलों में कार्य कर रहे विभिन्न राजनैतिक दलो से जुड़े जनप्रतिनिधि या फिर ग्राम समाज से जुड़े संवैधानिक पदो के सभी दावेदार आपसी वैमनस्य या राजनैतिक प्रतिद्वन्दिता को छोड़कर एक साथ व एक झण्डे के नीचे आकर सरकार के इस फैसले का विरोध करने का मन बना रहे है और अगर वाकई ऐसा होता है तो आने वाले कल में त्रिवेन्द्र सिंह रावत के नेतृत्व वाली प्रदेश की भाजपा सरकार की मुसीबतें बढ़ सकती है। हालांकि इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि राज्य बनने के बाद इन पिछले सत्रह सालों में उत्तराखंड का जनसंख्यकीय ग्राफ बहुत तेजी से बदला है और सुदूरवर्ती पहाड़ी क्षेत्रों में स्पष्ट झलकने वाले सुविधाओं के आभाव ने न सिर्फ राज्य के मैदानी इलाकों में पड़ने वाले शहरों व कस्बो की जनसंख्या का घनत्व बढ़ाया है बल्कि तमाम जिला मुख्यालयों व कस्बाई या शहरी इलाकों से लगते हुऐ ग्रामीण क्षेत्रों में भी आबादी तेजी से बढ़ी है। इन हालातों में इन तमाम क्षेत्रों में जन सुविधाओं का चरमराना लाजमी है और सरकार का तर्क है कि वह शहरी अथवा कस्बाई क्षेत्रों से लगे तमाम ग्रामीण क्षेत्रों को नगर निगम, नगर पालिका या फिर नगर पंचायत के दायरें में लाकर स्थानीय निवासियों को प्रदत्त की जाने वाली सरकारी सुविधाओं व अपने संसाधनों में बढ़ोत्तरी करना चाहती है लेकिन पूर्व से ही चले आ रहे नगर निगमों, नगर पालिकाओं व नगर पंचायतों की ध्वस्त व्यवस्थाऐं व आम आदमी की पहुँच से दूर दिखने वाली जन सुविधाऐं कुछ और ही कहानी कहती है। शायद यही वजह है कि राज्य के ग्रामीण इलाके में रहने वाली जनता अपने स्थानीय प्रतिनिधियों की राय से सहमति व्यक्त करते हुऐ सरकार के इस फैसले के खिलाफ सड़कों पर उतरने का मन बना रही है। भाजपा संसदीय दल के नेता के रूप में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री की कुर्सी संभालने के बाद स्वच्छता अभियान का नारा देते हुऐ देश की जनता से अपने आसपास साफ सफाई रखने का आहवान किया था और सरकारी स्तर पर इस तरह के तमाम प्रयास के अलावा इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिऐ स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक विभिन्न प्रकार के कर भी वसूले जा रहे है लेकिन हालात वहीं ढ़ाक के तीन पात वाले है तथा स्थानीय निकायों में विभिन्न स्तरों पर स्पष्ट दिखने वाले भ्रष्टाचार के चलते न सिर्फ विकास कार्य अटके पड़े है बल्कि शहरी क्षेत्र के अलावा कस्बाई इलाको व निकटवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में लगे कूड़े के ढ़ेर, सीवर लाइन के नाम पर बेतरतीब खुदी सड़के तथा पानी, बिजली या फिर टेलीफोन लाईन के नाम पर लगभग रोजाना ही होने वाला सड़को का सत्यानाश एक स्थायी समस्या है। हालातों के मद्देनजर सरकार को चाहिऐं था कि वह नगर निगम, नगर पालिका अथवा नगर पंचायतों का दायरा बढ़ाने से सम्बन्धित कोई भी फैसला लेने से पहले इन स्थानीय निकायों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले तमाम रिहायशी इलाकों में जन सुविधाओं को बहाल करती और स्थानीय स्तर पर रोजमर्रा ही पेश होने वाली समस्याओं का स्थायी हल निकाला जाता तथा इन स्थानीय निकायों के साथ लगे ज्यादा आबादी वाले ग्रामीण क्षेत्रों में भी प्राथमिकता के आधार पर इन तमाम सुविधाओं को बहाल किया जाता लेकिन सरकारी तंत्र किसी भी प्रकार की जिम्मेदारी लेने की जगह इन तमाम समस्याओं का ठीकरा स्थानीय निकायों के सर फोड़ देना चाहता है और सत्ता पर काबिज राजनेता व राजनैतिक दल अपने हाथों में झाड़ू पकड़कर फोटो खिंचा देश व राज्य की जनता को अपने आसपास साफ-सफाई रखने का संदेश मात्र देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान रहे है। इन हालातों में राज्य की जनता सरकार द्वारा जल्दबाजी में तथा बिना किसी प्राथमिक तैयारी के लिऐ गये इस फैसले के खिलाफ सड़कों पर उतरती है तो इसे गलत नही कहा जा सकता और न ही इस जनान्दोलन की सफलता को लेकर कोई संदेह किया जा सकता है। हमें ध्यान रखना चाहिऐं कि पूर्ववर्ती हरीश रावत सरकार ने नैनीताल जिले के बिन्दुखत्ता क्षेत्र को जनता की मांग के अनुरूप राजस्व ग्राम घोषित करने के स्थान पर उसे नगर पालिका क्षेत्र घोषित करने का निर्णय लिया और भारी जन विरोध के बाद एक साल के भीतर ही अपनी तमाम तैयारियाँ को निरस्त करते हुऐ सरकार को यह फैसला वापस लेना पड़ा। ठीक ऐसा ही हश्र सरकार के इस फरमान का होना भी निश्चित है बशर्ते कि जनप्रतिनिधि ईमानदारी से अपनी भूमिका निभाये और रहा सवाल स्थानीय स्तर पर समस्याओं के निराकरण व जन सुविधाओं का तो यह समझ नही आता कि रामराज्य की परिकल्पना प्रस्तुत करने वाला राजनैतिक दल इन तमाम ग्रामीण इलाकों को जन सुविधाओं से क्यों नहीं जोड़ सकता। वैसे भी देश के वर्तमान प्रधानमंत्री ने अपनी कुर्सी संभालते ही भाजपा के एक सांसद द्वारा प्रतिवर्ष एक गांव का कायाकल्प करने की घोषणा की थी। थोड़ी देर से ही सही लेकिन अब वक्त आ गया है कि प्रदेश सरकार तमाम ग्रामीण क्षेत्रों को नगर पालिकाओं, नगर निगमों या नगर पंचायतों में शामिल करने की जिद छोड़कर अपने सांसदों के सहयोग से इन गाँवों का कायाकल्प करने की कोशिश करें।

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