Saturday, May 27, 2017

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ममता की कीमत

क्या सिर्फ एक दिवसीय आयोजनों में समेटा जा सकता है माँ का वात्सल्य…
आस्था, आशा और विश्वास भरा शब्द है माँ। इसे पूँजने, धन्यवाद देने या फिर याद करने के लिऐ किसी दिन या तारीख विशेष की आवश्यकता नहीं होती लेकिन तथाकथित रूप से आधुनिक हो रहे हमारे समाज को युवा पीढ़ी ने आस्था व विश्वास के इस सैलाब को एक दिन विशेष के दायरे में बांधने की कोशिशें शुरू कर दी है और बाजारवादी मानसिकता पर टिका मीडिया इस तरह की तमाम कोशिशों के नफे-नुकसान का आंकलन किये बिना ही अपने निजी फायदे के लिऐ एक दिन विशेष को माँ के नाम समर्पित कर व्यापार की नयी संभावनाऐं तलाश रहा है। हमारे देश भारत में एकाएक और एकसाथ इतने सारे दिवसों के लोकप्रिय हो जाने के पीछे कौन है या फिर प्रेम, आस्था, विश्वास व समर्पण की बात करने वाले हमारी समाज में इस तरह के आयोजनों का क्या महत्व है, यह तो पता नही लेकिन हमारा उत्सवधर्मी समाज बिना किसी भेदभाव व सोच-विचार के इन तमाम दिवसों व इनके अवसर पर होने वाले आयोजनों को अपने तरीके से आत्मसात करने में लगा है और यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि विदेश से आयातित क्षणिक सुख देने वाले इन तमाम अवसरों को अपने सदाबहार अंदाज में शामिल कर हमारी नयी पीढ़ी ने एक नई पहल की है। यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि विदेशी भाषा, विदेशी शिक्षा, विदेशी चाल-चरित्र व त्योहारों ने हमारे समाज को सदा आकृर्षित किया है और देश की आजादी के बाद इन सत्तर सालों में विदेशों से आयातित यह तमाम अच्छाईयाँ व बुराईयाँ हमारे समाज के निचले तबके की ओर अग्रसारित होती जा रही है। इसलिऐं यह कहना कि अंग्रेजी इस देश में सिर्फ एलीट वर्ग की भाषा है या फिर अंगे्रजीदाॅ अंदाज में मनाये जाने वाले तीज-त्योहार व किये जाने वाले आयोजन सिर्फ उच्च वर्ग तक सीमित है, हमारी गलतफहमी का एक हिस्सा है और इस तरह के आयोजनों या फिर उत्सवों का सामाजिक तौर से बहिष्कार करने की बात करना अथवा इनपर किसी भी तरह का प्रश्नचिन्ह खड़ा करना एक बचकानी व इन उत्सवों को ज्यादा प्रचार-प्रसार देने के लिये की जाने वाली हरकत है। इसलिऐं हमारे सभ्य समाज का एक बड़ा हिस्सा इस प्रकार के आयोजनों व उत्सवों को अपनी आवश्यकताओं व सामाजिक जरूरतों की कसौटी में कसने के बाद इन्हें आगे बढ़ा देता है और देश, काल व परिस्थितियों के आधार पर यह तय हो जाता है कि इन अवसरांें पर हमे कैसे पेश आना है। हमने देखा है कि शादी-विवाह व अन्य अवसरों पर भोजन परोसने के लिये आजमाया जाने वाला पश्चिमी तौर-तरीका किस प्रकार सारे देश में फैलकर एक बार फिर अपने पुरातन स्वरूप को प्राप्त करने की कोशिश कर रहा है। बड़े-बड़े आयोजनों में राजा-रजवाड़ों वाली विचारधारा के आधार पर इवेन्ट कम्पनियों द्वारा किये जाने वाले इन्तजामात की बात अगर छोड़ भी दे तो हम यह देख