पूत के पांव, पालने में | Jokhim News

Friday, July 21, 2017

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पूत के पांव, पालने में

किसानों की ऋण माफी का फैसला ले योगी ने जीता देश की जनता का दिल
किसानों के लिऐ ऋण माफी को ऐलान कर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने वाकई एक सहासिक कदम उठाया है और अपने इस कदम से उन्होंने न सिर्फ उ.प्र. की जनता की विश्वसनीयता हासिल की है बल्कि अन्य राज्यों की जनता को भी चुनावी घोषणाओं से हटकर किसानों की सुरक्षा की मांग करने के लिऐ उकसाया है। योगी आदित्यनाथ ने अपने इस फैसले के माध्यम से स्थानीय जनता व राजनीति के खिलाड़ियों को यह संदेश देेने की कोशिश भी की है कि उन्हें धार्मिक भावनाऐं भड़काकर सत्ता हासिल करने वाला एक सामान्य संत मात्र न माना जाय बल्कि उनकी समझ-बूझ व किसानों के चयन को लेकर बनायी गयी नियमावली को देखकर यह लगता है कि वह वाकई में जरूरतमंद व पात्र व्यक्ति की तलाश करना चाहते है। किसानों को लेकर राजनैतिक घोषणाऐं तो होती रहती है और सरकारी तंत्र भी डीजल सब्सिडी, खाद सब्सिडी या फिर बिजली के बकाया में छूट जैसी घोषणाओं के माध्यम से किसानों को राहत देने की कोशिश करता रहता है लेकिन फसली ऋण की माफी छोटे व मझौले किसानों के लिऐ वाकई एक राहत भरा कदम हो सकती है और सरकार के इस फैसले के बाद अफसरशाही में भी सरकार द्वारा दी गयी इस छूट में अपना हिस्सा तय करने के लिऐ हड़कम्प मचने जैसी कोई स्थिति संभावित नही है। हो सकता है कि कुछ लोग के इस फैसले से सहमत न हो और एंटी रोमियों स्क्वाएड का गठन या फिर सरकारी आवास में कन्यापूजन जैसे कार्यक्रमों का संचालन उन्हें एक दकियानूसी तरीका लगता हो लेकिन यह सच है कि योगी आत्यिनाथ ने अपने इस छोटे कार्यकाल में अपने सादे जीवन व विद्धतापूर्ण तौर-तरीकों से आम आदमी को अपनी ओर आकृर्षित किया है और यह आश्चर्यजनक है कि उनके मुख्यमंत्री पद की कुर्सी संभालने के बाद अपराधों व पुलिसिया गुण्डई की वारदातों में भारी कमी आने की सम्भावनाऐं जनता के बीच से व्यक्त की जा रही है। उ.प्र. एक बड़े भौगोलिक क्षेत्रफल वाला तथा स्वंय में विविधताऐं समेटें अनेक जातियों, धर्मो व विचारधाराओं वाला देश है और इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि पिछले तीन दशकों में उ.प्र. को कोई भी ऐसी सरकार या शासक नही मिला है जो प्रदेश की तमाम जनता को एक नजरिये से देखते हुऐ राज्य को विकास के पथ पर ले जा सके। जोगी के इस नये रूप ने एक उम्मीद बांधी है और ऐसा मालूम देता है कि योगी आदित्यनाथ सचमुच ही एक निष्कामी संत की तरह भारतीय परम्पराओं का अनुपालन करते हुऐ अपने राज्य की सीमा में रहने वाले अन्तिम व्यक्ति के कल्याण की भावना से काम करना चाहते है। यही वजह है कि उन्होंने अपना पहला बड़ा फैसला लेने के लिऐ किसानों का चुनाव किया है। वैसे भी किसान अन्नदाता है और भारत जैसे कृषि प्रधान देश का दुर्भाग्य है कि यहां की सरकारें इस वर्ग के हितों को लेकर सबसे ज्यादा उदासीन है। शायद यहीं वजह है कि किसानांे के कृषि उत्पादों को जन सामान्य तक पहुंचाने वाला बिचैलिया तो मालामाल है और उसकी जमीनांे को ओने-पोने दाम में खरीदने वाला बिल्डर भी रातोंरात अरबपति हो जाता है लेकिन किसान की हालत जीवन पर्यन्त जस की तस बनी रहती है। आज देश भर के किसानो पर बारह लाख साठ हजार करोड़ का कर्ज है और इस कर्ज को माफ करने के लिऐ राज्य सरकारों के पास पैसा नही है लेकिन इसके ठीक विपरीत उद्योगपतियांे को टैक्स माफी व अन्य रियायतें देने में