‘साधो यह परिवर्तन क्या है? | Jokhim News

Saturday, November 18, 2017

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‘साधो यह परिवर्तन क्या है?

राष्ट्रीय स्तर पर एकरूपता लाने के लिऐ जरूरी है कानूनों का सही इस्तेमाल मुस्लिम समाज द्वारा अजान के वक्त किये जाने वाले लाउड स्पीकर के प्रयोग को लेकर सोनू निगम द्वारा दिया गया बयान राजनीति से प्रेरित था या फिर फिल्मी दुनिया में काम कम होने की वजह से चर्चाओं में बने रहने के लिऐ आजमाया गया हथकण्डा लेकिन यह सच है कि उन्होंने अपने इस बयान पर हुये फतवें का जवाब देने के लिऐ जो तरीका आजमाया वह कट्टरपंथियों के मुंह पर एक तमाचे की तरह है। धार्मिक आयोजनों के दौरान लाउडस्पीकरों का प्रयोग हो या फिर धार्मिक शोभा यात्रा अथवा जुलूस के माध्यम से सड़क यातायात को अव्यस्थित करने का मौका, इन सभी अव्यवस्थाओं का विरोध होना चाहिऐं और धार्मिक आस्था को सड़कों पर लाकर नियम-कानूनोें को तोड़ते हुये धर्मो के नाम पर किसी भी प्रकार के जंगलराज को कायम करने का देश की पढ़ी-लिखी पीढ़ी व नौजवानों द्वारा विरोध किया जाना चाहिऐ। व्यवस्थाऐं, सरकार व शासन तंत्र, नियम और कानूनों से चलता है, धार्मिक मान्यताओं अथवा परम्पराओं से नही तथा भारत जैसे धार्मिक विविधता वाले देश में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को बनाये रखने के लिऐ धर्म एवं राजनीति का घालमेल होने से बचाया जाना जरूरी है लेकिन अफसोसजनक है कि धार्मिक कट्टरपंथ के हिसाब से देश चलाने व नियम कानूनों में बदलाव लाने वाले लोग इन तथ्यों को समझना नही चाहते और धार्मिक मान्यताओं व धर्म ग्रंथों की अपने फायदें-नुकसान के हिसाब से व्याख्या कर कानूनों में छोटे-बड़े बदलाव लाने या फिर धार्मिक मान्यताओं के हिसाब से कानून बनाने की मांग जब-तब उठती रहती है। मसला तीन तलाक का हो या फिर कुर्बानी देने के नाम पर सड़कों पर खुलेआम जानवरों के कत्लखाने खोले जाने का, इस तमाम विषयो और मुद्दांे को कानून की हद में लाया जाना जरूरी है तथा इन तमाम संदर्भो पर एक समान नियम व कानून लागू किया जाना जरूरी भी है लेेकिन इसका तात्पर्य यह कदापि नही है कि इस तरह की व्यवस्थाऐं किसी जाति या धर्म विशेष के लिऐ ही लागू की जाय। हमने देखा है कि मस्जिदों में अजान के लिऐ लाउडीस्पीकरों का उपयोग होने के साथ ही साथ इनका ऐसा ही उपयोग मन्दिरों व गुरूद्वारों में भी होता है तथा विभिन्न धार्मिक अवसरों पर होने वाले जगरातों के अवसर कान फोडू आवाज के साथ माता की भेंटे गाना और इन आयोजनों के लिऐ सड़कों पर ही टेन्ट लगा लेना एक आम समस्या है। इन स्थितियों का स्थानीय स्तर पर यदा-कदा विरोध भी होता है लेकिन विरोध की स्थिति में धर्म प्रेमी जनता को धर्म के नाम पर लामबंद करने की अपील के साथ इस तरह का विरोध करने वालों के खिलाफ फतवा जारी करने या फिर खुलेआम गुंडई