माओवाद व नक्सलवाद के नाम पर | Jokhim News

Friday, July 21, 2017

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माओवाद व नक्सलवाद के नाम पर

उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों में शराब विरोधी आन्दोलन से जुड़े लोग हो सकते है पुलिसिया कहर के शिकार उत्तराखंड के शराब विरोधी आंदोलन को माओवादियों के समर्थन से जुड़ी खबरें हैरान कर देने वाली है लेकिन हाल ही के कुछ महिनों में यह दूसरा मौका है जब वामपंथी विचारधारा से जुड़े सशस्त्र क्रान्ति के समर्थक माने जाने वाले एक संगठन ने खुलकर अपनी उपस्थिति का अहसास कराने की कोशिश की है। इससे पूर्व विधानसभा चुनावों के दौरान कुंमाऊ के कुछ क्षेत्रो में इस संगठन की ओर से चुनावों के बहिष्कार से जुड़ी प्रचार सामग्री को बांटने तथा छुटपुट आगजनी करने व दीवारों पर नारे लिखने जैसी खबरें प्रकाश में आयी थी। नेपाल तथा तिब्बत के रास्ते चीन सीमा से जुड़ा भारत का यह संवेदनशील हिस्सा वैचारिक रूप से वामपंथी आन्दोलन से अछूता नही रहा है और देश की आजादी से वर्तमान तक उत्तराखंड के विभिन्न क्षेत्रों से वामपंथी विचारधारा से जुड़े अनेक विचारक निकले है। इतना ही नही अगर पुलिस द्वारा प्रदत्त आंकड़ों को सच माना जाय तो वर्तमान में भी देश के विभिन्न हिस्सों में उग्र वामपंथ के नाम पर माओवाद या नक्सलवाद की कमान संभालने वाले युवा चेहरों में उत्तराखंड की भागीदारी ठीक-ठाक है लेकिन ऐसा कम ही मौको पर देखने में आया है कि माओवादियों या नक्सलवादियों ने उत्तराखंड में किसी बड़ी वारदात को अंजाम देने की कोशिश की हो। हांलाकि स्थानीय पुलिस ने अपनी खुफिया रिपोर्टो के आधार पर प्रशांत राही समेत कई छोटे बड़े नामों की गिरफ्तारी माओवाद को शह देने के नाम पर की है और कुछ वनक्षेत्रों में माओवादियों के अभ्यास शिविर लगाये जाने की खबरों के साथ छापेमारी व काम्बिंग अभियान भी चलाया गया है लेकिन अभी तक किसी बड़ी नक्सलवादी वारदात या फिर माओवादियों को पनाह देने जैसी खबर उत्तराखंड में नही आयी है। वैसे व्यापक जनहित से जुड़े मुद्दों पर होेने वाले आंदोलनों को वामपंथी नजरिये से देखना तथा जनता के सरकार विरोधी सुरो को आसानी से दबाने के लिऐ उग्र वामपंथ या नक्सलवाद और माओवाद को बढ़ावा देने के नाम पर दो-चार-दस लोगों की गिरफ्तारियां दिखा देना सत्तापक्ष के नेताओं व स्थानीय पुलिस प्रशासन के लिऐ कठिन नही है लेकिन अगर हकीकत में देखा जाय तो इस प्रदेश की जनता के स्वाभीमान व राष्ट्रभक्ति से अवगत् होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर साजिशों के माध्यम से इस तरह की संभावनाओं पर बल देना सरकार व कानून के रहनुमाओं के लिऐ ठीक नही है। कितना आश्चर्यजनक है कि राज्य की सरकारी व्यवस्था एक ओर स्थानीय जनता एवं माओवादी विचारकों के बीच गठजोड़ की संभावना व्यक्त करते हुये कुछ अनहोनी घटित होने की आंशका के साथ सनसनी पैदा करने की कोशिश करती है तथा विचारधारा के नाम पर मौजूदा प्रदेश व केन्द्र सरकार का समर्थन करने का दावा करने वाले कुछ लोग चाईना निर्मित सामग्री के पूर्ण बहिष्कार का नारा देकर एक अलग तरह का माहौल बनाने की कोशिश करते है लेकिन सरकार अपने गठन के साथ ही विदेशी निवेश को बढ़ावा देने के नाम पर हजारों करोड़ की लागत के साथ उत्तराखंड की ओर रूख करने वाले चीन के उद्योगपतियो व उद्योगों का पलक-पांवड़ें बिछाकर स्वागत करने को