Saturday, May 27, 2017

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कुछ तो दम है

आदित्यनाथ पर बदला मीडिया का रूख।
इसे चमत्कार ही माना जा सकता है कि कल तक योगी आदित्यनाथ पर कटाक्ष करने वाला मीडिया अब उनकी तारीफ करते नही थक रहा है और दूसरी ओर मुख्यमंत्री बनने से पहले खबरों का अहम् हिस्सा होने वाले अरविन्द केजरीवाल आजकल मीडिया के निशाने पर है। इसे भाजपा का मीडिया मेनेजमेन्ट ही कहा जायेगा कि पाॅच राज्यों में होने वाले चुनावों के बाद अस्तित्व में आने वाली सरकारों में पंजाब के मुख्यमंत्री द्वारा लिये जाने वाले बेहतरीन व ठोस निर्णय के बावजूद वह मीडिया का ध्यान उतना आकृर्षित नही कर पाये है जितना कि योगी आदित्यनाथ। ठीक इसी प्रकार अपनी सादगी व सधी हुई कार्यशैली के चलते चर्चाओं में आये मनोहर पार्रिकर एक बार फिर गोवा की सत्ता पर काबिज होने के बावजूद कहीं चर्चाओं में नही है और न ही उनको एकाएक ही रक्षामंत्री जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी से हटाकर गोवा भेजा जाना समाचारों का पोस्टमार्टम करने वाले खबर नवीसो को अखर रहा है। हाॅ इतना जरूर है कि मणिपुर व उत्तराखण्ड जैसे पहाड़ी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को इधर राष्ट्रीय मीडिया द्वारा जरूर थोड़ी तबज्जो दी जा रही है वरना इन राज्यों के मुख्यमंत्रियो के चेहरे देश-दुनिया की जनता का एक बड़ा हिस्सा देख ही नही पाता लेकिन पहाड़ी राज्यों को मिली इस तबज्जों के पीछे भाजपा या नरेन्द्र मोदी की कोई रणनीति प्रतीत नही होती बल्कि ऐसा मालुम होता है कि मणिपुर में भाजपा द्वारा सरकार बनाने के लिऐ आश्चर्यजनक रूप से जुटाये गये समर्थन और उत्तराखण्ड में भाजपा द्वारा सत्तापक्ष में तोड़फोड़ के जरिये एक साल पहले किये गये तखतपलट के प्रयासो के बाद इन विधानसभा चुनावों में भाजपा को मिला दो तिहाई से भी अधिक बहुमत तथा काॅग्रेस नेता व पूर्व मुख्यमंत्री उत्तराखण्ड के रूप में हरीश रावत का बड़ा कद इसका मजबूत कारण रहा है। हो सकता है कि भाजपा का नीतिनिर्धारक माना जाने वाला संघ, योगी आदित्यनाथ के रूप में एक कट्टरवादी हिन्दू सन्त के उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने के बाद उनके आभामण्डल के चंहु ओर हिन्दू वोट बैंक को एकजुट करने की रणनीति पर काम कर रहा हो और नमो-नमो का जादू मतदाता की नजरों से उतरते ही प्रधानमंत्री पद के दावेदार के रूप में एक नया चेहरो सामने लाने की तैयारी अभी से शुरू हो गयी हो लेकिन यह अभी चर्चा का विषय नही है और न ही इस तरह की चर्चाओं पर बल देने के लिऐ मोदी व अमित शाह की जोड़ी ने मीडिया को योगी का महिमामण्डन करने के काम में लगाया है। ऐसा मालुम होता है कि हिन्दुस्तान के एक बड़े हिस्से व केन्द्र सरकार में भाजपा की पताका लहराने के बाद मोदी अन्र्तराष्ट्रीय स्तर की राजनीति में भी दो-दो हाथ आजमाना चाहते है और इसकी प्रारम्भिक तैयारी के तौर पर उन्होने अपने कार्यकाल के शुरूवाती दो-ढाई सालो में देश-विदेश के चक्कर लगा अन्र्तराष्ट्रीय सम्बन्धो को मजबूत करने की कोशिश भी खूब की है लेकिन लगता है कि उनकी इन कोशिशों में कहीं न कहीं उनकी हिन्दुत्ववादी छवि आड़े आ रही है। इसलिऐं वह अब उग्र हिन्दुत्व का चेहरा बनने की जगह मध्यम मार्ग अख्तिार करना चाहते है लेकिन उन्हे मालुम है कि काॅग्रेस को पछाड़कर सत्ता के शीर्ष पदो को हासिल करने की राह में हिन्दुत्व ही उनका अचूक हथियार है और जब तक स्थानीय स्तर पर हिन्दूवादी ताकतें एकजुट व भाजपा के पीछे लामबन्द है तबतक भाजपा को सत्ता से हटाना आसान नही है। शायद यहीं वजह है कि एक