हनी र्टेपिग के नाम पर | Jokhim News

Sunday, September 24, 2017

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हनी र्टेपिग के नाम पर

महिला पर लग रहे ब्लेकमेंलिग के आरोंपो के बावजूद कम नही कहा जा सकता आरोपी का अपराध महिला सशक्तिकरण के इस दौर में जहाँ एक ओर सारा देश उच्चतम् न्यायालय द्वारा निर्भया गैंगरैप व हत्याकाण्ड के आरोंपियों की सजाये मौत को बरकरार रखने पर जश्न मना रहा है वहीं दूसरी ओर देश की राजधानी दिल्ली के ही नजदीक गाजियाॅबाद की एक महिला द्वारा गुजरात से भाजपा के सांसद के सी पटेल को ब्लेकमेल करने के मामले में धारा-384 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है और खबर है कि पुलिस जोर-शोर से इस महिला का इतिहास खंगालने में जुटी है। सूत्रों से मिली खबरों के अनुसार उक्त महिला पूर्व में भी कई गणमान्यों को ब्लेकमेल कर उनसे खासी रकम वसूल चुकी है तथा अपने सम्पर्कों को ब्लेकमेल करने के लिऐ इस महिला द्वारा अपने ही घर में कई प्रकार के कैंमरे आदि लगाये जाने की खबर है। कानून की दृष्टि से देखा जाये तो यह एक बड़ा अपराध है और मौजूदा हालातों में कई महिलाओं द्वारा इस तरह के हथकण्डे इस्तेमाल किये जाने से इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन यह घटनाक्रम का एक पहलू हो सकता है क्योंकि सत्ताधारी दल के एक वरीष्ठ नेता के इस तरह के मामले में फंसने की स्थिति में स्थानीय पुुलिस प्रशासन के सम्पूर्ण घटनाक्रम को लेकर बदले रूख से इनकार नही किया जा सकता। वैसे भी अगर महिला द्वारा लगाये गये शारिरिक शोषण व इस संदर्भ में प्रस्तुत किये गये दस्तावेजों पर नजर डाले तो इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि उक्त सांसद महोदय के इस महिला के साथ अंतरंग सम्बंध थे और सांसद महोदय का इस महिला के साथ लगातार मिलना-जुलना जारी था। हांलाकि मीडिया के एक बड़े हिस्से ने इस सम्पूर्ण घटनाक्रम को बहुत ज्यादा तूल देने की कोशिश नहीं की है और समस्त घटनाक्रम को ‘हनी ट्रेपिंग‘ का नाम देकर महिला द्वारा पूर्व में भी की गयी इस तरह की शिकायतों को आधार बनाते हुयें यह साबित करने की कोशिश की जा रही है कि उक्त महिला एक पेशावराना मुजरिम है और बड़े नेताआंे व नामचीन पुरूषों को अपने मोहजाल में फंसाकर उनसे पैसे वसूल करना उसकी आदतों में शुमार रहा है। हो सकता है कि उक्त घटनाक्रम के संदर्भ में पुलिस द्वारा दिये गये तथ्य व प्रस्तुत किये गये साक्ष्य सही हो लेकिन इन तमाम तथ्यों व साक्ष्यों के बावजूद भी इस आरोंप में फंसे सांसद महोदय के अपराध को कम करके नही आंका जा सकता क्योंकि किसी भी स्त्री से उसकी इच्छा के विरूद्ध अवैध सम्बन्ध बनाना या फिर उसे अवैध सम्बन्ध बनाने को मजबूर करना किसी भी कानून की दृष्टि से सही नही कहा जा सकता लेकिन इस पूरे मामले को इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है कि मानो आरोपी सांसद इन तमाम अपराधिक कृत्यों से अनभिज्ञ हो। सामाजिक जीवन में किसी भी पुरूष अथवा स्त्री से यह उम्मीद की जाती है कि वह अपना आचरण व चारित्रिक दृढ़ता को बनाये रखेगा और अगर पुरूष अथवा स्त्री सार्वजनिक जीवन में किसी जिम्मेदार पद पर हो तो इस तरह के आरोंपो के सामने आने के बाद यह उम्मीद तो की ही जानी चाहिऐं कि आरोपी अपनी सार्वजनिक जिम्मेदारियों व पद से इस्तीफा देकर एक सामान्य व्यक्ति की तरह कानून की हदों में रहकर अपने उपर लगने वाले आरोंपों की सफाई प्रस्तुत करेगा लेकिन पटेल का नाम सत्तापक्ष के सांसदों से जुड़ा होना तथा दिल्ली के साथ ही साथ उ.