मुहिम पर सवालिया निशान | Jokhim News

Thursday, September 21, 2017

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मुहिम पर सवालिया निशान

क्या सिर्फ लालबत्ती उतर जाने से समाप्त हो जायेगा देश का वीआईपी कल्चर वीआईपी कल्चर को खत्म करने के लिऐ पंजाब के मुख्यमंत्री द्वारा की गयी पहल को आगे बढ़ाते हुये देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बड़ा फैसला लेकर अपने मंत्रीमंडल समेत खुद की गाड़ी से लाल बत्ती हटाने की घोषणा की है तथा मिल रहे समाचारों के अनुसार मजदूर दिवस (1 मई) से राष्ट्रपति व उच्चतम् न्यायालय के न्यायाधीश समेत स्वंय नरेन्द्र मोदी लाल बत्ती लगे वाहनों का प्रयोग नही करेंगे। देखा जाये तो वीआईपी कल्चर खत्म करने की दिशा में यह एक बड़ी पहल है और इससे भी अच्छी बात यह है कि भाजपा शासित तमाम राज्यों के मुख्यमंत्रियों व उनके मंत्रीमण्डल ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस फैसले का स्वागत् करते हुये तत्काल प्रभाव से अपनी-अपनी गाड़ियों की लालबत्तियाँ उतार कर रख दी है। सरकार के इस फैसले के बाद अब देखना यह होगा कि केन्द्र सरकार व राज्य सरकारों के आधीन काम करने वाले विभिन्न कनिष्ठ व वरीष्ठ नौकरशाह सरकार के इस आदेश को किस तरह लेते है और अपने तमाम छोटे-बड़े वाहनों में राजकीय सेंवाये, पुलिस, सचिवालय या पत्रकार लिखकर स्थानीय स्तर पर रोब गांठने के आदी हो चुके विभिन्न स्तरों के तथाकथित वीआईपी सरकार के इस फैसले के बाद क्या रूख अपनाते है। उपरोक्त के अलावा यह देखना भी दिलचस्प होगा कि अपनी गाड़ी से खुद लालबत्ती हटाने के साथ ही साथ अपने मंत्रीमण्डल के सदस्यों की भी लाल बत्ती सुविधा समाप्त करने की घोषणा करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी या फिर उनकी पार्टी से जुड़े विभिन्न प्रदेशों के मुख्यमंत्रीयों की इस घोषणा के बाद भाजपा से जुड़े दूसरे और तीसरे दर्जे के नेताओं का लालबत्ती के साथ ही साथ ही दायित्व के नाम पर मिलने वाली सरकारी सुविधाओं के प्रति मोह कम होता है या नहीं और लालबत्ती उतरने के बाद मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री के साथ चलने वाले लावा लस्कर व कारों के काफिले में कितनी कमी आती है ? यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि हमारी सरकारें नेताओं, विधायकों, मंन्त्रियों व अन्य वी आईपी की सुरक्षा में रोजाना अरबों रूपया खर्च कर रही है और सुरक्षा व समय की बचत के नाम पर अपना अधिकांश सफर सरकारी खर्च पर हवाई मार्ग से करने वाले यह वीआईपी कुछ ही समय में अपनी व्यस्त जिन्दगी में इतने मस्त हो जाते है कि इन्हें जनसामान्य की समस्याओं व उससे जुड़ी परेशानियों का अंदाज ही नही रहता। यह एक बड़ा विषय हो सकता है कि वीआईपी कल्चर समाप्त करने के नाम पर गाड़ियों से लालबत्ती उतारने की यह मुहिम और आगे बढ़ेगी या यहीं पर ठहर कर रह जायेगी। अगर सरकारी वाहनों से लाल व नीली बत्ती उतर जाने के बावजूद व्यस्ततम् सड़कों व चैराहों में सफर करने वाली जनता को किसी माननीय का वाहन निकल जाने तक चिलचिलाती धूप या तेज बारिश में इंतजार ही करना पड़े तो फिर इन लाल बत्तियों के उतरने या लगे रहने से आम आदमी को कोई फर्क नही पड़ता और न ही सरकारी तंत्र द्वारा इन माननीयों पर किये जाने वाले खर्च में कोई कमी या बढ़ोत्तरी होती है। इससे तो बेहतर यह था कि पूरे देश में आपसी तालमेल से सरकारी स्तर पर यह सामंजस्य बनाया जाता कि कोई भी जनप्रतिनिधि या नौकरशाह अपने सरकारी आवागमन के लिऐ एक ही वाहन का प्रयोग करें और सरकारी वाहनों का इस्तेमाल निजी अथवा घरेलू कार्यों में न किया जाये। हम देखते है कि कोई भी मंत्री अथवा जनप्रतिनिधि अपने श्रेत्रीय भ्रमण के दौरान वाहनों का लावा-लस्कर साथ लेकर चलने में अपनी शान समझता है तथा नौकरशाहों द्वारा सरकारी वाहनों का उपयोग सरकारी कामकाज से कहीं ज्यादा अपने घरेलू कार्यो जैसे मेम साहब को घुमाने व बच्चों को स्कूल छोड़ने के लिऐ ज्यादा किया जाता है। इन हालातों में न सिर्फ सरकारी सम्पत्ति का दुर्रूपयोग होता है बल्कि सरकार की कार्यक्षमता भी प्रभावित होती है लेकिन शेष समाज से कुछ अलग दिखने की हनक में नेता और नौकरशाह इस तरह की तमाम गतिविधियों को अंजाम देते रहते है। हालातों के मद्देनजर हम यह कह सकते है कि अपनी गाड़ी समेत अपने तमाम मंत्रीमण्डल के वाहनों से लाल बत्तियों को उतारा जाना मोदी सरकार द्वारा चुनावों के दौरान दिये गये सुशासन के नारे का शुरूवाती कदम है और अगर सरकार वाकई में व्यापक जनहित को लेकर प्रतिबद्ध है तो उसे अपने इस कदम को माननीयोें के वाहनों के साथ चलने वाले लावा-लस्कर व वाहनों को काफिले में कमी लाने, नौकरशाही द्वारा अपने घरेलू कार्यो अथवा घर पर सरकारी वाहनों के दुरूपयोग को रोकने तथा वीआईपी सुरक्षा के नाम पर बेमतलब के तामझाम को कम करते हुये जनता के लिऐ परेशानी बढ़ाने वाले कारणों को समाप्त करने की ओर ले जाना चाहिऐं । यह माना कि यह तमाम फैसले इतने आसान नही है लेकिन एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार के मुखिया के लिऐ पूरी इच्छा शक्ति के साथ यह कदम उठाना बहुत ज्यादा कठिन भी नही है और अगर मोदी सरकार अपने शेष बचे कार्यकाल में इस तरह की कार्यवाही को अंजाम नही देती तो यह माना जायेगा कि मोदी की अन्य घोषणाओं की तरह सरकारी वाहनों से लालबत्तियों को उतारा जाना भी एक शगूफा ही था जिसपर ताली बजाना व घंटो तक तारीफ करना मोदी भक्तों व मीडिया के एक हिस्से की मजबूरी है।

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