सोची समझी रणनीति के तहत ज्यादा कट्टरवादी हिन्दू लगने वाले योगी आदित्यनाथ को न सिर्फ यूपी की सत्ता सौंपी गयी है बल्कि एक सुनियोजित तरीके से उनका महिमामण्डन करते हुऐ उन्हे भाजपा का एक प्रमुख चेहरा बनाने के प्रयास भी शुरू हो गये है और योगी ने भी कुर्सी सम्भालते ही पूरे प्रदेश में अवैध बूचड़खानो पर छापेमारी, ऐन्टी रोमियों स्क्वाएड का गठन और नवरात्र में चैबीसो घन्टे बिजली जैसे फैसलो का ऐलान कर अपने तयशुदा ऐजेण्डे पर काम शुरू कर दिया है। यह अकारण नही है जो भाजपा के लोग योगी जैसे कट्टरवादी नेताओं के बयानात पर वाह-वाह करने के साथ ही साथ भारत वर्ष को एक सम्पूर्ण हिन्दूवादी राष्ट्र बनाने की हुंकार तो भरते है लेकिन साथ ही साथ चुनावी मोर्चे पर भाजपा को मुसलिम समुदाय का समर्थन हासिल होने और विशेषकर मोदी की रैलियों में मुसलिम समुदाय के लोगो की भारी भीड़ जुटने की खबरो पर भी विशेष जोर दिया जाता है और अपने भाषणो, नारो व अन्य हर तरह के वार्तालाप के जरिये एक समुदाय विशेष की खिलाफत में लगे दिखने वाले भाजपाइर्, मीडिया के माध्यम से यह सन्देश देना नही भूलते कि मोदी का आकर्षण देश व दुनिया में सब जगह बढ़ रहा है। भाजपा के लोग यह अच्छी तरह जानते है कि विश्व के सबसे लोकतान्त्रिक रूप से मजबूत व बड़े देश माने-जाने वाले भारत को वैश्विक परिदृश्य में विशेष पहचान मिलने की अहम् वजह यहाॅ की राजनीति का सर्वधर्म सम्भाव व जनता को मिला समानता का अधिकार ही है और यह तथ्य भी किसी से छुपा नही है कि भाजपा की राजनीति का हिन्दूवादी ऐजेण्डा ही उसे अन्य राजनैतिक दलो से अलग करता है। इन हालातों में इन दो ऐजेण्डो पर एक साथ काम करना दो नावो की सवारी करने जैसा है और मोदी व अमित शाह की जोड़ी ने इस रणनीति पर काम शुरू कर दिया मालुम होता है। शायद यहीं वजह है कि योगी आदित्यनाथ को हिन्दुत्व की कमान सौंपते ही मोदी ने दरगाहों में चादर चढ़ाने जैसे फैसलो पर अमल शुरू कर दिया है और कोई बड़ी बात नही है अगर मोदी अगले कुछ दिनों में देश के अल्पसंख्यक मतदाताओं को लुभाते हुऐ कुछ अन्य फैसले लेते दिखे लेकिन भाजपा और संघ अपने ऐजेण्डे पर काम करते रहेंगे तथा एक तयशुदा रणनीति के तहत राममन्दिर के मसले को हवा देने या फिर छोटे-छोटे मुद्दो को उठाकर हिन्दू मतदाताओं को एकजुट रखने का खेल भी जारी रहेगा। दरसल में काॅग्रेस का नेतृत्व कमजोर हाथो में जाने के बाद सत्ता पर काबिज भाजपा की राजनैतिक इच्छाऐं तेजी से बढ़ी है और इन्हे पूरा करने के लिऐ वह किसी भी हद से गुजर जाना चाहती है लेकिन राजनीति के नये खिलाड़ी के रूप में उभरे अरविन्द केजरीवाल भाजपा को हर मोर्चे पर मात दे रहे है और एक जनान्दोलन के जरिये सक्रिय राजनीति का हिस्सा बना यह नेता हर मोर्चे पर मोदी को चुनौती देता प्रतीत होता है। इसलिऐं योगी आदित्यनाथ के सत्ता पर काबिज होते ही उनका महिमामण्डन करने में जुटा मीडिया इस बात का भी विशेष ख्याल रख रहा है कि प्रायोजित रूप से छवि निर्माण के इस दौर में गलती से भी कोई ऐसा कदम न उठाया जाय जो केजरीवाल जैसे नेताओं को कोई फायदा दे सके। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि भारतीय राजनीति में मीडिया के एक हिस्से के दखल और पैसे के लेनदेन के माध्यम से होने वाले छवि निर्माण के खेल को देखते हुऐ यह उम्मीद की जानी चािहऐं कि देश एक बड़े राजनैतिक बदलाव की ओर जा रहा है तथा देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी आने वाले कल में कुछ न कुछ ऐसा राजनैतिक शिगूफा जरूर छेड़ेगे जिससे कि उनकी मनोकामना पूरी हौ।

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