दो तिहाई बहुमत के बावजूद | Jokhim News

Sunday, July 23, 2017

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दो तिहाई बहुमत के बावजूद

शुरूवाती दो महिनो में कोई विशेष प्रभाव छोड़ने में असफल रही उत्तराखंड की त्रिवेन्द्र सिंह रावत के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ।
अगर फैसलों और सरकार के कामकाज के तरीको को आधार बनाकर देखा जाय तो उत्तराखंड की त्रिवेन्द्र सिंह रावत के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार को कम करके नही आंका जा सकता लेकिन रणनैतिक तौर-तरीको के आभाव व मंत्रीमण्डल में आपसी सामजस्य की कमी को देखते हुऐ सरकार के फैसले परवान नही चढ़ पा रहे है और ऐसा लग रहा है कि सरकार सिर्फ खनन व आबकारी नीति के मायाजाल में ही उलझी हुई है। हांलाकि सरकार ने अपनी नीतियों को ठीक ढ़ंग से जनता तक पहुंचाने के लिऐ एक मीडिया सलाहकार की भी नियुक्ति की है और यह माना जा रहा है कि पर्वतीय पृष्ठभूमि से जुड़े नये मीडिया सलाहकार रमेश भट्ट पहाड़ी जनजीवन के संदर्भ में अपनी जानकारी व ज्ञान का उपयोग करते हुये सरकार की वाह-वाही में चार चाँद लगाने का प्रयास करेंगे लेकिन सरकारी सूचना तंत्र को मजबूती दिये बिना यह सब कुछ कैसे संभव हो पायेगा, कहा नही जा सकता । प्रदेश का सरकारी सूचना तंत्र कहा जा सकने वाला सूचना एवं लोकसम्पर्क निदेशालय वर्तमान में समाचार पत्रों की सूचीबद्धता व विज्ञापन नीति के सवालों में उलझा हुआ है और इस तरह की तमाम कार्यवाहियों को अंजाम देने के लिऐ बनायी गयी तमाम कमेटिया पूरी सक्रियता से काम करने के बावजूद किसी अन्तिम निष्कर्ष तक पहुंच पायेंगी, इसमें संदेह ही है। इन हालातों में मीडिया सलाहकार किस तरह अपने किरदार को अंजाम दे पायेंगे और पत्र-पत्रिकाओं व समाचार पत्रों के अलावा इलैक्ट्रानिक चैनलों को विज्ञापन दिये जाने के संदर्भ में उनकी रणनीति पूर्ववर्ती सरकारों से कितनी भिन्न होगी, यह कहा नही जा सकता लेकिन इतना तय है कि सरकार के भीतर उठ रहे विरोध के सुरो के बावजूद त्रिवेन्द्र सिंह रावत की सरकार को हाल-फिलहाल कोई खतरा नही है और न ही विरोधी इस स्थिति में है कि वह सरकार गिराने या फिर अपने विरोध को किसी भी अंजाम तक पहुंचाने की सोच भी सके। यह ठीक है कि शराब के विरोध में लगभग पूरे उत्तराखंड में चल रहा महिलाओं का आन्दोलन एक पूर्ण बहुमत सरकार के लिऐ धब्बे की तरह है और इससे यह साबित भी होता है कि चुने गये जनप्रतिनिधियों के माध्यम से पूर्ण जनमत साथ होने का दावा करने वाली तथाकथित लोकहितकारी सरकारों की कथनी व करनी में कितना फर्क होता है लेकिन इस सबके बावजूद यह कहना मुहाल नही होगा कि प्रदेश के गली-महोल्ला स्तर पर चल रहे इन तमाम छोटे-छोटे आन्दोलनों को एकजुट कर बड़े जन विरोध में बदला जा सकता है या फिर अपने ही झगड़ों व टन्टो में उलझा विपक्ष इस तरह के आन्दोलनों से कोई फायदा उठा सकता है। जहाँ तक सरकार की उपलब्धियों का सवाल है तो नई सरकार के अस्तित्व में आने के बाद कण्डी रोड को सार्वजनिक यातायात के लिऐ खोला जाना ही इस सरकार की इतनी बड़ी उपलब्धि थी कि अगर इसे ढ़ंग से प्रचारित किया गया होता तो निश्चित रूप से जनता के बीच सरकार की कार्यशैली की प्रशंसा होती लेकिन इसे भाजपा के बड़े नेताओं का दबाव कहे या फिर सरकार की नातजुर्बेकारी का नतीजा कि सरकार कण्डी रोड को लेकर अपना फैसला तेजी से अमल में लाने की जगह प्रदेश की जनता के बीच -‘आल वेदर रोड‘ और ‘रेल से चारधाम यात्रा‘ जैसे शगूफे छोड़ रही है। यह ठीक है कि प्रदेश की जनता को सुगम यातायात के लिऐ आल वेदर रोड की जरूरत है और पहाड़ पर रेल चलाये जाने की कल्पना ही रोमांचकारी है लेकिन इन दोनों ही परिकल्पनाओं को जमीन में उतरते-उतरते काफी वक्त लगना तय है जबकि पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता पर काबिज सरकार से जनता को तत्काल प्रभाव से व्यापक जनहित के फैसले लिये जाने की उम्मीदें होती है। ठीक इसी प्रकार प्राथमिक व माध्यमिक स्तर की शिक्षा के क्षेत्र में राज्य गठन के बाद यह शायद पहला मौका है जब अध्यापको में अपने स्थानांतरण को लेकर