Saturday, May 27, 2017

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इस जीत के मायने क्या है

अतिवाद की ओर जा रही भाजपा को सीखना होगा विपक्ष को तवज्जो देने का हुनर इसे मोदी की राजनैतिक सूझबूझ का असर माने या फिर इलैक्शन मैनेजमेन्ट का एक हिस्सा लेकिन यह सच है कि चुनाव दर चुनाव जीत हासिल करती जा रही भाजपा ने पिछले कई रिकार्ड तोड़ दिये है और एक लम्बे समय तक गुजरात की सत्ता संभाल चुके देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अंदाज़ व इरादे को देखकर तो यह लगता है कि वह विपक्ष को शक्तिविहीन कर सारे देश की सत्ता पर एकछत्र राज करना चाहते है। अगले लोकसभा चुनावों में दो वर्षाें से भी कम का समय शेष है लेकिन विपक्ष में इसे लेकर कोई खलबली नहीं है और न ही कोई विपक्षी दल सत्ता की दावेदारी करते हुए तीसरा मोर्चा गठित करने या फिर जनसभाओं को लेकर आन्दोलन का बिगुल बजाने की बात कर रहा है। हालातों के मद्देनजर एक राजनैतिक करफ्यू की स्थिति है और मालूम हो रहा है कि मोदी सरकार की तमाम विफलताएं भी सफलताओं की श्रेणी में खड़ी होकर विपक्ष को नेस्तानाबूद करने में जुटी हुई है। ऐसा नही है कि विपक्ष अपनी ओर से कोई प्रयास नहीं कर रहा बल्कि अगर राजनैतिक गतिविधियों पर गौर करे तो यह स्पष्ट तौर पर दिखता है कि पिछले तीन-चार सालों में कांग्रेस के अघोषित नेतृत्व के रूप में राहुल गांधी ने जितनी मेहनत की है और अकेले अपने दम पर उन्होनें जितनी गलियों की खाक छानी है, उतनी शायद कांग्रेस के किसी बड़े नेता ने नहीं छानी लेकिन जनता के बीच में राहुल की छवि एक नातर्जुबेकार व विरासत की राजनीति करने वाले नेता की बना दी गयी है और अब तक उनपर इतने चुटकुले व किस्से कहानियां प्रचारित है कि अब उनकी ही पार्टी के नेताओं को लगने लगा है कि उसका शीर्ष नेतृत्व नाकाबिल और नकारा है। ठीक यहीं सबकुछ केजरीवाल पर भी आजमाया जा रहा है और जुम्मा-जुम्मा चार दिन पहले राजनीति में आये केजरीवाल को लेकर कुछ लोग इतने उत्तेजित है कि मानों देश की आजादी के बाद इन पिछले सत्तर सालों में देश के हर कोने भी हुई बेइमानी व भ्रष्टाचार के लिए केजरी ही दोषी हो। मौजूदा सरकार द्वारा अपनी छवि निर्माण के लिए विज्ञापन में किया गया अरबों का खर्च गवाह है कि सरकार एक सधे हुए अन्दाज में अपनी मुहिम को जारी रखे हुए है और किसी भी राजनैतिक दल से यह उम्मीद की ही जानी चाहिए कि वह अपनी उपलब्धियों व विचारधारा को जनता के बीच पहुंचाने के लिए वक्त के हिसाब से सूचना संचार के समुचित संसाधनों का उपयोग करते हुए बढ़त बनाने की कोशिश करे लेकिन मोदी सरकार में विपक्ष की आवाज दबाने के लिए भी इन संसाधनों का प्रयोग बेहतर तरीके से किया जा रहा है और यह आश्चर्यजनक है कि भाजपा राज में सोशल मीडिया पर छितराये मोदी के अन्ध समर्थको के अलावा इलैक्ट्रानिक मीडिया के भी एक बड़े हिस्से पर सरकार समर्थक उद्योगपतियों की कब्जेदारी ने विपक्ष को इस लायक ही नहीं छोड़ा है कि वह अपनी बात जनता तक पहुंचा भी सके। ठीक इसी प्रकार प्रिंट मीडिया के