नौनिहालों पर मंडराता खतरा | Jokhim News

Friday, August 18, 2017

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नौनिहालों पर मंडराता खतरा

सिर्फ तात्कालिक आंदोलन या आवेश से नही ढ़ूंढ़ा जा सकता इस गंभीर समस्या का समाधान पिछले दिनों हल्द्वानी के एक प्रतिष्ठित स्कूल की प्राथमिक कक्षा में पढ़ने वाली बच्ची के साथ जो कुछ हुआ वह वाकई शर्मशार कर देने वाला था और इस घटनाक्रम के उजागर होते ही स्थानीय जनता ने इस स्कूल की व्यवस्था के खिलाफ जो प्रदर्शन किया, उसे स्वाभाविक प्रतिक्रिया का एक हिस्सा माना जा सकता है लेकिन सवाल यह है कि क्या इस घटनाक्रम के सामने आने के बाद या फिर इससे पहले बार-बार सामने आने वाले इस तरह के हालातों के मद्देनजर हमने अपने सुरक्षा इंतजामातों को चैकस किया और किसी भी मोर्चे पर यह तसल्ली करने की कोशिश की कि इस तरह की स्थितियां अब आगे पैदा नही होंगी। शायद नही, एक दिन के हल्ले-गुल्ले और अपने नौनिहालों को लेकर दिखाई गयी चिन्ता के बाद हमारी जिन्दगी एक बार फिर उसी ढ़र्रे पर है तथा बेहतर परवरिश व भविष्य को लेकर की जाने वाली चिन्ताओं के बीच हम अपने बच्चों को उन्हीं अंजान हाथोें में सौंपने को मजबूर है जिनमें से कोई भी दरिन्दा हो सकता है या फिर बच्चों के साथ घटित दुर्घटना व र्दुव्यवहार को जहां सिर्फ इसलिऐं छुपाया जाना मजबूरी माना जाता है क्योंकि इसका असर उन प्रतिष्ठानों को व्यवसायिक नुकसान पहुंचा सकता है जिन्हें हम शिक्षा का मन्दिर मान अपनी जेबे कटा लेने के बाद अपने नौनिहालों के लिऐ बेहतर सुरक्षित जगह समझने की भूल कर लेते है। व्यवसायिक हो चुके रिश्तों में कितना भरोसा किया जाय और किसका नही, यह एक कठिन प्रश्न है लेकिन कहा जाता है कि प्रकृति ने महिलाओं को श्रजन शक्ति देने के साथ ही साथ यह समझने व विचारने की ताकत भी दी है कि कौन सी नजर उसके व उसके नौनिहालों के लिऐ नुकसानदायक हो सकती है। अगर इस कथन को सच के थोड़ा भी नजदीकी माना जाय तो महिलाऐं इस समस्या के समाधान ढ़ूंढ़ने में काफी हद तक सहायक हो सकती है और राजनैतिक सोच या व्यवसायिक लाभ को दरकिनार कर बनाये जाने वाले महिला संगठन अथवा समूह सामाजिक रूप से एक क्रान्ति लाते हुये देश व समाज के एक बड़े हिस्से में अपराधों को नियन्त्रित रखने के मामले में मददगार साबित हो सकते है लेकिन सवाल यह है कि इन महिला समूहों व संगठनो को एकजुट करने की पहल कहां से हो और वह कौन से तरीके आजमाये जाये जो कि स्थानीय स्तर पर समाज में एक बड़े हिस्से का विश्वास इनपर कायम हो।पूर्व में हुई घटनाओं को संज्ञान मंे लेते हुये तथा उत्तराखंड के विभिन्न हिस्सों में वर्तमान में चल रहे शराब की दुकानों के विरोधी आंदोलन को देखते हुये यह कह सकते है कि तात्कालिक मुद्दों पर आक्रोशित जनता एक भीड़ की तर्ज पर तनावपूर्ण वातावरण बनाने तथाा शासन-प्रशासन का ध्यान अपनी ओर खींचने में तो कामयाब रहती है लेकिन अधिकांश मामलों में यह देखा गया है ऐसे आन्दोलन किसी निष्कर्ष तक नही पहुंच पाते क्योंकि इस तरह के आंदोलनों में भागीदारी कर रहे अधिकांश लोगों को अपने लक्ष्य का ज्ञान ही नही होता और वह कानूनी प्रक्रियाओं से हटकर आरोपी को फांसी देने या फिर आंदोलन स्थल पर ही फैसला सुनाऐं जाने जैसी बेतूकी मांग करना शुरू कर देेते है। अगर इस तरह के लक्ष्यहीन आन्दोलनों के स्थान पर स्थानीय स्तर