राजनीति की बिसात पर | Jokhim News

Wednesday, June 28, 2017

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राजनीति की बिसात पर

दाँव पर लगी केजरीवाल की विष्वसनीयता को कायम रखने के लिये आम आदमी पार्टी के वरीष्ठ नेताओं ने आजमायी पुरानी चाल दिल्ली एमसीडी चुनावों के बाद आम आदमी पार्टी में जो जूतमपैजार शुरू हुई उसे हाल फिलहाल के लिये सम्भाल लिया गया है और विद्रोही तेवरों के साथ बगावत को उतारू कुमार विश्वास को एक बार फिर विश्वास में लेकर राजस्थान का प्रभारी बना मामले को ठण्डा करने की कोशिश की गयी है लेकिन सवाल यह है कि इस तरह के आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच आम आदमी पार्टी एक बार फिर वह जगह हासिल कर पायेगी जो उसे दिल्ली प्रदेश की जनता को एक जिम्मेदारी के रूप में सौंपी थी। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि आम आदमी पार्टी का पूरा ताना-बाना केजरीवाल के इर्द-गिर्द बुना गया है और एक जनान्दोलन की कोख से पैदा होने के बावजूद इस राजनैतिक दल की कोई निश्चित विचारधारा या ऐजेण्डा नहीं है लेकिन यह भी सच है कि आम आदमी पार्टी एक व्यक्ति या एक चेंहरे को ही आगे कर ज्यादा लम्बे समय तक टिकी नहीं रह सकती क्योंकि इसमें शामिल तमाम राजनैतिक व गैरराजनैतिक लोगो की अपनी-अपनी महत्वांकाक्षाऐं व अपनी-अपनी प्राथमिकताऐं है। इन हालातों में विभिन्न विषयों व जनहित के मुद्दों पर इस राजनैतिक दल के नेताओं का अहम् टकराना स्वाभाविक है और यह भी तय है कि जब इस दल में शामिल नेताओं व छटभैयों को यह लगने लगेगा कि केजरीवाल अब एक जिताऊ चेहरा नहीं रह गया है तो उसके विरोध के सुर और ज्यादा तेज होते चले जायेंगे। वर्तमान में हो यहीं रहा है। आम आदमी पार्टी के नेताओं को उम्मीद थी कि दिल्ली के बाद पंजाब और गोवा की जनता उन्हें हाथोहाथ लेगी और इसके लिऐ प्राथमिक तैयारी के रूप में केजरीवाल को पंजाब के मुख्यमन्त्री पद का सम्भावित दावेदार भी घोषित किया गया था लेकिन पंजाब और गोवा के विधानसभा चुनावों में हार के बाद दिल्ली के एमसीडी चुनावों में भी आदमी पार्टी को मिली बड़ी पराजय ने आम आदमी पार्टी के नेताओं का विश्वास हिलाकर रख दिया और कुछ लोगों को यह लगने लगा कि राजनीति के क्षितिज पर एकाएक ही उभरा यह राजनैतिक दल अब भर-भराकर गिर जायेगा। नतीजन आम आदमी पार्टी पर आरोपों – प्रत्यारोपों का एक नया दौर शुरू हुआ और केजरीवाल बाहर वालों के अलावा अपनी ही पार्टी के लोगों के निशाने पर आने लगे। हांलाकि केजरीवाल पर भाजपा व केन्द्र की मोदी सरकार की ओर से होने वाले हमले पहले भी कम न थे लेकिन केजरीवाल द्वारा एक तजुर्बेकार राजनीतिज्ञ की तरह खुद को बचाकर मोदी सरकार पर हमलावर होने व खुद को प्रधानमंत्री नरेन्दª मोदी की टक्कर का नेता साबित करने का क्रम लगातार जारी था परन्तु एमसीडी की हार ने उनकी नेतृत्व क्षमता व विश्वसनीयता पर सवाल खड़ें करने शुरू कर दिये थे। इसलिए आम आदमी पार्टी के लिए यह जरूरी था कि वह जनता का ध्यान केजरीवाल से हटाकर अन्य खांमियों पर केन्द्रित करे और इसके लिए पहली कोशिश के तौर पर ईवीएम मशीनों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करते हुए सरकार के खिलाफ माहौल बनाने के प्रयास खुद केजरीवाल द्वारा शुरू किए गये लेकिन आम आदमी पार्टी के नेताओं को जल्द ही यह अन्दाजा आ गया कि इस तरह का बखेड़ा खड़ा