कोई अफरा-तफरा नही है और न ही कुछ जुगाड़ किस्म के नेता या दलाल सरकार मेें अपनी उपर तक पहुंच का दावा करते हुऐ दूरस्थ पहाड़ी क्षेत्रों में कार्यरत् अध्यापकों को मैदानी इलाकों में स्थानांतरित करने का सुविधाशुल्क वसूलते दिख रहे है। शिक्षा विभाग में पिछले दिनों हुआ बढ़ा उलटफेर तथा अतिथि शिक्षकों के संदर्भ में सरकार के बड़े फैसले के बावजूद दूर-दूर तक कहीं भी नही सुनाई दे रही आन्दोलन की सुगबुगाहट इस तथ्य का प्रमाण है कि कर्मचारी वर्ग के बीच सरकार के काम करने के तरीके को लेकर विश्वास बढ़ा है और निजी स्कूलों के संदर्भ में सरकार द्वारा पिछले दिनों लिऐ गये एडमीशन फीस न लेने जैसे कई फैसले यह साबित करते है कि सरकार वाकई में व्यापक जनहित में काम कर रही है लेकिन इस सबके बावजूद संचार के विभिन्न माध्यमों व जनचर्चाओं में यह जिक्र सरेआम है कि सरकार ठीक ढ़ंग से काम नही कर पा रही है या फिर उत्तर प्रदेश के नवनियुक्त मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के मुकाबले हमारे मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ज्यादा मुखर नही है और इन तमाम जनचर्चाओं पर लगाम लगाने के लिऐ जरूरी है कि सरकार अपने प्रचार तंत्र को मजबूत करें । हांलाकि यह कहना कठिन है कि त्रिवेन्द्र सरकार द्वारा किया गया इस तरह का कोई भी मैनेजमेन्ट सरकार के भीतर से आ रही बगावत की खबरों या फिर सरकार के कुछ मन्त्रियों द्वारा प्रदर्शित किये जा रहे जबरदस्ती के राष्ट्रवाद को ले उड़ने में मीडिया पर कोई लगाम लगा लेगा लेकिन इतना तय है कि तरह के प्रयासों के बाद सरकार द्वारा व्यापक जनहित में किये जा रहे प्रयासों पर भी सकारात्मक रूप से चर्चा शुरू हो पायेगी और विपक्ष के लिऐ यह कहते हुऐ सरकार को घेरना कठिन होेगा कि मौजूदा सरकार सिर्फ खनन व्यवसायियों व शराब कारोबारियों के हितो को ध्यान में रखते हुऐ ही कार्य कर रही है। यह ठीक है कि सरकार के समक्ष चुनौतियाँ कम नही है और एक बार फिर सत्ता हाथ में आने के बाद संगठन के कार्यकर्ताओं व कई बार चुने जा चुके विधायकों के अलावा मौजूदा सरकार के मन्त्रियों की निजी महत्वाकांक्षाऐं भी कुंलाचे मार रही है लेकिन इस सबके बावजूद त्रिवेन्द्र सिंह रावत की कुर्सी को कोई खतरा नही है क्योंकि भाजपा हाईकमान के रूप में मोदी व अमित शाह की जोड़ी का आर्शीवाद उनके साथ बना हुआ है। इसी तथ्य को अगर दूसरे नजरिये से देखे तो यही त्रिवेन्द्र सिंह रावत सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी भी है क्योंकि वह अपने राजनैतिक प्रभाव के स्थान पर मोदी व अमित शाह के आर्शीवाद से कुर्सी पर बने हुऐ है और प्रदेश की जनता ने इस विधानसभी चुनाव में सिर्फ मोदी के नाम पर ही मतदान किया है। इसलिऐ प्रदेश की जनता को नरेन्द्र मोदी से बहुत सी अपेक्षाऐं है और शायद यही वजह भी है कि इस बार गांव-देहात से लेकर शहरी क्षेत्र तक की महिलाऐं शराबबंदी को लेकर मुखर दिखाई दे रही है। मोदी के आर्शीवाद व राजनैतिक प्रभाव से प्रदेश की सत्ता पर काबिज उत्तराखंड की डबल इंजन वाली भाजपा सरकार से जनता की अपेक्षा है कि वह प्रदेश के विकास में दिल खोलकर सहयोग करेगी और वित्तीय संकट के दौर से गुजर रहे उत्तराखंड को विकास के मोदी माडल के अनुरूप एक विशिष्ट राज्य घोषित किया जायेगा लेकिन सम्पूर्ण भारत में अपनी विजय पताका लहराने के राजनैतिक प्रयासों के तहत जनसामान्य के बीच कई झूठे-सच्चे वादे करने वाले देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इन तमाम तथ्यों से अनजान है और केन्द्र सरकार द्वारा प्रस्तुत वार्षिक बजट में उत्तराखंड को लेकर कोई विशेष रियासत अथवा घोषणा की भी अभी कोई उम्मीद नही है। इन हालातों में अगर उत्तराखंड की त्रिवेन्द्र सिंह रावत के नेतृत्व वाली सरकार को लेकर जनता की बीच नकारात्मक छवि बनती है तो इसका असर सिर्फ त्रिवेन्द्र या उत्तराखंड भाजपा पर नही बल्कि सीधे केन्द्र सरकार पर पड़ता है और शायद यही वह वजह है जो त्रिवेन्द्र सरकार के विरोध में उठने वाले तमाम बगावती तेवरों के संभाले हुऐ है।

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