Saturday, May 27, 2017

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चुनौतियो के बीच

कश्मीर मामले में सेना को देनी होगी खुलकर खेलने की अनुमति
जम्मू-कश्मीर के श्रीनगर लोकसभा क्षेत्र में उपचुनाव के दौरान भीषण हिंसा के बीच हुआ सात फीसदी मतदान इशारा कर रहा है कि आंतक पीड़ित कहे जा सकने वाले इस राज्य में कुछ भी ठीक नही चल रहा है और न ही राज्य में चुनी गयी भाजपा व पीडीपी की संयुक्त गठबंधन सरकार वह कमाल करने में सक्षम नजर आ रही है जिसकी कि उम्मीद थी। हो सकता है कि श्रीनगर में ठीक उपचुनाव के मौके पर सामने आयी हिंसा अलगाववादियों की हताशा व निराशा की प्रतीक हो और सरकार व सेना पर बढ़ते स्थानीय जनता के विश्वास को देखते हुऐ आंतकी संगठन राज्य की जनता के बीच दहशत का राज कायम करना चाहते हो लेकिन यह सच है कि घाटी में इधर पिछले कई दशकों से अलगाववाद की आग धधक रही है और कोई भी सरकार इससे निजात पाने की जगह सत्ता पर अपनी कब्जेदारी बनाये रखने की जुगत में लगी मालुम होती है। जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री सईद के इंतकाल के बाद जब उनकी बेटी महबूबा ने भाजपा के साथ मिलकर जम्मू-कशमीर में गठबंधन सरकार बनाने के लिऐ हामी भरी थी तो यह माना गया था कि इन दो ताकतवर शख्सियतों के एक साथ आ जाने से जम्मू -कश्मीर में हालत बदलेंगे लेकिन बहुत कोशिशों के बाद भी यहां कुछ भी नही बदला और न ही केन्द्र सरकार जम्मू-कश्मीर के मामले में वह सख्त रवैय्या ही अख्तियार कर पायी जिसकी उम्मीद देश के बाकी हिस्से की जनता को थी। यूं तो जम्मू-कश्मीर में आंतक व दहशतगर्दी का दौर काफी पुराना हो गया है और हथियारों के दम पर स्थानीय जनता के बीच डर का सामा्रज्य कायम करने वाले आंतकी संगठन हमेशा इस कोशिश में रहते है कि यहां की जनता किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी न करें लेकिन इधर युवा होते भारत ने स्थानीय सोच को बदला है और भारत के निर्वाचन आयोग व सुरक्षा बलों ने पूरी चुनौती के साथ जम्मू-कश्मीर में चुनाव प्रक्रियाओ केा पूरा करवाया है किन्तु इधर पिछले कुछ महिनों में हालत फिर बदले है और आंतकी कंमाडर बहुरान वानी की मुठभेड़ में हुई मौत के बाद कश्मीर क्षेत्र में बढ़ी अलगाववादी हिंसा व पत्थरबाजी जी घटनाओं ने आम आदमी को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आॅखिर यह सबकुछ ऐसे ही कब तक चलता रहेगा। यह ठीक है कि आंतकियों द्वारा एक सोची समझी रणनीति के तहत स्कूल व काॅलेजों को बंद करवाकर स्थानीय युवाओं व बच्चों का गलत इस्तेमाल किया जा रहा है और इन पिछले दिनों तेजी से बदली आंतक की परिभाषा में गोला व बारूद की जगह पत्थरों ने ले ली है लेकिन मौजूदा हालातों में इस समस्या को बिना समाधान के आधे-अधूरे में नही छोड़ा जा सकता। हमने देखा कि उपचुनाव के दौरान न सिर्फ श्रीनगर लोकसभा क्षेत्र में मतदान बहुत कम हुआ है बल्कि अंनतनाग लोकसभा सीट के लिऐ होने वाला चुनाव भी टाल दिया गया है। लेकिन इस सबके बावजूद जम्मू-कश्मीर