पूंजीपतियों के कब्जे वाले हिस्से पर मजीठिया आयोग के डण्डे का सहारा लेकर पैद़ा किया जा रहा डर और छोटे अखबारों व पत्र पत्रिकाओं पर डीएवीपी व आरएनआई के माध्यम से ढाये जा रहे कहर ने मीडिया के इस हिस्से की कमर ही तोड़कर रख दी है। पूरे देश में एक अघोषित सा आपातकाल है और मजे की बात यह है कि इस आपातकाल के विरूद्ध मोर्चा खोलने के लिए आपको कुछ ऐसी तथाकथित रूप से राष्ट्रवादी ताकतों से टकराना पड़ सकता है जिनके लिए मोदी राष्ट्रीय सम्मान की विषय वस्तु है और देश के प्रधानमंत्री के रूप में मोदी द्वारा उठाये गये किसी भी कदम की निन्दा करना या मीन-मेख निकालना, जिनकी नज़रों में राष्ट्रीयता का अपमान है। विपक्ष को पूरा हक है कि वह इस तरह के मुद्दों का खुलकर विरोध करे और जनपक्ष को साथ लेकर हर सम्भव तरीके से आम आदमी की लड़ाई को आगे बढ़ाये लेकिन जनहित के मुद्दों पर नेताओं की आवाज को नियोजित तरीके से रोका जा रहा है और उनके बयानों को भद्दे मजाक के रूप में जनता के बीच इस तरह से प्रस्तुत किया जा रहा है कि विपक्ष की राजनीति कर रहे नेताओं की छवि सीधे तौर पर प्रभावित हो। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि सच्चे-झूठे वादों और लोकलुभावन नारों के साथ सत्ता के शीर्ष पर पहुंची भाजपा अब इसपर अपनी कब्जेदारी बनाये रखने के लिए हर वह दांव आजमा लेना चाहती है जो उसे थोड़ी भी राहत देता हो और मजे की बात यह है कि इस वक्त भाजपा का हर दांव मौके पर चोट कर रहा है या फिर जुमलेबाजी से चुनाव जीते मोदी ने सत्ता के शीर्ष पर काबिज होने के बाद वह ब्रहमज्ञान पा लिया है जो हर चुनाव मे भाजपा को आशाओं से अधिक सफलता दे रहा है। खैर वजह चाहे जो भी हो लेकिन यह सच है कि इस वक्त मोदी के नाम का डंका सारे देश में बज रहा है और हर छोटे-बड़े चुनाव में मिली सफलता के साथ मोदी देश की एकमात्र लोकप्रिय नेता के रूप में स्थापित होते जा रहे है लेकिन भाजपा को लगातार मिल रही सफलताओं के बीच यह प्रश्न भी स्वाभाविक तौर पर उठता है कि अगर वाकई में राजनीति विपक्ष विहीन हो गयी तो लोकतन्त्र को तानाशाही में बदलते कितनी देर लगेगी। गौ -हत्या पर रोक लगाने के लिए अराजक हो मारपीट तक करने को उतारू दिखते गौ – भक्त तथाकथित राष्ट्रवाद, भारत माता की जय या फिर वंदेमातरम् जैसे नारों को मुद्दा बना प्रमाण पत्र बांटते दिख रहे मोदी समर्थक इस तथ्य को प्रमाणित करते है कि भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में यह विचारधारा तेजी से घर करने लगी है कि बदलते हुए भारत में शांतिपूर्ण तरीके से रहने के लिए सरकार चलाने वाले से कही ज्यादा सरकार समर्थकों की जी हुजूरी करना जरूरी है लेकिन सवाल यह है कि अगर हर ताकतवर समूह अतिरेक के साथ अपनी मनमर्जी लागू करने के लिए कानून को इसी तरह अपने हाथ में लेता रहा तो मोदी राज का मंसूबा कहां पूरा जो पाएगा और इससे भी बड़ा सवाल यह है कि अगर सब कुछ ऐसे ही चलता रहा तो आतंकवाद व भगवाराज में कितना फर्क रह जायेगा।

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