क्रान्तिकारी फैसलों के साथ | Jokhim News

Friday, July 21, 2017

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क्रान्तिकारी फैसलों के साथ

उत्तराखंड को माध्यमिक व प्राथमिक क्षेत्र की शिक्षा मंत्री अरविंद पाण्डेय ने की हर दिल को जीतने की कोशिश शिक्षा के क्षेत्र में अमूलचूल परिवर्तन के दावे के साथ उत्तराखंड के माध्यमिक व प्राथमिक शिक्षा मंत्री अरविंद पाण्डेय कुछ नयी कवायदों को अंजाम दे रहे है और अगर उनकी यह मुहिम रंग लायी तो आने वाले कल में प्रदेश में प्राथमिक व माध्यमिक शिक्षा का स्तर सुधरता नजर आ सकता है। हांलाकि शुरूवाती दौर में यह माना गया कि निजी क्षेत्र के स्कूलों व तथाकथित रूप से मिशनरी द्वारा संचालित इंटर कालेजों के मामले में माननीय मंत्री द्वारा दिखलाया जा रहा सख्त रवैय्या एक दिखावा है और स्कूलों में शैक्षिक सत्र प्रारम्भ होने के बाद एक बार फिर यथास्थिति कायम हो जायेगी लेकिन मंत्री जी के निर्देर्शो पर सरकारी महकमों ने जिस तरह से निजी क्षेत्र के स्कूलों पर नकेल कसनी शुरू की है और अपने ही स्कूल में अगली कक्षा में प्रवेश देने पर लिये जाने वाले प्रवेश शुल्क को न लेेने या फिर इसे वापस किये जाने के संदर्भ में शासनादेश जारी किये जाने के मामले में सरकार ने जो तत्परता दिखायी है वह वाकई काबिलेतारीफ है। इसी प्रकार विद्यालयों में निजी लेखकों के स्थान पर एनसीआरटी द्वारा प्रायाजित पुस्तको को लागू करने और बीपीएल परिवारों के नौनिहालों के संदर्भ में मानकों को पूरा करने के निर्देश भी सक्षम अधिकारियों को दिये गये है। यह ठीक है कि सरकारी नियन्त्रण में चलने वाले विद्यालयो के परिपेक्ष्य में भी अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है तथा दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों में चल रहे सरकारी स्कूलों की दशा सुधारे बगैर शिक्षा के क्षेत्र में किसी भी बड़े परिवर्तन की अपेक्षा रखना बेमानी है लेकिन निजी स्कूलों के नाम पर खुली शिक्षा की दुकानों में होने वाली लूट को रोकना भी आवश्यक है और इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि मौजूदा हालातों को देखते हुऐ इस दिशा में भी गंभीर सुधारों की गुजांइश है। एक श्रमिक परिवार में पैदा हुऐ अरविंद पाण्डेय ने अपने बचपन से ही स्कूली शिक्षा के मामले में होेने वाले भेदभाव को बहुत नजदीक से देखा है तथा राज्य गठन के बाद पहले उधमसिंह नगर के बाजपुर विधानसभा क्षेत्र तथा वर्तमान में गदरपुर विधानसभा क्षेत्र के विधायक के रूप में वह निजी स्कूलों की मनमानी से भली-भांति वाकिफ है। यह ठीक है कि कुर्सी संभालने के बाद उन्होंने सुदूरवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों के शिक्षक विहीन स्कूलों या फिर अन्य व्यवस्थागत् समस्याओं मे सुधार लाने के प्रयास करने के स्थान पर सीधे-सीधे निजी और मिशनरी के आधीन चलने वाले विद्यालयों को अपने निशाने पर लिया है तथा इसकी एक बड़ी वजह उनका प्रदेश के मैदानी इलाके से विधायक होना व अपने क्षेत्र की समस्याओं को लेकर ही ज्यादा गंभीर होना भी मानी गयी है लेकिन अगर वस्तुस्थिति पर गौर करें तो वर्तमान सरकार द्वारा अपने पहले ही विधानसभा सत्र के दौरान लाया गया स्थानांतरण विधेयक अगर अपने सही मायनों में पारित व लागू हो जाता है तो सरकारी स्कूलों के लिऐ सबसे बड़ी नासूर बन चुकी स्थानांतरण को लेकर चलने वाली जुगाड़ व्यवस्था का स्वतः ही अंत हो जायेगा और इन हालातों में सरकार के लिये दूरस्थ पर्वतीय क्षेत्रों के सरकारी स्कूलो को अध्यापक उपलब्ध कराना कोई बड़ा मुश्किल काम नही होगा। अगर सबकुछ ठीक रहा और प्रवर समिति के समक्ष विचाराधीन स्थानांतरण विधेयक तय समय सीमा के तहत पारित हो गया तो आगामी स्थानांतरण के