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Thursday, October 19, 2017

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प्रकृति को बचाने के लिऐ

सजग न्यायालय ने दिये नदी, नालो, झरनो, गलेश्यिरों, बुग्यालों व जंगलों को मानवोचित अधिकार
नदी, नालों, झरनों,ग्लेश्यिरों, जंगलों व बुग्यालों को जीवित व्यक्ति का दर्जा देते हुये उत्तराखंड के उच्च न्यायालय ने पर्यावरणीय दृष्टि से एक नयी पहल की है। और यह तय है कि अगर न्यायालय द्वारा की गयी इस पहल पर गंभीरता से अमल किया गया तो हम लगातार बिगड़ रहे पर्यावरणीय हालातों पर काबू पा सकते है लेकिन सवाल यह है कि क्या राज्य की सरकारें व इन सरकारों पर काबिज राजनेता व नौकर शाह इतनी आसानी से न्यायालय के निर्णय को लागू होने देंगे और राजसत्ता पर हावी नौकरशाही अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिऐ उच्च न्यायालय के इस निर्णय के खिलाफ अपील नही करेगी।खनन के मुद्दे पर सरकार की ओर से आये बयान और इससे पूर्व जंगलो में लगभग प्रतिवर्ष लगने वाली आग की जिम्मेदारी वरीष्ठ अधिकारियों पर सुनिश्चित करने के उच्च न्यायालय के फैसले के विरोध में उच्चतम् न्यायालय में अपील कर चुकी सरकारी मशीनरी के हावभाव देखकर तो ऐसा नही लगता कि वह इतनी आसानी से व बिना किसी ना-नुकर के इस महती जिम्मेदारी को अपने सर ले लेगी लेकिन अगर ऐसा हो भी जाता है तो इस बात की क्या गांरटी है कि हमारी नौकरशाही प्रकृति की इन अनुपम धरोहरो की जिम्मेदार अभिभावक सिद्ध होगी और किसी भी प्राकृतिक नुकसान या लूट-खसोट स्थिति में होने वाली क्षति के खिलाफ होने वाली कार्यवाही सिर्फ गरीब मार ही साबित नही होगी। इतिहास गवाह है कि अंगे्रजों की नकल या तर्ज पर बनाये जाने वाले कानूनों में अपना फायदा ढ़ू़ढ़ना यहां के नेताओं, नोकरशाहों व धंधेबाजों को अच्छी तरह आता है और व्यापक जनहित के नाम पर घुमा-फिरा कर लिये जाने वाले फैसले इस देश की प्राकृतिक संपदा को कुछ हाथों में सीमित कर देने के पक्षधर दिखायी देते है। हमें न्यायालय के पक्ष या फैसले से एतराज नही है और न ही हम प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन के पक्षधर है लेकिन न्यायालय ने अपने निर्णय में यह बताना चाहिऐ कि मानवीय सभ्यता को बचाने के लिऐ प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण जरूरी तो है परन्तु मानव मात्र के जीवन की कीमत पर प्रकृति को संरक्षित किया जाना न्यायोचित नही। जंगली पशुओं की सुरक्षा को लेकर हमने कई कठोर कानून बनाये लेकिन मैदानी व साधनसम्पन्न क्षेत्रों में हम वनों को सिकुड़ने से नही रोक पाये जबकि उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में इन तमाम जंगली जानवरों ने अपनी बढ़ती तादाद के साथ कृषियोग्य भूमि पर भी कब्जा कर लिया और जानवर व इंसान के बीच भिडं़त में एक का घायल होना या मारा जाना सामान्य सी बात हो गयी। जंगली जानवरो के बढ़ते हमले व पहाड़ी जिलों में जंगली जानवरों की बढ़ती जनसंख्या के चलते पहाड़ी खेती का चैपट हो जाना उत्तराखंड की चितपरिचित समस्या पलायन का एक बड़ा कारण है और यह सत्य भी किसी से छुपा नही है कि उत्तराखंड जैसे प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर क्षेत्र में इन तमाम प्राकृतिक संसाधनों की देखरेख व सौदर्यीकरण को लेकर सरकारी महकमों का दखल पिछले कुछ दशकों में जितना ज्यादा बढ़ा है, आम आदमी की समस्याओं व संसाधनों की लूट को लेकर अफरातफरी भी उतनी ही ज्यादा बढ़ी है। इन हालातों में सरकारी तानाशाहों (मुखियाओं ) को अभिभावक घोषित करने के बाद उपरोक्त नदी, नालो, झरनों, ग्लैशियरों या फिर वनों व बुग्यालों की स्थिति में कितना सुधार आयेगा, यह तथ्य किसी से छुपा नही है लेकिन हम सबकुछ जानने और समझनें के बाद भी इस संदर्भ में न्यायालय के प्रयासों की सराहना करते है और पहाड़ के डानो-कानो में पूजे जाने वाले तमाम स्थानीय देवताओं से प्रार्थना करते है कि वह हमारे नेताओं व नौकरशाहों को सद्बुद्धि प्रदान करें तथा सम्पूर्ण मानवता के लिऐ एक गंभीर समस्या बन चुके ग्लोबल वार्मिग व प्राकृतिक प्रकोप वाली घटनाओं को रोकने में समर्थ पर्यावरण संरक्षण की दिशा में गंभीर कदम उठाये जायें। हो सकता है कि न्यायालय के इस फैसले के बाद सरकारी महकमों में कुछ गहमागहमी हो और सत्ता के उच्च सदनों में बैठे लोग न्यायालय का मतव्य समझतें हुऐ इस संदर्भ मेें गंभीर फैसले लेने का प्रयास करेे लेकिन इधर पिछले कुछ दिनों में खनन, नैशनल हाईवे पर शराब बिक्री पर रोक जैसे तमाम मुद्दों पर न्यायालय के फैसले के खिलाफ अपील करती दिख रही सरकारी मशीनरी के अंदाज को देखते हुऐ नही लगता कि सरकार इस फैसले के पीछे छिपे न्यायालय के आशय को समझेंगी और न्यायालय द्वारा व्यक्त की गयी चिन्ताओं को चुनौती की तरह लिया जायेगा। वैसे अगर सरकार चाहे तो उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में नदी, नालों, झरनों, ग्लेशियरों, जंगलों व बुग्यालों का संरक्षण कठिन काम नही है और न ही अभी हालात इतने बुरे हुऐ है कि इस संदर्भ में कुछ किया ही ना जा सके लेकिन सरकारी मंत्रालयों व सरकारी बाबुओं की ऐशगाह माने जाने वाले सचिवालय में बनने वाली योजनाओं व इन योजनाओं में होने वाले सरकारी खर्च मात्र से उत्तराखंड के प्राकृति संसाधनों को संरक्षण दिया जाना संभव नही है और न ही न्यायालय द्वारा किसी जिम्मेदारी को थोप दिये जाने के मात्र से इन तमाम प्राकृतिक संसाधनो को मानवोचित अधिकार दिया जाना संभव है। अगर सरकार व सरकार को इस संदर्भ में निर्देशित करने वाला न्यायालय इस महती जिम्मेदारी को एक विराट यज्ञ की तरह लेते हुऐ इसकी सफलता सुनिश्चित करना चाहता है तो उसे इसमें जन सामान्य की भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी और इस भागीदारी के लिऐ उसे सरकारी नियम व कायदों में बड़ा बदलाव कर दशकों पुरानी व्यवस्था में लौटते हुऐ इस सारी देखरेख व सुरक्षा का जिम्मा वन पंचायतों व स्थानीय देवी-देवताओं के माध्यम से जनसामान्य को देना होगा। हमारी संस्कृति में जल, वन, वायु, पर्वत,पशु-पक्षी आदि समस्त प्राकृतिक संसाधनों को देवी-देवता का दर्जा दिया गया है तथा विभिन्न प्राकृतिक संसाधनो व प्रकृति में वास करने वाले असंख्य देवी-देवताओं को प्रसन्न करते हुऐ हम सदियों से प्रकृति के विभिन्न उपहारों व अपनी जरूरत भर की प्राकृतिक उपजों को लेते रहे है लेकिन इधर इन तमाम संसाधनों की देखरेख को लेकर सरकारी हस्तक्षेप तेजी से बढ़ने के बाद हालातों में भी बदलाव आया है और हमारी सरकारों एव सरकार चलाने वाले नौकरशाहों, नेताओं व माफियाओं के लगातार बढ़ते जा रहे लालच ने हमें आज इन हालातो में पहुँचा दिया है कि पर्यावरणविदो की चिन्ता पर न्यायालय ने अपना काम छोड़कर सरकारी कामकाज में दखल करते हुऐ उसे दिशानिर्देश देने को मजबूर होना पड़ा है। सवाल यह है कि क्या यह न्यायालयी निर्देश सम्पूर्ण मानवता पर आती दिख रही एक बड़ी आफत को कुछ समय के लिये रोक पायेंगे या नही, कानून व्यवस्था पर भरोसा करते हुऐ इस फैसले को लेने का हक उत्तराखंड की नवनिर्वाचित सरकार को देकर दूर से माहौल देखने के अलावा हमारे पास कोई रास्ता भी नही है।

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