बेताब नजर आ रही है। यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि सरकारी नियन्त्रण में आने वाले चीन के उद्योग पूरी तरह चीन सरकार की माओवादी नीतियों का अनुसरण करते है और तकनीकी के बेहतर इस्तेमाल के चलते इन उद्योगों में अकुशल श्रमिकों को रोजगार मिलने की संभावना भी बहुत कम है। इन हालातों में यह कैसे माना जा सकता है कि नेपाल समेत विश्व के तमाम हिस्सों में माओवादी आन्दोलन के नैतिक समर्थन के नाम पर अतिवादियों को विभिन्न सहूलियते व हथियार मुहैय्या करवाने वाली चीन की माओ सेना के बड़े अधिकारी भारत के इस महत्वपूर्ण इलाके पर अपना हक जमाने के लिऐ इसे अलगाववाद व आंतक की आग में नही झोंकना चाहेेंगे। अगर सरकारी तंत्र को उत्तराखंड से जुड़े किसी भी हिस्से या फिर इसके आसपास वाले क्षेत्रों में माओवादियों या नक्सलवाद को शरण मिलने की संभावना है तो इस प्रदेश व देश की सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोपरि जान उत्तराखंड में चायना के सहयोग से होेने जा रहे औद्योगिकरण व चायना की कम्पनियों द्वारा किये जाने वाले विदेशी निवेश को हतोत्साहित करना होगा लेकिन सरकार का अंदाजे बंया कुछ और ही इशारे कर रहा है। तो क्या यह माना जाय कि लगभग समुचे उत्तराखंड में थमने का नाम ही नही ले रहे शराब विरोधी आन्दोलन के सुरो को शांत करने के लिऐ सरकारी तंत्र माओवाद या नक्सलवाद के नाम पर कुछ सक्रिय आन्दोलनकारियों को अपनी गिरफ्त में ले पहाड़ में संभावित नशा विरोधी आंदोलन के हौसले शुरूवाती दौर में ही पस्त करना चाहता है। इसलिऐं सरकार द्वारा जानबूझकर स्थानीय जनता के दिल में पहाड़ पर सक्रिय माओवादियों व नक्सलवादियों का भय बैठाया जा रहा है। वैसे अगर देखा जाय तो उत्तराखंड के तराई वाले क्षेत्रों में सरकारी जल्दबाजी व गलत नीतियों के चलते कुछ ही समय पहले स्थापित उद्योग अपना बोरिया-बिस्तर समेटने लगे है जिसके चलते हरिद्वार, उधमसिंहनगर, देहरादून आदि के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों (सिडकुल) में स्थानीय श्रमिक सड़कों पर उतरकर आंदोलन कर रहे है। अगर सरकारी तौर-तरीकों व माओवाद या नक्सलवाद के नाम पर संभावित दिख रहे स्थानीय जनता के उत्पीडन के बीच इन तमाम छोटे-बड़े श्रमिक संगठनों ने पूरी एकजुटता के साथ सरकार के खिलाफ बिगुल फूंक दिया और औद्योगिक निवेश के नाम पर चीन से उत्तराखंड की ओर रूख कर रही कम्पनियों में अधिकारियो के तौर पर काम करने वाले चीन के स्थायी नागरिकों ने चीनी सेना की शह अथवा योजना पर सड़कों पर संघर्ष कर रहे स्थानीय नौजवानों को किसी भी तरह की शह अथवा आश्वासन देकर अपनी ओर मिला लिया तो आगे आने वाले हालात वाकई में मुश्किल भरे हो सकते है लेकिन हमारा सरकारी तंत्र इस ओर से कतई चिन्तित नही दिखता बल्कि अगर केन्द्र व राज्य सरकार की शह पर काम रही प्रतीत होती भाजपा की हिन्दूवादी विचारधारा से ओत-प्रोत सोशल मीडिया की तथाकथित राष्ट्रवादियों का सेना के कमेन्ट, विचार या फिर स्टेट्स आदि पर गौर किया जाय तो ऐसा लगता है कि राष्ट्र की राजनैतिक सत्ता पर अपनी कब्जेदारी बनाये रखने के लिऐ हर प्रकार के आन्दोलन व विरोधी सुरो को ताकत के बलबूते पर दबाने के पक्षधर माने जाने वाले कुछ लोग वास्तव में यही चाहते है कि जनता आंतक व भय के साये में जीती रहे और वह आराम से सत्ता का आनन्द लें सकेें।

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