में उतरने की परम्परा अन्य धर्मो में कम देखी जाती बल्कि ऐसे अवसरों पर लाउडस्पीकर की आवाज कम ज्यादा कर और आपसी सुलह-समझौते से काम निकालने की कोशिश बड़े-बुजुर्गो द्वारा की जाती है और शायद यहीं वजह भी है कि हमारे पुरखों द्वारा हर छोटे-बड़े आयोजन के वक्त दो चार सयानों या बुजुर्गो को साथ लेकर चलने की हिमायत की गई है। इस्लाम में इन बुजुर्गो या सयानों का स्थान मुल्ला-मौलवियों ने ले लिया है और अपनी धार्मिक सल्तनत् बनाये रखने के लिऐ यह मुल्ला-मौलवी अपने नफे-नुकसान को ध्यान में रखते हुये किसी भी घटनाक्रम की धार्मिक व्याख्या कर फतवा जारी कर देते है क्योंकि यह फतवें धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाले तथा आस्था व विश्वास पर सीधे असर करने वाले होते है, इसलिऐं यह समाज के एक बड़े हिस्से को प्रभावित भी करते है। दशकों पहले ऐसे ही कुछ हालत हिन्दू धर्मालम्बियों के भी थे और वहां ब्राहमण समाज धर्म से जुड़े तमाम मामलों का ठेकेदार बन गया था लेकिन इधर पिछले कुछ वर्षों में आयी धार्मिक चेतना ने हालातों को बदला है और कुछ राजनैतिक लोग अपने राजनैतिक फायदें के लिऐ हिन्दूओं को विचारधारा के नाम पर एकजुट करने के लिऐ प्रयासरत् है। हांलाकि शुरूवाती दौर में इसके परिणाम सुखद हो सकते है और विचारधारा के नाम पर एकजुटता बनाये रखने का यह तरीका सत्ता पर कब्जेदारी के खेल में सहायक हो सकता है लेकिन अगर दूरदृष्टि के आधार पर विचार करें तो हम पाते है कि धार्मिक निजिता में इस किस्म की दखलदांजी और सिर्फ राजनैतिक लाभ को मद्देनजर रखते हुये प्रदर्शित की जाने वाली धार्मिक कट्टरता अन्ततोगत्वा समाज व समाजिकता के लिऐ नुकसानदायक होती है। इसलिऐं किसी धर्म विशेष को लक्ष्य कर की गयी राजनैतिक टिप्पणी भी लोकतंत्र के लिऐ उतनी ही घातक है जितना कि किसी मुल्ला-मौलवी द्वारा दिया गया समाज के विरूद्ध फतवा या धार्मिक आदेश लेकिन अफसोसजनक स्थिति है कि इस देश में राम मन्दिर बनाने के आवहन के साथ विवादित ढंाचा तोड़े जाने के लिऐ भीड़ को उत्तेजित करने पर तो मुकदमा चलता है किन्तु फतवों पर न्यायालय में भी मौन छा जाता है अगर सामाजिक समन्वय व कानून की जद में रहकर बात करें तो दूसरें धर्म, विचारधारा या फिर आस्था के प्रति भड़काने वाले बयान जारी करने वाले हर पक्ष पर कठोरतम् कार्यवाही होनी चाहिऐं लेकिन अफसोसजनक है कि राजनेता व जनभावनाओं से खिलवाड़ कर अपना फायदा ढ़ूंढ़ने वाले लोग हमारे देश की कानून व्यवस्था में स्पष्ट दिखने वाले झोल-झाल से वाकिफ है और जानबूझकर इस अस्त-व्यस्त माहौल का लाभ उठाने की कोशिशें देश के हर हिस्से से जारी है। अफसोसजनक है कि हमारा न्यायालय और कानून व्यवस्था की दुहाई देने वाली व्यवस्था इस ज्वलन्त मुद्दे पर चुप्पी साधे रखने में ही अपनी भलाई समझ रही है।

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