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Monday, December 11, 2017

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बड़े हुये लक्ष्य के साथ

लगभग पूरे उत्तराखंड में हो रहे शराब की दुकानों के विरोध को दरकिनार कर सरकार ने प्रस्तुत की नई आबकारी नीति।
शराब विरोधी आन्दोलनों से गुंजायमान हो रहे उत्तराखंड की जनलोकप्रिय सरकार ने अपने मंत्रीमण्डल के माध्यम से नई शराब नीति की घोषणा कर दी है और इस नई नीति में पिछले वर्ष शराब बिक्री से प्राप्त हुऐ कुल राजस्व 1905 करोड़ के मुकाबले इसे बढ़ाकर 2310 करोड़ रूपया करने का लक्ष्य रखा गया है। इसलिऐं यह तय है कि अभी हाल ही में हुऐ विधानसभा चुनावों के दौरान दो तिहाई से भी अधिक बहुमत प्राप्त करने वाली भाजपा इस पहाड़ी प्रदेश में कई समस्याओं का मूल कारण मानी जाने वाली शराब की बिक्री को हतोत्साहित करने के स्थान पर इसे और बढ़ाकर राजस्व एकत्र करने का जरिया बनाना चाहती है तथा सरकार की नीति में कहीं भी पहाड़ को शराब बंदी के लिऐ प्रोत्साहित करना या फिर पहाड़ों में चल रहे शराब की दुकानो के विरोध वाले आन्दोलनों से सहमति व्यक्त करते हुऐ इन दुकानों को अनिश्चितकाल के लिऐ बंद कर देना नही है। हांलाकि सरकार ने इस बार शराब बिक्री पर दो फीसदी सैस लगाकर इसमें से एक फीसदी सड़क सुरक्षा व एक फीसदी सामाजिक सुरक्षा के लिऐ खर्च करने की घोषणा की है और प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में शराब की दुकानो को खोले जाने के समय को एक बार फिर परिवर्तित कर दोपहर के बारह बजे से शाम के छह बजे तक करने की बात कहीं जा रही है लेकिन सरकार यह बताने में असफल है कि उसकी इन घोषणाओं से आम आदमी का क्या हित है या फिर गांव-देहातों में उठ रही शराब की दुकान के विरोधी सुरों को शांत करने में यह नीति किस हद तक कामयाब होगी? यह ठीक है कि सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ एकत्र हो रहा जनसमुदाय बहुत ज्यादा लंबे समय तक अपना आन्दोलन नही खींच पायेगा और आन्दोलनकारी महिलाओं पर धड़ाधड़ विभिन्न धाराओं में दर्ज होते जा रहे मुकदमें व परिवार के पुरूष वर्ग में से अधिकांश का शराब का लती होना, मिलजुलकर ऐसा माहौल बनायेंगे कि कुछ ही समय में यह तमाम छुटपुट आन्दोलन खुद ही बिखर कर रह जायेंगे लेकिन सवाल यह है कि क्या पहाड़ के हित के लिऐ एक जनहितकारी सरकार का यह व्यवहार ठीक है और वह भी तब, जबकि वह पिछली सरकार पर शराब माफिया के साथ मिलकर प्रदेश के नौनिहालों की नसों में धीमा जहर भरने का आरोंप लगाती रही हो। सरकार अगर चाहती तो दिल्ली दरबार के समक्ष गुहार कर या फिर डबल इंजन का वास्ता देकर केन्द्र सरकार की मदद व अन्य संसाधनों से राजकाज के लिऐ खर्च की व्यवस्था कर सकती थी या फिर गैर-जरूरी खर्चो में कटौती करते हुऐ आबकारी से होने वाली राजस्व वसूली को न्यूनतम् स्तर तक सीमित किया जा सकता था लेकिन सरकार ने यह स्पष्ट किया है कि वह राजस्व वसूली के नाम पर लक्ष्य बढ़ा शराब के कारोबारियों को फायदा पहुंचाने की जुगत भिड़ा रही है और अगर नई सरकार के अस्तित्व में आने के बाद इन दो महिनों में शराब विरोधी आन्दोलन के चलते कम हुई शराब बिक्री पर गौर करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि सरकार द्वारा निर्धारित राजस्व की वसूली के लिऐ शराब विक्रेताओं ने इन बचे हुऐ दस महिनों में या तो पिछले वर्ष की दुगनी मात्रा में शराब उत्तराखंड में खपानी होगी या फिर बेची जाने वाली शराब की कीमत को लगभग दुगना कर इस घाटे की प्रतिपूर्ति की जायेगी। इन आंकड़ों में थोड़ा बहुत उलटफेर हो सकता है लेकिन यह तय है कि शराब विरोधी आन्दोलन से सुलगता उत्तराखंड इस बार पिछले वर्षो के मुकाबले में शराब की