सीजन में सरकारी स्कूलों की दशा सुधारी जा सकती है तथा इसमें रही-सही कमी गेस्ट टीचरों या फिर नये पदो को विज्ञापित कर पूरी की जा सकती है लेकिन प्रदेश के मैदानी क्षेत्रों में नौनिहालों की शिक्षा-दिक्षा की बड़ी जिम्मेदारी संभालने वाले निजी स्कूलों की मनमानी रोकने के लिये सरकार द्वारा कड़े दिशा-निर्देश की कमी काफी लंबे समय से महसूस की जा रही थी और इन तमाम व्यवस्थाओं को लागू करने के लिऐ जिम्मेदार अधिकारी इस तरह के तमाम नामी-गिरामी स्कूलो में अपने व अपने परिचितों के बच्चों को प्रवेश दिलाकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ रहे थे। हालातों के मद्देनजर अरविंद पाण्डेय द्वारा उठाये गये कदम सामयिक व जनसामान्य के हितों की रक्षा करने वाले कहे जा सकते है और एक जनप्रतिनिधि के रूप में किसी नेता, विधायक या फिर मंत्री से यहीं उम्मीद की भी जानी चाहिऐं। हांलाकि सरकारी क्षेत्र के विद्यालयों की दशा व शिक्षा का स्तर सुधारने लिऐ एक आसान सा तरीका यह भी था कि सरकार अपने कार्यक्षेत्र में कार्यरत् समस्त सरकारी कर्मचारियों व लोकसेवकों की आदेश देती कि वह अपने नौनिहालो की शिक्षा-दिक्षा के लिऐ सरकार के नियन्त्रण वाले सरकारी स्कूलों की ओर रूख करें लेकिन यह फैसला जरूरी होते हुये भी एकाएक लागू किये जाने योग्य तथा विभिन्न स्कूलों व विभिन्न कक्षाओं में पढ़ रहे छात्र-छात्राओं के हितों की रक्षा करने में सहायक नही होता क्योंकि सरकार द्वारा जारी इस तरह के किसी फरमान के बाद शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ी अफरातफरी मचनी तो स्वाभाविक थी ही किन्तु बिना अध्यापकों व अन्य व्यवस्थाओं के छात्रों की एक बड़ी संख्या के साथ खिलवाड़ की इजाजत नही दी जा सकती। इसलिऐं अरविंद पाण्डेय द्वारा शिक्षा मंत्री की कुर्सी संभालते ही उठाये जाने वाले उनके कदमों की प्रशंसा करते हुये हमें यह कहने में कोई हिचक नही है कि अगर यह सबकुछ इसी तरह चला तो आने वाले वर्षों में उत्तराखंड को प्राथमिक व माध्यमिक क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्था में कई तरह के गुणात्मक सुधार देखने को मिलेंगे और देश-विदेश के कई हिस्सों से छोटे बच्चे व होनहार छात्र अपनी प्राथमिक व माध्यमिक स्तर की शिक्षा पूरी करने के लिऐ उत्तराखंड की ओर रूख करने लगेंगे। वार्ता के इसी क्रम में एक नजर उत्तराखंड की उच्च शिक्षा व्यवस्था व अपेक्षाकृत युवा कहे जा सकने वाले राज्यमंत्री धन सिंह रावत पर भी डाले तो यह स्पष्ट हो जाता है कि जोश से लबलेज धनसिंह उच्च शिक्षा क्षेत्र में कई अमूलचूल परिवर्तन लाने के इच्छुक है और चर्चाओं में बने रहने के लिऐ उन्हें असमय ही तिरंगे की ऊँचाई, वंदेमातरम् या फिर महाविद्यालयों में ड्रेस कोड जैसे विषयों को जनता के समक्ष रखने में भी किसी प्रकार का संकोच नही होता लेकिन सीमित वित्तीय संसाधनांे के साथ निजी कालेजों अथवा डीम्ड विश्वविद्यालयो पर सरकारी अंकुश रखने के पक्ष दिखाई दे रहे डा. धन सिंह शायद इस तथ्य से वाकिफ नही है कि यूजीसी के मानकों द्वारा संचालित इन विद्यालयों अथवा विश्वविद्यालयों के मामले में उनके अधिकार सीमित है। रहा सवाल सरकारी क्षेत्र के महाविद्यालयों में प्रवक्ताओं की नियुक्ति अथवा अन्य व्यवस्थागत् समस्याओं के निदान का तो इस संदर्भ में सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि माननीय राज्य मंत्री उच्च शिक्षा डाॅ धन सिंह रावत छात्र संघो की राजनीति का हिस्सा बनने की जगह उत्तराखंड के तमाम महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों की समस्याओं का वाजिब समाधान ढ़ूढें तो यह उनके राजनैतिक भविष्य व मंत्रालय की दृष्टि से बेहतर होगा।

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