पर्दे के पीछे से | Jokhim News

Wednesday, June 28, 2017

Select your Top Menu from wp menus

पर्दे के पीछे से

खनन व शराब बिक्री के मामले में न्यायालयी हस्तक्षेप से परेशान है नवगठित सरकार
खनन और शराब के मामले में न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद आये भूकम्प से उत्तराखंड की नवगठित त्रिवेन्द्र सिंह रावत के नेतृत्व वाली सरकार हैरान व परेशान है तथा पूर्ववर्ती हरीश रावत सरकार पर खनन व शराब माफिया को संरक्षण देने का आरोंप लगाये जाने वाले भाजपा के नेता अब राजस्व वसूली व सरकार की आय में कमी जैसे जुमलों का इस्तेमाल कर इन दोनों ही मामलों में न्यायालय से विशेष रियायत चाहते है लेकिन सवाल यह है कि क्या चंद लोगों की सुविधाओं व वेतन भत्तों के लिऐ किसी प्रदेश विशेष की सरकार अथवा क्षेत्र विशेष को न्यायालय से विशेष छूट दी जानी चाहिऐं, वह भी तब जबकि मामला व्यापक जनहित से जुड़ा हो। अगर बात शराब से शुरू करें तो यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि पूर्ववर्ती सरकारों ने शराब के कारोबारियों को लाभ पहंुचानें के लिऐ सुदूरवर्ती पर्वतीय क्षेत्रों तक सरकारी नियन्त्रण वाली शराब की दुकानें खोल दी है और पर्यटन व्यवसाय व राजस्व बढ़ाने के नाम पर तमाम राजनैतिक दल व सरकारी पदो पर पदासीन जिम्मेदार लोग शराब विक्रेताओं के प्रतिनिधि की तरह काम करते हुऐ शराब कारोबारियों को लाभ पहुंचाने के लिऐ काम कर रहे है जबकि पहाड़ों में पलायन व सरकारी धन के आंबटन के बावजूद विकासकारी योजनाओं के जमीन पर न उतर पाने के लिऐ शराब के लगातार बढ़ रहे सेवन व प्रचलन को ही जिम्मेदार मानने वाले लोग, इसके विरोध में समय-समय पर आंदोलन करते रहते है और वर्तमान में भी उत्तराखंड के एक बड़े आबादी क्षेत्र में शराब के विरोध को लेकर आन्दोलन की सुगबुगाहट होने लगी है। हांलाकि मौजूदा दौर में किसी सरकार अथवा न्यायालय ने पहाड़ पर शराब की बिक्री को प्रतिबन्धित नही किया है और न ही नवनिर्वाचित सरकार से यह उम्मीद की जा रही है कि वह उत्तराखंड में पूर्ण शराबबंदी लागू कर देगी लेकिन राष्ट्रीय राजमार्गो पर स्थित शराब की दुकानों और बाॅर को मुख्य सड़क से कम से कम 250 मी. हटाये जाने के उच्चतम् न्यायालय के आदेश ने शराबबंदी की चाह रखने वाली जनता की इच्छा को भड़काया है और अब लगभग समुचे उत्तराखंड में नये स्थानों पर शराब की दुकानें न खुलने देने को लेकर आंदोलन जोरों पर है। इस तरह के तमाम आन्दोलनों का नेतृत्व अधिकांशतः स्थानीय महिलाओं के हाथो में है जबकि स्थानीय नेता व तथाकथित जनप्रतिनिधि इन आन्दोलनों से एक आश्चर्यजनक दूरी बनाये हुऐ है और सरकारी तंत्र येन-केन प्रकारेण इन दुकानों का नये स्थानों पर खुलना सुनिश्चित करना चाहता हैै। हालातों के मद्देनजर आन्दोलन और सरकारी व्यवस्था का विरोध तय है तथा एक नवगठित सरकार के लिऐ यह स्थिति किसी भी तरह से सुखद नही कहीं जा सकती लेकिन सरकार जनपक्ष को लेकर चिन्तित नजर आने की जगह इस समस्या का कानूनी समाधान ढ़ूढ़ रही है और न्यायालय को यह समझानें की कोशिश की जा रही है कि न्यायालय की रोक के बाद सरकार को न सिर्फ जनकल्याणकारी कार्याे के लिऐ धन जुटाने में परेशानी होगी बल्कि इस रोक का सीधा असर पर्यटन व्यवसाय पर भी पड़ने की संभावना है। उपरोक्त परिपेक्ष्य में शराब विरोधी आन्दोलनकारियों का मानना है कि न्यायालय के इस आदेश के बाद अगर कुछ दुकानों पर शराब बिक्री बंद हो जाती है तो उससे सरकारी राजस्व वसूली में होने वाली कमी उस बचत के समक्ष नगण्य है जो कि स्थानीय जनता को शराब की खरीद न करने पर होगी और रहा सवाल पर्यटन व्यवसाय का तो उत्तराखंड की