के नेता अपने भड़काने वाले बयानो से बाज नही आ रहे और जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती मौजूदा परिस्थितियों से निपटने के मामले में मजबूर नजर आ रही है। क्या यह बेहतर विकल्प नही है कि भारत सरकार इस वक्त सही मौका जानकर सत्ता की कमान पूरी तरह अपने हाथों में ले ले और जम्मू-कश्मीर के जातीय समीकरणों को बदलने वाले पलायन को मुद्दा बनाते हुऐ कश्मीर के शरणार्थी परिवारो को पूरी सुरक्षा के साथ न सिर्फ वहां पुनः बसाने के प्रयास शुरू किये जाये बल्कि हर छोटे-बड़े चुनाव में इन परिवारों की राजनैतिक भागीदारी सुनिश्चित किये जाने के संदर्भ में भी भारत सरकार कदम उठाये । सेना की अपनी कार्यशैली व सहन शक्ति की सीमा है और यह तय है कि अगर बहुत ज्यादा लंबे समय तक सेना के जवानो को बिना हथियार उठाये अलगाववादियों व छोटे-छोटे लालच के चलते उनके समर्थक बने स्थानीय निवासियों के विरूद्ध लड़ने के लिऐ तैनात किया जाता रहा तो सैनिको का मनोबल टूटने लगेगा। इसलिऐं केन्द्र सरकार को चाहिऐं कि वह पंजाब की तर्ज पर सेना को आंतक के खिलाफ पूर्ण युद्ध करने की अनुमति दे और एक बार शान्ति प्रक्रिया या सुलहनामें से हटकर आमने-सामने की जंग होने दी जाय। जम्मू कश्मीर में राजनीति कर रही भाजपा, पीडीपी, कांग्रेस या नैशनल कांगे्रस समेत तमाम राजनैतिक ताकतों को यह समझना होगा कि अगर स्थानीय स्तर पर शान्ति व्यवस्था कायम रही तो भविष्य में चुनाव लड़ने व सरकार बनाने के तमाम मौके हासिल होंगे लेकिन अगर हालात इसी तरह बद से बदतर होते रहे तो समुचे जम्मू-कश्मीर में सेना की छावनी के अलावा और कुछ भी नही बचेगा। इसलिऐं राजनैतिक दलो व नेताओं को चाहिऐ कि अपने क्षणिक राजनैतिक लाभ के लिऐ कश्मीर मामलो में दखल दे रही अलगाववादी ताकतों की चाल व चरित्र को कश्मीरी आवाम के समक्ष बेपर्दा करे और समुचे जम्मू-कश्मीर में ऐसा हालात पैदा करने में मदद करे कि जनता चेंन की सांस ले सकें। हो सकता है कि कुछ अलगाववादी ताकतों को लगता हो कि इस वक्त देश की सत्ता पर काबिज तथाकथित हिन्दूवादी ताकतों का खौफ दिखाकर वह कश्मीरी आवाम को अपने साथ खड़ा करने में कामयाब हो जायेगे और दहशत के बल पर चुनावी बायकाॅट जैसे नारे देकर वह वैश्विक शक्तियों के समक्ष यह तर्क प्रस्तुत करेंगे कि कश्मीर की जनता को भारत के संविधान व संवेधानिक ताकतो पर विश्वास नही है लेकिन इस सम्पूर्ण परिपेक्ष्य में भारत पहले ही जाहिर कर चुका है कि कश्मीर उसका अन्दरूनी मामला है ओर किसी बाहरी मुल्क को इस मामले में हस्तक्षेप की इज़ाजत नही है। इसलिऐं कश्मीर में दो-चार चुनावों का न होना या फिर दहशतगर्दी व गुण्डई के बल पर जनता को मतदान केन्द्रो तक न जाने देने की जिद कोई बहुत बड़ी चिन्ता की बात नही है बशर्ते हमारी सरकारें इन घटनाओं से सबक लेकर दहशतगर्दो की गोली का जवाब गोली से देने की पहल करे और कश्मीर में आंतक का खेल खेलने वाले दहशतगर्दो को जनसामान्य से अलग-थलग किया जाय।

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