पर घटित तमाम छोटी- बड़ी घटनाओ व स्थानीय समस्याओं को एकजुटता के साथ एक मंच या सामाजिक संगठन के माध्यम से उठाया जाय तो इस तरह के मोर्चो पर जनता एकजुट नही दिखाई देती। अपराधी मनोवृत्ति के लोग जनसामान्य की इसी मानसिकता को फायदा उठाते है और उनका लूट व अपराध का धंधा बदस्तूर चलता रहता है। हमने देखा है कि पिछले दिनों देश की राजधानी दिल्ली में घटित अनन्या गैंगरेप एंव हत्या के मामले में सारे देश में प्रदर्शन हुये और इस तरह के अपराधों की स्थिति में कड़ा दण्ड देने की मांग के साथ महिला सुरक्षा से जुड़े कानूनों में सुधार व सुरक्षा व्यवस्था को चैकस करने की मांग भी जोर-शोर से उठी लेकिन कुछ ही समय के जोश व जुनून के बाद सबकुछ सामान्य हो गया और इस सम्पूर्ण घटनाक्रम के बाद वर्तमान तक ऐसी हजारों-हजार घटनाऐं सामने आ चुकी है जिसमें वहशी दरिन्दोे द्वारा नवजात कन्या शिशुओं से लेकर विवाहिता या अस्सी साल तक की बुजुर्ग महिला तक से जोर-जबरदस्ती शारिरिक सम्बन्ध बनाने की कोशिश की गयी है किन्तु सरकार या कानून का काम करने का तरीका नही बदला है और न ही अपराधियों के हौसलें टूटते दिख रहे है। ऐसा नही है कि इस तरह के अपराध पहले नही थे या फिर मीडिया को अतिसक्रियता के चलते ही इस तरह के अपराधों व अपराधियों को सामाजिक व सार्वजनिक रूप से बेनकाब होने का मौका मिला है लेकिन यह सच है कि सिमटते परिवार के दायरों ने जहां आपसी विश्वास को कम कर महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों को बढ़ाया है वहीं समाज में तेजी से बढ़ रही नशे की लत भी इस तरह के तमाम अपराधों का एक बढ़ा कारण दिखाई दे रही है। नशे के व्यापार को सरकारी संरक्षण और सरकार चलाने वाले नेताओं व नौकरशाहों के गठबंधन द्वारा नशे के सौदागरों को दी जाने वाली अवैध शह ने शराब, स्मैक, हशीश, चरस जैसे तमाम नशों के कारोबार को मोटे फायदा का सौदा बना दिया है तथा यह तथ्य किसी से भी छुपा नही है कि समाजिकता व मानवीय मूल्यों पर होेने वाले हमले से जुड़े अधिकांश मामलों में इसी तरह के नशे की गिरफ्त में रहने वाले विकृत मानसिकता के युवाओं व पुरूषों का हाथ होता है। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि तथाकथित विकास के नाम पर मिली इस भागदौड़ वाली जिन्दगी ने हमें आधुनिकता व विलासिता के नाम पर जो कुछ भी दिया है उसका खामियाजा हमारे नौनिहालों को भुगतना पड़ रहा है और मौजूदा माहौल को देखते हुये यह कहने में कोई हर्ज नही है कि सामाजिक रिश्ते-नातो से दूर मां-बाप की दमित इच्छाओं की पूर्ति के लिऐ किताबी कीड़ों में तब्दील होेते जा रहे हमारे बच्चे आज पूरी तरह असुरक्षित महसूस कर रहे है। सड़क पर जाम लगा या फिर घटनास्थल पर प्रदर्शन कर हम किसी घटना के घटित होने के बाद अपने आक्रोश का प्रदर्शन तो कर सकते है लेकिन इस तरह की हरकतों के जरिये हम अपने नौनिहालोें को उनका हक व वह आजादी नही दे सकते जिसकी की वाकई में उन्हें जरूरत है। इसलिए आईये बैठकर इस गंभीर समस्या पर विचार करें और आरोपी को गिरफ्तार करने या फिर किसी एक संस्थान को बंद करने के लिऐ आन्दोलन के नाम पर सड़कों पर कुछ घंटो का जाम लगा अव्यवस्था पैदा करने की जगह उन कारणों को तलाशकर उनके समाधान तक पहुंचने की कोशिश करें जिन्होंने इस तरह की समस्याओं को जन्म दिया है।

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