नौ दिन चले अढा़ई कोस | Jokhim News

Friday, July 21, 2017

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नौ दिन चले अढा़ई कोस

अपने ही फैसलों के रद्दोबदल में फंसी दिख रही है उत्तराखंड सरकार किसी भी सरकार के कार्यकाल का आकलन करने के लिए एक-डेढ़ माह का समय नगण्य होता है और अगर सरकार के समक्ष किसी उपचुनाव से निपटने या फिर अस्तित्व में आते ही किसी अन्य चुनाव की तैयारी में लगने जैसी मजबूरी न हो तो यह माना जा सकता है कि नवगठित सरकार को राज्य की जनता का हित देखते हुए पूर्ववर्ती सरकारों के तमाम फैसलों की विवेचना के साथ अपनी कार्यनीति बनाने और नये फैसलों को लागू करने के लिए वक्त की दरकार होती ही है लेकिन इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि इन दरमियान में सरकारी कामकाज ठप हो जाने चाहिए और शासकीय फैसलों को लेकर अपनी मनमर्जी चला रही नौकरशाही को यह कड़ा सन्देश नहीं दिया जाना चाहिए कि राज्य की नवगठित लोक हितकारी सरकार व्यापक जनसमर्थन का सम्मान करते हुए राजतन्त्र पर हावी नौकरशाही की कार्यशैली की समीक्षा कर रही है। उत्तराखण्ड में कुछ ऐसा ही हो रहा है और दो तिहाई से भी अधिक बहुमत के साथ प्रदेश के मुख्यमंत्री बने त्रिवेन्द सिंह रावत के चुप-चुप अन्दाज व एक अनसुलझी पहली की तरह लग रही उनकी कार्यशैली को देखते हुए ऐसा प्रतीत हो रहा है कि राज्य में मानों सरकार का गठन ही नहीं हुआ है या फिर सरकार की पूरी कमान नौकरशाही के हाथ में है। ऐसा नहीं है कि उक्त सरकार के मन्त्री काम नही कर रहे या फिर उनके दौरों, घोषणाओं अथवा विभागीय बैठकों के दौरान कहीं कोई कमी देखी जा रही है और सत्ता सम्भालने के बाद मुख्यमंत्री राजकार्यों को छोड़कर अन्य कहीं व्यस्त है बल्कि अगर सरकार के कामकाज के तरीके पर विचार करे तो नवनिर्वाचित सरकार के मन्त्री पूर्व की सरकारों की अपेक्षा कहीं ज्यादा समय अपने मन्त्रालयों को दे रहे है और सरकार द्वारा लगातार मन्त्रीमण्डल की बैठकों के आयोजन के साथ ही साथ अपने अस्तित्व में आने के बाद दूसरी बार विधानसभा सत्र आहूत किया जाना इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि सरकार अपने लक्ष्य को लेकर कतई लापरवाह नहीं है लेकिन सरकारी फैसलों पर शासनतन्त्र का दुलमुल रवैय्या तथा सरकार द्वारा लिये गये फैसलों को चुनौती दिये जाने के अलावा अपने ही फैसलों पर पुनर्विचार करते हुए फैसलों में बड़ा बदलाव लाती दिख रही सरकार यह इशारा दे रही है कि कहीं न कहीं कोई बड़ा झोलझाल है। हो सकता है कि त्रिवेन्द्र रावत के नेतृत्व वाली सरकार ने इसे महसूस न किया हो लेकिन यह समझ नहीं आता कि वर्तमान सरकार के अस्तित्व में आते ही लगभग पूरे उत्तराखण्ड में हो रहे शराब की दुकानों के विरोध में आन्दोलन के बावजूद पहले राष्ट्रीय राजमार्गाें को जिला व प्रदेश मार्गाें मे बदलने की कवायद तथा फिर शराब की दुकानों के खुलने – बन्द होने के समय में कटौती कर वाहवाही लूटने की कोशिश किसके इशारे पर थी। वर्तमान में राष्ट्रीय राजमार्गाें को बदले जाने के सरकारी आदेश को न्यायलय में चुनौती दी जा चुकी है जबकि शराब की दुकानों के खुलने और बन्द होने के समय को लेकर सरकार ने खुद ही इस फैसले के पहाड़ी जिलों में लागु होने व राज्य के मैदानी इलाकों में शराब की दुकाने पूर्ववत खुलने की घोषणा कर दी है। ठीक इसी प्रकार पूर्ववर्ती सरकार द्वारा भाजपा के विरोध के बाद रोके गये कैलाश खेर के भुगतान को लेकर सरकार में न मालुम इतनी जल्दी बाज़ी किसे थी कि इस प्रकरण को लेकर व्यर्थ में ही सरकार को छिछालेदारी का सामना करना पड़ा और शुरूवाती दौर से ही कैलाश खेर को भुगतान किये जाने का विरोध कर रहे भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट को इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप की मांग करते हुए सरकार को फैसले की वापसी के लिए मजबूर करना पड़ा। उपरोक्त के अलावा सचिवालय प्रशासन