कर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पक्ष में चल रही हवा का मुकाबला किया जाना सम्भव नहीं है जबकि आम आदमी पार्टी के बेहतर भविष्य के लिए केजरीवाल के प्रति जनता की विश्वसनीयता कायम रहना और उनका लाइम लाइट में बने रहना, पहली शर्त है क्योंकि इस नवगठित राजनैतिक दल में अरविन्द केजरीवाल ही एकमात्र ऐसी शख्सियत है जिसपर देश की जनता ने अन्ना के आन्दोलन से लेकर वर्तमान तक आंख मूंदकर भरोसा किया है। लिहाजा संकट की इस घड़ी में केजरीवाल से जनसामान्य का ध्यान हटाने के लिए संगठन के भीतर एक छोटा-मोटा बखेड़ा खड़ा कर एक नया विवाद खड़ा किया जाना जरूरी था और इसके लिए केजरीवाल के विश्वसीनय माने जाने वाले कुमार विश्वास को आगे कर एक नया राजनैतिक ड्रामा रचा गया जो कि खबरिया चैनलों द्वारा भी हाथोहाथ लिया गया। अगर हमारा अन्दाजा सही है तो आम आदमी पार्टी में अब फिर सबकुछ पहले की तरह सामान्य हो जाना चाहिए और हमें उम्मीद है कि लोकतन्त्र के इस चुनावी भवसागर में अपनी जगह बनाये रखने के लिए आम आदमी पार्टी कुछ अन्य राज्यों में सम्भावनाएं तलाशने की कोशिशों में जुटने से पहले कुछ ऐसे विवादों को हवा देने का कोशिश जरूर करेगी जो भाजपा व केन्द्र की मोदी सरकार की राजनैतिक सोच व कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह् खड़े करते हुए आम आदमी पार्टी को जनता के बीच मजबूती देते हो। राजनीति के खेल में इसे गलत नहीं कहा जा सकता और न ही हम यह अपेक्षा करते है कि कोई भी राजनैतिक दल अपने सर्वाेच्च नेता को विपक्ष व जनता के राजनैतिक हमलो को झेलने के लिए यू ही अकेला छोड़ देगा। आम आदमी पार्टी जैसे ‘एकल नेतृत्व‘ के भरोसे चल रहे राजनैतिक दल के लिए यह और भी ज्यादा जरूरी था कि वह अपने एकमात्र नेता पर डगमगाते दिख रहे जनता के विश्वास को बनाये रखने के लिए उसका ध्यान हाल ही में मिली एक के बाद एक हार से हटाये और अगर ‘कुमार विश्वास‘ प्रकरण पर नजर डाले तो यह साफ दिखायी देता है कि आम आदमी पार्टी अपने इस लक्ष्य को हासिल करने में काफी हद तक कामयाब भी हुई है लेकिन आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को यह ध्यान रखना चाहिए कि इस तरह की राजनैतिक कारगुजरिया बहुत ज्यादा लम्बे समय तक साथ नहीं देती क्योंकि जनता हर चुनाव के मौके पर सरकार से यह अपेक्षा रखती है कि वह उन वादों पर खड़ी उतरे जो उसने पिछले चुनावों के दौरान जनता से किये थे। लिहाजा आम आदमी पार्टी के पास अभी वक्त है कि वह दिल्ली प्रदेश के मामलें में जन अपेक्षाओं पर खरी उतरे और अपने प्रतिद्वन्दियों के समक्ष एक मिसाल कायम करते हुए उन तमाम घोषणाओं को अमलीजामा पहनाने की कोशिश करे जो उसने पिछले तमाम चुनावोें में जनता के बीच की थी। सीमित संसाधनों व कठिन लक्ष्य के साथ राजनीति के मैदान में उतरी आम आदमी पार्टी के पास खुद को साबित करने के अभी कई मौके है। इसलिए यह मानना और कहना अभी जल्दबाजी होगी कि आन्दोलन की कोख से जन्मा यह राजनैतिक दल शनैः-शनैः विवादों और निजी महत्वकांक्षांओं की भेट चढ़ जायेगा लेकिन यह भी तय है कि अगर केजरीवाल अपने साथियों को विवादों में फंसने या फिर विवादित बयानबाजी करने से नहीं रोक पाये तो उनकी विश्वसनीयता को खतरा बढ़ता जायेगा और समय – समय पर आजमायें जाने वाले राजनैतिक दन्द-फन्द भी बहुत ज्यादा लम्बे समय तक उनकों विवादों से दूर नहीं रख पायेंगे।

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