Saturday, May 27, 2017

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इच्छा शक्ति के आभाव में

इच्छा शक्ति के आभाव में
पूर्ण बहुमत के बावजूद भी दमदार फैसले लेने में नाकाम दिखी उत्तराखण्ड की नवगठित भाजपा सरकार।
उत्तराखण्ड की नवनिर्वाचित सरकार ने अपने पहले ही सत्र में लोकायुक्त व स्थानांतरण विधेयक प्रस्तुत कर एक ईमानदार छवि प्रस्तुत करने की कोशिश की और एक बहुमत वाली सरकार ने लिऐ इन दोनो ही विधेयको को कानून का रूप देना कठिन भी न था लेकिन न जाने किस दबाव में यह दोनो ही विधेयक विचार के लिऐ प्रवर समिति को भेज दिये गये और सरकार को एक बार फिर अपने बचाव के लिऐ मजबूर होना पड़ा। यह माना कि नई सरकार शुरूवाती दौर में जनहित से जुड़े मुद्दो पर गम्भीर दिखाई दे रही है और मुखिया त्रिवेन्द्र रावत ने अपनी कुर्सी सम्भालने के साथ ही सांकेतिक स्वच्छता अभियान का नारा लगा बढ़त बनाने की कोशिश भी की है लेकिन कुछ न कुछ ऐसा जरूर है जो हर कदम पर माननीय नेताजी को सहमने व सोचने पर मजबूर कर रहा है और सरकार के आगे बढ़े कदम उतनी ही तेजी से पीछे भी आ रहे है। मुख्यमंत्री बनते ही स्वच्छता का नारा देने वाले त्रिवेन्द्र को पहला झटका तब लगा जब कि दून की गायत्री ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मन की बात कार्यक्रम में रिस्पना और बिन्दाल की गंदगी का मुद्दा उठाया। हाॅलाकि मुख्यमंत्री समेत स्थानीय शासन-प्रशासन समेत मीडिया ने गायत्री की इस पहल को सकारात्मक रूप से लिया है और इन नदियों को एक बार फिर साफ-सुथरा बनाने की कवायद शुरू करने की बात की जा रही है लेकिन असल परेशानी तब शुरू होगी जब इन नदियों के तटो पर साफ-सफाई तथा इनके मूल स्वरूप को वापस लौटाने का काम शुरू किया जायेगा क्योंकि इन नदियों के अधिकांश किनारों पर बसी मलिन बस्तियाॅ व अवैध कब्जे नेताओं के लिऐ एक बड़ा वोट बैंक है और यह तय है कि जैसे ही इन कब्जो को हटाने या अन्यत्र बसाने की बात आयेगी तो सत्तापक्ष के कई माननीयों की तकलीफ स्वतः ही बढ़ हायेगी। हालातों के मद्देनजर सांकेतिक सफाई अभियान चलाना या फिर प्रधानमंत्री से सीधे संवाद कर स्थानीय मुद्दे उठाने वाली बालिका की तारीफ करना और समस्या का समाधान करना दो अलग-अलग बाते हंै। यह तय है कि त्रिवेन्द्र सिंह रावत की सरकार जब हनीमून पीरियड से बाहर निकल वास्तविकता से रूबरू होगी तो उसे इस बात का अहसास होगा कि सदन के भीतर सत्तापक्ष की सबसे बड़ी ताकत नजर आने वाला दो तिहाई बहुमत ही उसकी असल कमजोरी है। खैर इन परिस्थितियों में सरकार क्या कदम उठायेगी यह वक्त ही बतायेगा और नई सरकार को अपनी प्राथमिकताएं तय करने में भी अभी थोड़ा वक्त लगेगा लेकिन एक पूर्ण बहुमत वाली सरकार द्वारा स्थानांतरण विधेयक को विपक्ष के सांकेतिक विरोध पर ही प्रवर समिति को सौंप देना तथा लोकायुक्त बिल पर विपक्ष की सहमति के बावजूद भी उसे पुर्नविचार के लिऐ भेज देना यह साबित करता है कि या तो सरकार द्वारा इन बिलो को सदन पटल पर रखने की पूरी तैयारी नही की गयी थी या फिर सरकार की नीयत में ही शक है। हम सरकार की नीयत पर शक न करते हुऐ यह जानने की कोशिश करते है कि आॅखिर ऐसी क्या मजबूरी थी जो कि एक नवनिर्वाचित सरकार को आधे-अधूरे मन से दो ऐसे विधेयक सदन पटल पर रखने पड़े जिनपर पूर्व में भी भाजपा के सत्ता में रहते हुऐ चर्चा हो चुकी है। जी हाॅ यह यह काबिलेगौर है कि भाजपा के तथाकथित रूप से ईमानदार व पिछले चुनाव में भाजपा का चेहरा रह चुके पूर्व मुख्यमंत्री भुवन चन्द्र खंडूरी द्वारा स्थानांतरण पर सुगम-दुर्गम के समीकरणों के समाधान के रूप में तबादला कानून बनाया गया था और इसी दौर में हुऐ अन्ना के आन्दोलन से प्रभावित होकर खंडूरी जी ने लोकायुक्त कानून भी बनाया था जिसके दायरे में मुख्यमंत्री समेत