Thursday, April 27, 2017

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बदलते वक्त के साथ

समस्याओं के गंभीर समाधान तलाशने की जगह नारेबाजी व शोशेबाजी से जनाधार बचाने की जुगत में है नेता स्थानांतरण को कानून के दायरे में लाने वाला बहुप्रतीक्षारत् विधेयक प्रवर समिति के समक्ष विचारधीन है तथा सरकार के शिक्षा मंत्री ने पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल के अन्तिम दौर में हुऐ ताबड़तोड़ स्थानांतरणों पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुऐ इन्हें निरस्त करने की घोषणा की है जिसके चलते अध्यापकों के एक वर्ग में हड़कम्प की स्थिति है। वहीं दूसरी ओर राज्य के उच्च शिक्षा मंत्री वंदेमातरम् का नारा लगा समस्त समस्याओं से निजात पाना चाहते है या फिर फिर उनका इरादा एक नये विवाद को छेड़ तमाम समस्याओं व सरकार बनते ही सामने आये जनान्दोलनों से जनता व मीडिया का ध्यान हटाने का है। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि उत्तराखंड की नवगठित सरकार ने अपने हनीमून पीरियड से बाहर निकल कामकाज को ठीक तरीके से समझा भी नही है कि पुराने जख्मों ने नासूर की तरह दुखना शुरू कर दिया है और सरकार चलाने के लिऐ जिम्मेदार मंत्री व विधायक इन जख्मों का इलाज ढ़ूढ़ने की जगह ‘टालो और राज करो‘ वाले अंदाज में बयानबाजी का खेल शुरू करने की कोशिशों में जुट गये है। सरकारी स्कूलों में मौजूद अध्यापकों की कमी व अनुपस्थिति के अलावा स्थानीय स्तर पर अन्य कई तरह की समस्याओं से जूझ रही जनता जब अपने नौनिहालों को अच्छी व गुणवत्तापूरक शिक्षा दिलाने के नाम पर निजी स्कूलों को रूख करती है तो वहां भी उसे लूट और ठगी के अलावा कुछ नही मिलता। बिना किसी कारण तेज रफ्तार से बढ़ती स्कूलों की फीस तथा सलाना आधार पर लिये जाने वाले अलग-अलग तरह के खर्चो को झेलता अभिभावक जब स्कूल ड्रेस, किताबें या अन्य जरूरत की सामग्री खरीदने निकलता है तो उसे पता चलता है कि यहां भी उसकी जेब काटने का पूरा इंतजाम है और इन तमाम तरह के अवरोधो को पार करते हुऐ वह जब अपने नौनिहालों को स्कूल भेजता है तो उसे पता चलता है कि स्कूलों की इस शोशा बाजी में पढ़ाई तो कहीं गायब हो चुकी है। लिहाजा एक बार फिर जेब कटाने को तैयार अभिभावक की मजबूरी है कि सन्तति को अच्छी शिक्षा दिलाने के नाम पर वह निजी ट्यूटर या कोचिंग का सहारा ले और मजे की बात यह है कि यह सारा खेल उसी सरकार, नेता या मन्त्रियों की आंख के नीचे खेला जाता है जो स्थानांतरण के नाम पर विधेयक-विधेयक खेल रहे है या फिर वंदेमातरम् का जयघोष ही जिनके लिऐ शिक्षा की गारंटी हैं। यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि शिक्षा पर लगातार बढ़ रहे खर्च के बावजूद सरकारी व निजी क्षेत्र के विद्यालयों की शिक्षा का स्तर लगातार घट रहा है और शिक्षा के मन्दिरों से दाल-भात वितरण के केन्द्रो में तब्दील हो चुके सरकारी क्षेत्र के विद्यालयों में तो हालात इतने बुरे है कि गरीब से गरीब मां-बाप इन स्कूलों में अपने नौनिहालो को भेजकर तैयार नही है। सरकार सब कुछ जानती है और अगर सरकारी तंत्र चाहे तो इस तरह की अव्यवस्था