सकते है कि गली-मोहल्ले में होने वाले छोटे-बड़े आयोजनों के अलावा लगभग हर छोटे-बड़े विवाह आयोजन में भी खड़े होकर भोजन करने की व्यवस्था के साथ ही साथ बैठकर खाने के इंतजाम करना फिर से जरूरी समझा जाने लगा है। कोई बड़ी बात नही है कि यह तमाम व्यवस्थाऐं एक बार फिर लाईन में बैठकर पंगत जीमने की ओर वापस मुड़ जाय और चमचमाती हुई स्टील अथवा प्लास्टिक की क्राकरी के रोगवाहक जिवाणुओं से मुक्त न होने का डर हमें एक बार फिर हरे पत्तों अथवा उनके बने पत्तलों को बिछाकर उनपर ही भोजन करने को मजबूर न कर दे। ठीक यहीं अंजाम मदर्स डे, फादर्स डे या फिर वैंलनटाईन डे समेत अन्य छोटे-बड़े आयोजनों का भी होेने जा रहा है। हमने देखा कि भागमभाग भरे इस जीवन में आगे बढ़ने की ललक ने हमें अपने घर-परिवार व नाते-रिश्तों से दूर कर दिया था और विदेशों में जा बसे भारतीय माँ-बापों की सन्तानें अपना सुख खरीदने के चक्कर में अपने परिजनों के दुखों से अंजान बनने की कोशिशें कर रही थी। छोटे होते जा रहे परिवारो में रिश्ते-नातों से अनभिज्ञ नयी पीढ़ी के बच्चे पारिवारिक संस्कार व सदाचार की बातें पीछे छोड़ते जा रहे थे। इसी वक्त विदेशों में जा बसे कुछ अंग्रेज परस्त भाईयों की मेहरबानी से हमारे लोगों को अपनी माँ की परेशानियाँ, दुख-दर्द और उसका प्यार याद आ गया जिसके चलते हमें भी अपनी माँ की ममता की कीमत का अहसास हुआ। नतीजतन बधाई संदेश भेजने व स्वीकारने से शुरू हुआ मदर्स डे जैसे आयोजनों का सिलसिला कब सामूहिक आयोजनों के अवसरों में तब्दील हो गया पता नही चला। वर्तमान में अंग्रेजी परस्त (माध्यम )स्कूलों के लिऐ मदर्स डे जैसे आयोजन एक मौका है अपने बाजार व व्यापार को आगे बढ़ाने का तथा कुछ स्वयं सेवी संगठनों व महिला एकता का दम्भ भरने वाले सामाजिक व राजनैतिक संगठनों ने इसे महिलाओं के स्वाभिमान व स्वतंत्रता से भी जोड़ दिया है लेकिन इस सबके बावजूद मदर्स डे जैसे अवसरों पर छलकने वाला यह एक दिवसीय प्यार या सम्मान उस दर्द, स्नेह व सुख की गहराई को नही पा सका है जो निश्चल प्रेम या ममता के अहसास तले छुपा होता है। शेरो-शायरी, किस्से-कहानियों या फिर फेसबुकिया गपशप के किसी कोने में होने वाली चर्चाओ के तहत छलकने वाला माँ का प्यार शब्दों के अहसास से कितना अलग होता है इसकी अनुभूति वास्तव में वहीं मन कर सकता है जिसने इसे देखा और भोगा है। इसलिऐं हालातो के मद्देनजर यह कहना कि माँ की ममता के अहसास का यह एक दिवसीय तरीका या फिर उसके समर्पण, त्याग अथवा वात्सल्य के बदले उसे दिया जाना वाला यह एक दिवसीय सम्मान भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओं के अनुरूप नहीं है,गलत नहीं होगा लेकिन अपनी परम्पराओं, लोक संस्कृति व रिश्तों के अहसास से दूर होते जा रहे हमारे समाज को वास्तविक परिस्थितियों का भान कराने के लिये इस तरह के छोटे-छोटे अवसरों को नकारा जाना भी न्यायोचित नही है।

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