तमाम मन्त्रियों व नौकरशाहों को रखा गया था लेकिन पिछले चुनाव में खुद की ही हार के चलते सत्ता की दौड़ से हमेशा के लिऐ बाहर हो गये मालुम पड़ते खंडूरी आज भी न सिर्फ उत्तराखण्ड की भाजपा में अपना स्थान रखते है बल्कि प्रदेश के विभिन्न हिस्सो में उनके समर्थक व ईमानदारी के प्रतिरूप के प्रंशसक बड़ी संख्या में है तथा मौजूदा विधानसभा की सम्मानित सदस्या के रूप में उनकी बेटी अपने पिता की आवश्यकताओं व आपताकालीन परिस्थितियों के लिऐ एक स्थान सुरक्षित किये हुये है। इन तमाम हालातों के मद्देनजर अगर वर्तमान सरकार सत्ता की कुंजी सम्भालते ही लोकायुक्त व स्थानांतरण विधेयक लागू करने की बात करती है तो इसे अपनी सरकारों के प्रति प्रतिबद्वता माना जा सकता है लेकिन जब इन विधेयको को पूरी सफाई के साथ आगे के लिऐ टरका दिया जाता है तो यहाॅ एकपूर्णबहुमत वाली सरकार की कमजोर इच्छा शक्ति स्पष्ट झलकती है। हाॅलाकि अपनी इस कमजोरी के छुपाने के लिऐ मुख्यमंत्री सुलभ स्वास्थ्य सेवाओं के साथ जेनेरिक दवाऐं उपलब्ध कराने तथा सस्ता डाईलिसिस करने की बात भी करते है लेकिन वह यह समझा पाने में अक्षम है कि डाक्टरों के अभाव से जूझ रही प्रादेशिक चिकित्सा सेवाओ के साथ वह हर मरीज को बेहतर इलाज कैसे उपलब्ध करवा सकते है। पीपीपी मोड की व्यवस्था पूर्व में ही असफल साबित हो चुकी है और बजट के आभाव में तमाम दवा कम्पनियों व निविदा धारको ने काफी पहले ही सरकारी अस्पतालों को दवा उपलब्ध कराया जाना बन्द कर दिया है। इन हालातों में सरकार की कथनी व करनी में कितना बड़ा फर्क हो सकता है यह आसानी से समझा जा सकता है। कितना आश्चर्यजनक है कि नवगठित सरकार पलायन पर चिन्ता व्यक्त तो करती है लेकिन पहाड़ो में हो रहे पलायन के मूल कारणों से सदन में चर्चा करने से बचती नजर आती है (क्योंकि इन चर्चाओं में कहीं न कहीं गैरसैण को राजधानी बनाने का मुद्दा उठना लाजमी है)। सरकार राज्यपाल के माध्यम से दिये जाने वाले अपने पहले ही वक्तव्य में स्पष्ट कर चुकी है कि गैरसैण को स्थायी राजधानी घोषित करना उसके ऐजेण्डे में नही है। लिहाजा यह स्पष्ट है कि पलायन पर बहाये जाने वाले सरकारी आॅसू घड़ियाली है और मौजूदा सरकार के पास इस ज्वलन्त समस्या का कोई समाधान नहीं है और न ही सत्ता में आने से पहले चुनाव लड़ने वाले सत्तापक्ष के नेताओ ने इस विषय पर कोई रोडमेप ही तैयार किया है। ठीक इसी तर्ज पर उत्तराखण्ड के पहाड़ी क्षेत्रो की दूसरी सबसे बड़ी समस्या शराब खेारी की बढ़ती प्रवृत्ति व शराबबन्दी पर भी सत्तापक्ष का सदन के भीतर मौन देखते ही बनता है और पूर्ववर्ती सरकार पर शराब माफिया के साथ मिलकर प्रदेश की युवा पीढ़ी को तबाह करने का आरोंप लगाने वाली भाजपा सत्ता में आते ही उत्तराखण्ड में शराबबन्दी को मुद्दा मानने से ही इनकार कर देती है। यह ठीक है कि सदन में उठे सवालातो के आधार पर सरकार को अभी सफल या असफल करार नही दिया जा सकता और नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री की कार्यशैली का जायजा लिऐ बगैर यह तय करना भी जरा मुश्किल ही है कि आगे आने वाले कल में सरकार की प्राथमिकताऐं क्या होंगी लेकिन एक कमजोर विपक्ष के बावजूद सदन में रूक-रूककर चल रही सत्ता पक्ष की गाड़ी को देखकर पता नही क्यों यह अहसास सा हो रहा है कि किसी भी तेज झटके में यह गाड़ी पटरी से उतर सकती है और डबल इंजन से विकास की आस लगायी बैठी जनता को एक बार फिर निराशा का सामना करना पड़ सकता है। खैर, यह तो वक्त ही बतायेगा कि सदन से बाहर आकर मुख्यमंत्री क्या नया कर दिखाते है। हाल फिलहाल तो हम इतना ही कह सकते है कि उत्तराखण्ड को एक बार फिर व्यवस्थित सदन और लेखानुदान के माध्यम से अगले कुछ महिनों के लिऐ बजट मिल गया है।

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