में सुधार भी लाया जा सकता है लेकिन सवाल यह है कि सरकार इस तरह की कोई भी कोशिश भी किस आधार पर करें क्योंकि जनता की ओर से ऐसी कोई सामूहिक मांग ही नहीं है और जब दो-चार सालों में ऐसी कोई समस्या सामने आती है तो स्थानीय अध्यापक, क्षेत्रीय नेता व सरकारी रहमोकरम् पर पलने वाले नौकरशाह मिल बांटकर इसे निपटा लेते है। हां इधर पिछले कुछ वर्षों में निजी स्कूलों व संस्थाओं द्वारा चलाये जाने वाले शिक्षण संस्थानों के खिलाफ आवाज उठनी शुरू हो गयी है लेकिन इन निजी शिक्षण संस्थानों या स्कूलों का लूट का धंधा इतना बढ़ा है कि व्यापक जनहित के लिऐ जिम्मेदार सरकारी व्यवस्था इनपर हाथ डालने में ही कतराती है तथा इसका दूसरा बढ़ा कारण शायद यह भी है कि हर फायदें के धंधे की तरह शिक्षा बिक्री के इन केन्द्रो में भी हमारे नेताओं व नौकरशाहों की घोषित-अघोषित पत्ती है जिसके कारण सरकारी तंत्र की कोई भी ढ़ेढ़ी नजर शिक्षा के व्यापार के नाम पर लूट का खुला खेल खेलने वाले इन नवधानढ़यों का कुछ नही बिगाड़ पाती। कहने में कुछ अजीब सा लगने वाला यह कटु सत्य धीरे-धीरे कर जनता के सामने आने लगा है कि शिक्षा को गैर जरूरी मानने वाली हमारे देश व राज्यों की सरकारें बजट दर बजट न सिर्फ इस क्षेत्र में अपना खर्च घटा रही है बल्कि प्राथमिक व माध्यमिक स्तर की शिक्षा व्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा निजी हाथों में सौंप देने के बाद डीम्ड यूनिवर्सिटी को धड़ल्ले से मान्यता देकर व मेडिकल या इंजीनियरिंग के अलावा अन्य तमाम तरह की तकनीकी शिक्षा के लिऐ निजी विश्वविद्यालयों व कालेजों पर भरोसा कर सरकारें अपनी जिम्मेदारी से पीछे भाग रही है। नतीजतन वर्तमान हालातों में सरकारी क्षेत्र के प्राथमिक विद्यालयों व माध्यमिक स्कूलों का हाल तो बुरा है ही साथ ही साथ अपने नौनिहालों को बेहतर शिक्षा उपलब्ध कराने वाला अभिभावक निजी क्षेत्र द्वारा भी जमकर लूटे जाने के बावजूद अपनी अगली पीढ़ी को लेकर अश्वस्त नही है। यह ठीक है कि रोजगार की मांग को लेकर युवा वर्ग सड़कों पर आंदोलन नही कर रहा और न ही सरकारी तंत्र के खिलाफ दिखने वाले यह तमाम मुद्दे अभी चुनावी चर्चा का विषय बन पाये है लेकिन यह कहने में कोई हर्ज नही है कि धीरे-धीरे कर शिक्षा का महत्व समझ रहा अभिभावक अपने नौनिहालों के भविष्य को लेकर बैंचेन दिखाई दे रहा है। हो सकता है कि स्थितियां कुछ और वर्षो तक ऐसे ही खिंच जाये और अपनी-अपनी हैसियत व अपनी-अपनी पहचान के हिसाब से विभिन्न स्तरों के निजी स्कूलों की ओर रूख कर रहे अभिभावक ‘लूटा जाना‘ ही अपने प्रालब्ध में लिखा समझकर इन निजी स्कूलों की तमाम मांगे पूरी करते रहे लेकिन शिक्षा के साथ ही साथ अनुशासन, चारित्रिक निर्माण और सामाजिक ताने-बाने के संदर्भ में इन स्कूलों के विचार तथा शिक्षा की गुणवत्ता व शैक्षिक योग्यता के क्रम में रोजगार उपलब्ध कराने की बाध्यता के स्थान पर ‘वंदेमातरम्‘ जैसे नारे लगा मतदाताओं को भ्रमित करने को प्रयासरत् हमारे नीतिनिर्धारक आने वाली पीढ़ी को किस तरह का सुकुन दे पायेंगे, कहा नही जा सकता।

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