द्वारा नियमों के विपरीत जाकर दो पीसीएस अधिकारियों की अपरसचिव के रूप में मुख्यमंत्री कार्यालय में की गयी तैनाती फिर एक पक्ष के विरोध के बाद इनको पहले निचले पद पर तैनाती के आदेश जारी करना तथा स्थानांतरण निरस्त करते हुए मूल तैनाती पर वापस भेजना और कुछ ही दिनों के उपरान्त इन्हें एक बार फिर मुख्यमंत्री कार्यालय में अपर सचिव के रूप में तैनाती के आदेश जारी कर देना, यह दर्शाता है कि मुख्यमंत्री के इर्द-गिर्द अनाड़ी सलाहकारों की भरमार है या फिर राज्य के वरिष्ठ नौकरशाह अपनी जरूरत व शौक के हिसाब से मुख्यमंत्री का इस्तेमाल कर रहे हैं। राजकाज में सरकार द्वारा अपने फैसले वापस लेना या फिर वक्त की जरूरत के हिसाब से उनमें सुधार करना कोई नयी बात नहीं है और न ही यह स्थिति इन सोलह सत्रह सालों में पहली बार सामने आयी है लेकिन एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार व हाईकमान के वरदहस्त से सरकार के मुखिया बने अनुभवी नेता से यह उम्मीद की जाती है कि वह पूरी परिपक्वता के साथ सरकारी कामकाज को अंजाम देते हुए अपने कामकाज के तरीके को एक मिसाल के रूप में जनता के सामनें रखें और यहां पर यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि त्रिवेन्द्र सिंह रावत इस मापदण्ड में पूरी तरह असफल साबित हुए हैं। यह तथ्य किसी से छुपा नहीं है कि कर्ज में चल रही प्रदेश की अर्थव्यवस्था और पूर्ववर्ती सरकार की शाहखर्ची व अनाप-शनाप घोषणाओं की वजह से बढ़े खर्च के चलते राज्य इस वक्त आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है। हालातों के मुद्देनजर सरकार को चाहिए था कि वह गैर जरूरी खर्चों को कम करते हुए जनता के सामने एक मिसाल कायम करती और पूर्ववर्ती सरकार की घोषणाओं को समीक्षा की कसौटी पर कसकर पूरा करने की कोशिश की जाती लेकिन पुराने ही ढर्रे से राजकाज चला रहे नौकरशाह मुख्यमंत्री को खुश करने के लिए उन्हें उद्घटनों व घोषणाओं तक ही सीमित रखना चाहते हैं और सांकेतिक सफाई अभियानों या फिर बिना किसी निष्कर्ष के ही समाप्त हो जाने वाली बैठकों के जरिये मुख्यमंत्री को उलझायें रखने का काम बदस्तूर व बखूबी जारी है। यह ठीक है कि नेताओं के लिए स्वागत् सभाएँ व उद्घाटन कार्यक्रमों में उमड़ी भीड़ का एक अलग महत्व है तथा सार्वजनिक पद पर कार्यरत मंत्री या अन्य राजनैतिक ओहदेदार को इस तरह के कार्यक्रमों के जरिये अपनी ताकत का अहसास होता है लेकिन इसका तात्पर्य यह तो नहीं है कि सरकार के मन्त्री स्वागत् व घोषणाओं के अलावा कोई काम ही न करे और शासन तन्त्र के गम्भीर मुद्दों व जनता से जुड़े बड़े सवालों को दरकिनार करते हुए ’उत्तराखण्ड में रहना होगा तो वंदेमातरम् कहना होगा‘ जैसे गैरजरूरी वक्तत्व एक जिम्मेदार सरकार के जिम्मेदार मंत्री की ओर से आये। महाविद्यालय में लगने वाले राष्ट्रीय ध्वज की उँचाई कितनी हो, छात्र संघ के चुनाव कितने वर्षाें में कराये जाये या फिर महाविद्यालय में छात्रों व अध्यापकों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए कौन से कदम उठाये जाये, जैसे सवालों को उठाने से अच्छा है कि सरकार प्रदेश के महाविद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का दिया जाना सुनिश्चित करे और इसके लिए जरूरी है कि प्रदेश के महा विद्यालयों को जरूरी भवन, शिक्षक व अन्य व्यवस्थाएं मिलें। अफसोसजनक है कि केन्दª के साथ ही साथ प्रदेश में भी भाजपा की सरकार आने पर प्रदेश के विकास में डबल इंजन लगने की बात करने वाली राजनैतिक विचारधारा के लोग रूसा जैसी तमाम महत्वकांक्षी योजनाओं और परियोजनायें का बजट आबंटन बन्द किये जाने या फिर इसे पूर्व की भांति राज्य व केन्द सरकार के बीच 10 अनुपात 90 की जगह 30 अनुपात 70 किये जाने पर प्रभावशाली चर्चा छेड़ने के स्थान पर राज्य की जनता को बेमतलब के मुद्दों में उलझाने का प्रयास कर रहे हैं।

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