यह राज्य सरकारें पीछे नही रहना चाहती और यह मोटा अनुमान है कि अगर सरकार तीन वर्षों तक उद्योगों को दी जाने वाली तमाम छूटो पर पांबदी लगा दें तो उस पैसे से किसानो का तमाम खर्च चुकाया जा सकता है, मगर किसानों का कर्ज या किसान सरकार की प्राथमिकता नही है क्योंकि सरकारी तंत्र का मानना है कि किसानों की बदहाली या खुशहाली सकल राष्ट्रीय उत्पाद दर को प्रभावित नही करती। शायद यहीं वजह है कि उद्योगों को टैक्स व अन्य मामलों में रियायतें देने के लिऐ न सिर्फ सरकारें उत्साहित रहती है बल्कि बैंक भी अपनी ऋण वसूली के लिऐ उद्योगों व उद्योगपतियों के मामले में खामोशी ओड़े रहते है जबकि किसानो की बात आने पर राज्यों के मुख्यमंत्री केन्द्र सरकार से बात कर इस विषय में उपाय खोजने की बात कहते है और केन्द्र सरकार किसानों के ऋण को राज्यों का मुद्दा बताते हुऐ अपना पल्ला झाड़ लेती है। नतीजतन किसानों द्वारा सामूहिक आत्महत्या किये जाने या फिर सूदखोरों, सहकारी समितियों व बैंको के कर्ज में फंसकर अपनी जमीनें ओने-पौने दामों में बेच देने की खबरे आम है। मौसम खराब होने या अन्य तमाम कारणों से फसले बर्बाद हो जाने के कारण किसान के पास डिफाॅल्टर होने के अलावा कोई चारा नही होता और इसे किसान का दुर्भाग्य ही कह सकते है कि फसल खराब होने के अलावा ज्यादा अच्छी फसल होने पर भी उसे इसकी पूरी कीमत नही मिलती क्योंकि सरकारी उदासीनता के कारण उपभोक्ता व किसान के बीच बिचैलियों की भूमिका निभाने वाले व्यापारी इन स्थितियों में मंदी को भय दिखाकर उसकी कमाई ले उड़ते है। खाद्य उत्पादों के नाम पर वायदा कारोबार को अनुमति देकर सरकारी तंत्र ने किसानों की रही सही उम्मीदें भी छीन ली है और अब विभिन्न बहुराष्ट्रीय कम्पनियां किसानों की जमीनों को किराये पर लेने की ताक लगाये बैठी है सरकारी मेहरबानी से किसानों की जमीनें पूंजीपतियों व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को खेती के लिये दिये जाने की योजना को जिसदिन भी पूरी तरह अमल में ले आया गया, उस दिन बेचारा किसान कहीं का नही रहेगा लेकिन सरकार व सरकार चलाने वाले नौकरशाहों को इन बातों से कोई भी लेना देना नही है वह तो इस जुगत में है कि कर्ज से लदे किसानों को एक बार कुछ पैसा उनकी जमीन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को लीज पर देने के नाम पर दिला दिया जाय तो अधिकांश किसान अपना कर्ज चुकता कर देंगे और इसके बाद किसान की स्थिति अपने ही खेल में बन्धुआ मजदूर की सी होगी जबकि किसान की जमीन को खेती के नाम पर लीज के लिऐ लेने वाले पूंजीपति या बहुराष्ट्रीय कम्पनियां इन जमीनों पर जमकर रासायनिक खादों व बीजों का इस्तेमाल कर भरपूर फसल लेने के बाद कुछ ही अर्से में इन्हें बंजर करके छोड़ देंगी। इस हालत में खद्यान्न मामले में आत्मनिर्भर होने का दंभ भरने वाली देश की सरकारें क्या कदम उठायेंगी तथा औद्योगिक क्रान्ति व उद्योगों की उत्पादन क्षमता पर इतराने वाले सरकारी महकमों को इस देश की जनता की रोजी रोटी के इंतजामात के लिऐ किस तरह की व्यवस्थाऐं करनी होगी, यह कुछ ऐसे सवाल है जिनके जवाब हमारे नेताआंे को आज नही तो कल देने ही होगें और यह एक अच्छा मौका है कि उत्तर प्रदेश के नवनियुक्त मुख्यमंत्री ने किसानों की इन तमाम समस्याओं को समझते हुऐ उन्हें एक राहत देने की कोशिश की है। हम उम्मीद करते है कि देश के अन्य हिस्सों में भी सरकारें योगी के इस फैसले से सबक लेंगी और किसानों पर राजनैतिक नजरें इनायत की बारिश होगी।

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