खरीद-फरोख्त में ज्यादा पैसा खर्च करेगा और इसकी सीधी मार उस तबके को पड़ेगी जो रोज़ कमाकर खाने के साथ ही साथ अपने छुटपुट मनोरंजन के नाम पर इस बोतल बंद नशे का आदी होता जा रहा है। सरकार के पास इस वर्ग की चिन्ता का कोई कारण नही है क्योंकि चुनाव अभी दूर है और वैसे भी चुनावों के लिऐ मैदान में उतरने वाले महारथी यह अच्छी तरह जानते है कि चुनावी मोर्चे पर इस वर्ग का समर्थन हासिल करने के लिऐ पहली जरूरत बन गयी शराब व पैसा कहां से हासिल किया जा सकता है? इसलिऐं सत्ता के शीर्ष को हासिल करने के बाद या फिर इसे हासिल करने के लिऐ शराब के कारोबारियों व तथाकथित माफिया का सहयोग व वरदहस्त हासिल किया जाना आवश्यक है। खैर, वजह चाहे जो भी हो लेकिन हमारे कहने का लब्बोलुआब यह है कि लोकलुभावन नारों व चुनावी वादों के साथ प्रदेश की सत्ता पर काबिज भाजपा की त्रिवेन्द्र सिंह रावत के नेतृत्व वाली सरकार की पहली आबकारी नीति लागू होने की तैयारी में है और छुटपुट आन्दोलन या स्थानीय स्तर पर होने वाला विरोध इस नीति में किसी भी तरह का बदलाव कराने में सक्षम नही है क्योंकि सरकार चलाने वाले नौकरशाहों, मन्त्रियों व जनप्रतिनिधि के रूप में जनभावनाओं की समझ रखने का दावा करने वाले नवनियुक्त विधायकों का मानना है कि शराब एक सामाजिक समस्या है तथा इसे सरकार द्वारा लगाये गये प्रतिबंधों अथवा रोक के स्थान पर सामाजिक जागरूकता व जन चेतना के माध्यम से ही बंद किया जा सकता है। हो सकता है कि सरकार व सरकार चलाने का दावा करने वाली सरकारी मशीनरी अपनी जगह सही हो और सरकार द्वारा की गयी किसी भी तरह की शराबबंदी घटिया गुणवत्ता की अवैध शराब को प्रोत्साहित करती हो लेकिन क्या सरकार यह दावा कर सकती है कि उसके द्वारा लागू इस नयी नीति के बाद प्रदेश के लगभग हर कोने में पुलिसिया मिलीभगत से होने वाली अवैध शराब की बिक्री बंद हो जायेगी और खुद को शराब माफिया के स्थान पर कारोबारी कहलाना पंसद करने वाले तमाम सफेदपोश लोग सरकार द्वारा तय की गयी शराब बिक्री की समय सीमा के बाद अपने कर्मचारियों व स्थानीय दंबगों की मिलीभगत से आस-पास के क्षेत्रों में अवैध रूप से, वैध शराब की ज्यादा मूल्य पर बिक्री को बढ़ावा नही देंगे। सरकार अगर वास्तविक रूप से राजस्व वसूली के साथ ही साथ व्यापक जनहित की भी पेरोकार होती तो उसे अपनी आबकारी नीति में यह स्पष्ट उल्लेख करना चाहिए था कि सरकार द्वारा आंबटित किसी भी शराब की दुकान में ग्राहक को शराब की बिक्री नकद धन लेकर नही की जायेगी। सरकारी संरक्षण में चलने वाली शराब की दुकानों का कारोबार पूरी तरह वैध व कर की अदायगी के साथ होने वाला कारोबार है और वर्तमान में देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी धन के अवैध लेन-देन पर रोक लगाने के लिऐ नकदी के इस्तेमाल को कम करने के आवहन के साथ कैशलैस व्यवस्था को अपनाऐं जाने की वकालत कर रहे है। हालातों के मद्देनजर मोदी के चेहरे को आगे कर चुनाव जीती उत्तराखंड की भाजपा सरकार को चाहिऐं कि वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के इस फैसले का सम्मान करते हुऐ कैशलेश की व्यवस्था को पूरी तरह से शराब की दुकानों पर लागू करें। अगर ऐसा होता है तो बहुत ही जल्द न सिर्फ पहाड़ों पर शराब के वैध-अवैध कारोबार के बीच छुपे सम्बंध जनता के सामने आ जायेंगे बल्कि शराब के विरोध में सड़कों पर आन्दोलन कर रही महिलाऐं स्वंय अपने घर पर मोर्चा संभाल कर एक अलग तरह की शराबबंदी का माहौल बना देंगी लेकिन हम जानते है कि सरकार ऐसा कुछ भी नही करेगी क्योंकि ऐसा होेते ही राजनेताओं व शराब के कारोबारियों के बीच के मधुर संबध व इसके पीछे छिपे कई राज जगजाहिर हो जायेंगे।

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