प्र. में भी भाजपा की सरकार होना यह इशारें करता है कि इस पूरे घटनाक्रम को लेकर पुलिस के समक्ष जाने वाली उक्त महिला को इतनी आसानी से कानून से न्याय नही मिलने वाला। भारतीय राजनीति में यह अपने तरह का पहला मामला नही है और न ही यह पहला मौका है जब पुलिस और कानून व्यवस्था महिला द्वारा लगाये गये आरोंपो की जांच करने के स्थान पर एक पक्षीय होकर महिला पर लगने वाले आरोंपो को हवा देने की कोशिश कर रही है जबकि अवैध सम्बन्धों या फिर बहला-फुसला कर शारिरिक सम्बन्ध बनाने के अधिकांश मामलों में अधिकांशत यह देखा जाता है कि आरोंपी सबसे पहले महिला के चरित्र पर सवाल खड़ा करने की कोशिश करते हुये उसका मनोबल तोड़ने व उसे अपनी शिकायत वापस लेने के लिऐ मजबूर करने की कोशिश करते है और अगर कानून व्यवस्था व स्थानीय पुलिस प्रशासन महिला के साथ खड़ा होने के स्थान पर आरोंपी को थोड़ी भी ढ़ील देता है तो अपराधी मानसिकता के लोग पूरे जोशो-खरोश से महिला को बदनाम करने की साजिश में जुट जाते है। तमाम मामलों में अक्सर यह देखा गया है कि स्थानीय पुलिस प्रशासन द्वारा जाँच के पहलू बदल दिये जाने के बाद महिलाओं के खिलाफ हुऐ अपराध व पीड़ित पक्ष द्वारा लगाये गये आरोंपो को ठण्डे बस्ते में डाल दिया जाता है और समाज पर हावी पुरूषवादी मानसिकता पीड़ित महिला पर चारित्रिक दोषारोपण करते हुये घटना के प्रति अपना दृष्टिकोण बदल देती है जिसके चलते महिलाओं का शारिरिक शोषण करने वालों या फिर उन्हें उपभोग मात्र की वस्तु समझने वाली मानसिकता मजबूत होती है और देश व दुनिया को यह संदेश जाता है कि तथाकथित रूप से मजबूत दिखते कानूनों व सुदृढ़ हो रही महिला सशक्तिकरण की विचारधारा के बावजूद महिलाओं का शारिरिक शोषण करना या फिर उन्हें उपभोग मात्र की वस्तु समझकर शारिरिक सम्बंध बनाने के लिऐ बाध्य करना कानूनी दृष्टि से भी गलत नही है। हमारा स्पष्ट मानना है कि ब्लेकमेल करने या फिर किसी भी प्रकार के समझौते के लिऐ बाध्य करने की नीयत से शारिरिक सम्बन्ध बनाने वाली महिलाओ के खिलाफ कानूनी रूप से सख्त कार्यवाही होनी चाहिऐ तथा महिलाओं के साथ हुऐ शारिरिक अपराध से जुड़े मामले एक बार थाने अथवा कानून की नजर में आने के बाद पीड़ित पक्ष द्वारा अपनी शिकायत वापस लिये जाने के बावजूद इस प्रकार के घटनाक्रमों की पूरी व निष्पक्ष जाँच होनी चाहिऐं। साथ ही साथ पीड़ित महिला के आदी मुजरिम होने या फिर किसी व्यवसायिक दृष्टिकोण से शारिरिक सम्बन्ध बनाने के मामले में आरोपी पक्ष पर बलात्कार व अन्य समकक्ष धाराओं के तहत ही कार्यवाही होनी चाहिऐं। जानकारी में आया है कि गुजरात के सांसद पटेल से जुड़े इस मामले को लेेकर चर्चा में आयी उक्त महिला इससे पूर्व उत्तराखंड सरकार के एक मंत्री समेत कई अन्य गणमान्यांे पर भी इस तरह के आरोंप लगाकर वसूली कर चुकी है और मजे की बात यह है कि उत्तराखंड सरकार के उक्त मंत्री पर भी यह इस तरह का पहला आरोंप नहीं है। इसलिऐं इस तथ्य को दावे से कहा जा सकता है कि अगर कानून ने ठीक तरीके से अपना काम किया होता और इस तरह के मामले एक बार पुलिस के संज्ञान में आने के बाद उनका पूरा खुलासा व अवैध सम्बन्धों के लिऐ बने कानूनों के हिसाब से अपराधियों को सजा हो गयी होती तो इस तरह के घटनाक्रमों पर काबू पाया जा सकता था लेकिन अफसोस हमारे देश का कानून व इस कानून की रक्षा करते हुऐ आम आदमी की शिकायत पर कार्यवाही करने का दावा करने वाली पुलिस इस तरह के मामलों में लीपापोती करने व समर्थवान आरोपियों को बचाने का ही प्रयास करती प्रतीत होती है। इन हालातों में सिर्फ महिला सशक्तिकरण का ढोल पीटने या फिर महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों को लेकर बनाये गये कानूनों को सख्त करने से क्या हासिल होगा, कहा नही जा सकता ।

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