ओर पर्यटन की दृष्टि से रूख करने वाले अधिकांशतः पर्यटक धार्मिक मान्यताओं के चलते यहां आने पर वैसे ही शराब के सेवन से दूर रहना पंसद करते है। इसलिऐं न्यायालय के आदेशों के बाद उत्तराखंड में होती दिख रही इस अघोषित शराबंदी का पर्यटन व्यवसाय पर असर पड़ना नामुकिन है और सरकार को भी चाहिऐ कि वह इस तरह के कानूनी नुक्ते ढ़ूढ़ने की जगह बाजरिया न्यायालय मिले व्यापक जनहित के इस मौके का सही इस्तेमाल कर उत्तराखंड को अगले पांच वर्षो में पूर्ण शराबबंदी की ओर ले जाने का प्रयास करें लेकिन राजनेताओं के दिशानिर्देश पर चलने वाले सरकारी तंत्र में यह सबकुछ इतनी आसानी से संभव हो पायेगा, यह संभव नही लगता और न ही इस तथ्य पर विश्वास किया जा सकता है कि सरकार शराब विरोधी आन्दोलनकारियों के दर्द से पसीजकर कोई जनहितकारी निर्णय लेगी। उत्तराखंड के परिपेक्ष्य में यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि शराब व्यवसाय में ठीक ठाक दखल रखने वाली लाॅबी को यहा न सिर्फ राजनेताओं का संरक्षण प्राप्त है बल्की अधिकांश मामलों में यह नेता लोग शराब कारोबारियों के व्यवसायिक साझीदार भी है। इसलिऐं कुछ छुटपुट आन्दोलनों या फिर अलग-अलग स्तर पर चलाये जाने वाली मुहिमों की बदौलत यह उम्मीद करना बेकार है कि हालातों में कुछ बदलाव आयेगा। अब अगर खनन की बात करें तो राजस्व वसूली के मामले में शराब के बाद दूसरे नंबर में आने वाले खनन व्यवसाय पर भी न्यायालय की पाबंदी ने सरकारी तंत्र को हिलाकर रख दिया है और राजनीति के गलियारों में यह चर्चा जोरो से है कि इस बार न्यायालय के आदेश से ही सही लेकिन ऐसा मौका जरूर आया है जब सरकार बनाने व चुनाव लड़ने में नेताओं को आर्थिक सहयोग करने वाले लोग सरकार गठन हो जाने के बावजूद बेकार और नकारा बैठे है। यह माना कि उत्तराखंड में नदी-नालों पर खनन करने से पाबंदी लगाये जाने के कारण एक साथ ही कई हजार लोग बेरोजगार हो गये है और खनन पर लगी इस कानूनी पांबदी का सीधा असर सरकारी व निजी निर्माण कार्याे पर भी पड़ना तय है लेकिन तेजी से बदल रहे मौसम व पारिस्थिकी चक्र में आ रहे बदलाव में उत्तराखंड के वन क्षेत्रों की भूमिका को देखते हुऐ इसे एक बड़ा नुकसान नही माना जा सकता और उत्तराखंड के परिपेक्ष्य में न्यायालयों, पर्यावरण विशेषज्ञों व विकास का नारा लगा पहाड़ों पर कंकरीट के जंगल खड़े कर रही सरकारी व्यवस्था ने एकमत होकर इस निष्कर्ष पर पहुंचना चाहिऐं कि इस राज्य की भौगोलिक परिस्थितियों के मद्देनजर यहां विकास के पैमाने को किस प्रकार से पुर्ननिर्धारित किया जाना चाहिऐं। यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि गाड़-गदेरों व नदियों के जल में सतत् प्रवाह बनाये रखने व भू-कटान रोकने के लिऐ एक सीमा तक नदी क्षेत्रों में चुगान किया जाना आवश्यक है लेकिन निर्माण कार्याें में बढ़ रही जरूरतों व मानवीय लालच के चलते यह चुगान न जाने कब खनन में तब्दील हो गया है और कुछ लालची किस्म के ठेकेदारों ने नदी क्षेत्रो ही नही बल्कि आस-पास के खेत-खलियानों व बंजर जमीन में भी गहरें-गहरें गढ़ढे खोदकर तबाही मचा दी है। इस हालत में खनन की इस प्रक्रिया को यूं ही चलने दिया नही जा सकता और न्यायालय ने अपना कार्य करतें हुऐ इस सम्पूर्ण प्रक्रिया पर ही रोक लगा दी है। लिहाजा सरकार को चाहिऐं कि न्यायालय को अपना काम करने दे लेकिन सरकारी तंत्र भी लूट के इस खेल में अपनी हिस्सेदारी चाहता है। इसलिऐं खनन पर लगी रोक के खिलाफ उच्चतम् न्यायालय जाने के लिऐ सरकारी मशीनरी अपने पक्ष को मजबूती तौल रही है।

About The Author

Related posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *