Saturday, May 27, 2017

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खनन के खेल में

हाईकोर्ट की रोक के बाद स्टोन क्रेशर स्वामियो की चांदी और ज्यादा तेजी से बढ़ेगी महंगाई खनन पर लगी कानूनी रोक उत्तराखंड की नवनिर्वाचित सरकार के लिऐ खतरें की घंटी की तरह है क्योंकि इससे न सिर्फ सरकारी राजस्व में भारी कमी आने की संभावना है बल्कि खनन उत्पादों की बाजार में अनउपलब्धता के चलते सरकारी निर्माण कार्यों के बंद होने या फिर लागत बढ़ने की भी पूरी संभावना है। हांलाकि सरकार उच्च न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ शीर्ष न्यायालय की ओर रूख करने का मन बना रही है और नदियों के सतत् प्रवाह वाले कुछ क्षेत्रों में बरसात के पहले इस तरह के चुगान को आवश्यक मानते हुऐ उच्चतम् न्यायालय द्वारा इस संदर्भ में लगायी गयी रोक को खारिज भी किया जा सकता है लेकिन इस सारी जद्दोजहद में ठीक-ठाक समय लगने की संभावनाएं है और शायद यही वजह है कि खनन कार्याे में संलग्न मजदूर इस वक्त तेजी के साथ अपना कार्यक्षेत्र छोड़कर गेहूं की कटाई वाले क्षेत्रों की ओर रूख करने लगे है। हालातों के मद्देनजर अगर सरकार को उच्चतम् न्यायालय से कोई राहत मिलती भी है तो एक बार खनन के कारोबार का यह सिलसिला टूटने के बाद इतनी जल्दी जुड़ना आसान नही होगा क्योंकि रोज कमाकर खाने वाले श्रमिक वर्ग को पता है कि बरसात के मौसम में खनन कार्याे में आवश्यक रूप से लगने वाले प्रतिबंध के चलते कुछ दिनों की मजदूरी के लिऐ उत्तराखंड के खनन क्षेत्र में वापसी करना नुकसान का सौदा है। लिहाजा यह तय है की राज्य में बनने वाली पूर्ण बहुमत की भाजपा सरकार की जनता को पहली सौगात के रूप में मिली खनन पर पाबंदी से जहां मजदूर व रोजकमाकर खाने वाले तबके पर बड़ा असर पड़ेगा वही दूसरी ओर स्वरोजगार के रूप में खनन के छोटे-छोटे पट्टे लेकर या फिर नदी क्षेत्र में काम करने वाले खनन के कारोबारी (जिसमें अधिकांशतः युवा वर्ग शामिल है) बेरोजगार हो जायेंगे और इस बार यह बेरोजगारी लगभग छह-सात महिनों की होगी। इसके ठीक विपरीत इन छः सात महीनो तक खनन पर लगी इस रोक का सीधा फायदा उस पूंजीपति वर्ग को मिलेगा जो कि स्टोन क्रशर्स के व्यवसाय में है और जिसने आगामी बरसातों को ध्यान मे रखते हुऐ समय से अपना स्टाॅक जमा करके रख लिया है। यह ठीक है कि सरकार इस फैसले के लिऐ सीधे तौर पर जिम्मेदार नही है और एकाएक ही लगी इस पाबंदी के मद्देनजर उसे दोहरी मार झेलनी होगी क्योंकि जहां एक ओर खनन कारोबार की बंदी के चलते आयी राजस्व वसूली में कमी उसे हाल ही में सदन के सम्मुख प्रस्तुत किये गये लेखानुदान में फेरबदल के लिऐ मजबूर कर सकती है वही दूसरी ओर एकाएक ही लगी इस पाबंदी से बड़ी बेरोजगारी सरकार के लिऐ कई तरह की समस्या खड़ी कर सकती है लेकिन सरकार मजबूर है और न्यायालय के फैसले के सामने उसके हाथ बंधे हुऐ है। अगर किसी तरह जोड़-जुगाड़ के माध्यम से सरकार उच्चतम् न्यायालय का दरवाजा खटखटाकर इस मुददे पर कुछ राहत हासिल कर भी लेती है तो श्रमिक वर्ग की अनउपलब्धता या कमी को देखते हुऐ कहा जाना मुश्किल है कि सरकार राजस्व वसूली के अपने लक्ष्य को हासिल कर लेगी या फिर खनन व चुगान कार्याे में लगे व्यवसायी इस अवधि में ठप हो चुके अपने व्यवसाय का जम-जमाव इतनी आसानी से व जल्दी कर पायेंगे। खैर न्यायालय के फैसले को पलटा तो नही जा सकता और न ही सरकार से यह उम्मीद की जा सकती है कि वह इस फैसले की खिलाफत करते हुऐ खनन कार्याे को सुचारू रखने की कोशिश करें लेकिन अगर सरकार चाहे तो इस अवधि का बेहतर इस्तेमाल करते हुऐ नदियों में खनन व चुगान तथा खनन पट्टों के नवीनीकरण आदि को लेकर अपने तमाम फैसलों की समीक्षा कर एक व्यापक खनन नीति बना सकती है ओर इस दौरान नदी-नालों में होने वाले अवैध खनन व खनन माफिया की लगातार बढ़ रही कारगुजारियों से निपटने के लिऐ भी रणनीति बनायी जा सकती है। सरकार को चाहिऐं कि वह जनता के समक्ष सरकारी संरक्षण में चलने वाले वैध खनन व माफिया द्वारा चोरी छुपे चलाये जाने वाले अवैध खनन के बीच अंतर स्पष्ट करें और व्यापक जनसहयोग से राजस्व में चोरी व गैर पारम्परिक तरीके के खनन को हतोत्साहित किया जाय लेकिन इसके लिऐ सरकार को खुद को भी ईमानदार साबित करना होगा और खनन पट्टो के आंबटन के पीछे छुपे खेल तथा स्टाॅक के नाम पर वनकर्मियों व सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से होने वाली हेरफेर को जनता के समक्ष उजागर करना होगा। यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि वर्तमान में सत्ता पर काबिज भाजपा, प्रदेश की पूर्ववर्ती हरीश रावत सरकार पर खनन माफिया से मिलीभगत के आरोंप लगाती रही है और हरिद्वार के गंगा बहाव क्षेत्र में होने वाले अवैध खनन तथा सरकारी दबाव में होने वाले खनन पट्टों के अनाप-शनाप वितरण ने प्रदेश की जनता को अनेक स्तर पर आंदोलन के लिऐ मजबूर भी किया है। इन हालातों में सरकार मंे हुऐ एक बड़े बदलाव के साथ ही न्यायालय द्वारा खनन पर लगायी गयी यह रोक मौजूदा सरकार के लिये एक वरदान साबित हो सकती है और नवगठित सरकार अगर चाहे तो छोटी-मोटी परेशानियों को दरकिनार कर खनन कारोबार में काम कर रहे माफिया को चुनचुनकर बाहर निकाल सकती है लेकिन सवाल यह है कि क्या त्रिवेन्द्र सिंह रावत सरकार के पास इतनी मजबूत इच्छा शक्ति है कि वह इस संदर्भ में कठोर कदम उठाये और पहाड़ का सीना-चीरकर लाखों-करोड़ का अवैध व्यापार कर रहे खननमाफिया को बेनकाब किया जाय। भाजपा के राजनैतिक सम्पर्क और चुनावी चंदे के खेल को देखते हुऐ यह सब इतना आसान नही लगता। इसलिऐं यह कहने में कोई हर्ज नही है कि राजकाज के साथ यह सबकुछ ऐसे ही चलता रहेगा और व्यापक जनहित की बात करने वाली लोकतान्त्रिक सरकारें मजदूर व रोज कमाकर खाने वाले असंगठित क्षेत्रों की रोजी-रोटी को लेकर अक्सर आने वाली समस्याओं का कोई भी स्थायी समाधान ढ़ूँढ़ने से बचती नजर आयेगी।

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