बदलते वक्त के साथ | Jokhim News

Friday, July 21, 2017

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बदलते वक्त के साथ

तेजी से बदल रही है सरकारों की प्राथमिकताऐं, लोकलुभावन फैसले लेने में व्यस्त है सरकारी तन्त्र।
इसे राजनीति में आ रहे बदलाव की पूर्व सूचना माना जाय या फिर लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं के तहत सरकार बनाने का जनादेश देने वाली जनता की इच्छाओं का सम्मान लेकिन यह सच है कि पाॅच राज्यों के चुनाव नतीजों के बाद अस्तित्व में आने वाली पंजाब व उत्तर प्रदेश की सरकारों ने अपनी कार्यशैली से इतर हटते हुऐ कई फैसले लिये है और इन दोनो ही राज्यों के मुख्यमंत्री अपने मन्त्रियों समेत तमाम अन्य वीआईपी गड़ियों में लाल बत्ती का प्रयोग न किये जाने जैसे लोकलुभावन फैसले लेकर यह सन्देश देना चाहते है कि बदलते वक्त के साथ सरकारों व जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताऐं तेजी से बदली है। उ0प्र0 के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकारी कार्यालयों में पान या गुटखे के सेवन करने या फिर सडक चैराहे के अलावा आफिसों के कोनो व सीड़ियो पर थूकने को लेकर नियम बनाना चाहते है तो इसका मतलब यह नही है कि वह व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव लाना चाहते है बल्कि अगर गम्भीरता से गौर करे तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इस तरह के लोकलुभावन फैसले के जरिये नवनिर्मित सरकारें जनता पर अपना प्रभाव छोड़ना चाहती है। यह अकारण नही है कि कुर्सी सम्भालते ही उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र रावत अपने पूरे मत्रीमंडल के साथ साफ सफाई का सन्देश देने में जुट जाते है और उत्तराखण्ड में मुख्यमंत्री द्वारा स्वंय गंगा की ओर रूख करते हुऐ व्यापक सफाई अभियान चलाया जाता है या फिर उ0प्र0 में योगी आदित्यनाथ पुलिस की कार्यप्रणाली को दुरूस्त करते व अवैध स्टलर हाउसो पर ताले लगवाने में जुटे दिखते है लेकिन इस तरह की कार्यवाहियों को लम्बे समय तक अंजाम नही दिया जा सकता और बदलाव के नारे से प्रभावित मतदाता को संतुष्ट करना इन नेताओं के लिऐ कड़ी परीक्षा का दौर माना जा सकता है। पंजाब, उ0प्र0 व उत्तराखण्ड समेत देश के हर राज्य की अपनी-अपनी समस्यायें और प्राथमिकताऐं है तथा इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि इन तमाम राज्यों की व्यवस्थाओं को अपने हिसाब से चलाने की आदी हो चुकी नौकरशाही कुछ मामलों में राजनैतिक हस्तक्षेप नही चाहती लेकिन जनता के बीच अपनी अहमियत बनाये रखने और कुछ करता हुआ दिखने की मजबूरी के तहत इन तमाम राज्यों की सत्ता पर काबिज राजनैतिक दलो व नेताओं की कोशिश है कि वह जनता को कुछ ऐसा करते दिखे जिससे आमजनमानस तक यह सन्देश जाये कि सरकारों के गठन को लेकर उसका निर्णय लगभग ठीक-ठाक था। मौजूदा दौर में नरेन्द्र मोदी और अरविन्द केजरीवाल जैसे नेताओं के सत्ता पर काबिज होने के बाद सरकार को लेकर जनता की सोच में एक बदलाव आया है और इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि भ्रष्टाचार से जुड़े तमाम मामलो पर इन दोनो ही नेताओ के स्पष्ट रूख के बाद यह लगभग साफ हो गया है कि राजनीति में पुराने तौर-तरीके अब ज्यादा कारमद नही होने वाले। इसलिऐं बदली हुई परिस्थितियों में नवनिर्वाचित सरकारों ने बड़ी-बड़ी घोषणाओं को अंजाम देकर जनमानस के रहन-सहन के तरीके को बदलने या फिर जनमानस की सेाच बदलने की कोशिंशे करना बन्द कर दी है और व्यापक जनहित के मामलो में छोटे-छोटे मुद्दो को सामने लाकर यह कोशिश की जा रही है कि मीडिया के एक हिस्से के सहयोग से माहौल को अपने पक्ष में रखा जाय। हमने देखा कि नोटबन्दी के मामले में जनता के एक बड़े हिस्से को हुई तकलीफों के बावजूद मोदी जन सामान्य को यह सन्देश देने में सफल रहे कि उनकी नीयत साफ है और तय समय सीमा में काले धन का एक छोटा हिस्सा भी सामने न आने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को पाॅच राज्यों के चुनावों में मिली सफलता इस तथ्य को प्रमाणित करती है कि जनता ने मोदी के इस फैसले को न सिर्फ हाथोहाथ लिया बल्कि मोदी की नीयत पर शक करने वाले विपक्ष को भी सबक सिखाया। हो सकता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह दांव बार-बार कामायाब न हो और कमजोर विपक्ष के बावजूद उन्हे आगे आने वाले चुनावों में वह सफलता न मिल पाये जिसका प्रदर्शन भारतीय जनता पार्टी द्वारा लगातार पिछले तीन-चार वर्षो से किया जा रहा है लेकिन हम इस तथ्य को वर्तमान में नकार नही सकते कि विपक्ष द्वारा मुद्दा बनाने के गम्भीर प्रयासों के बावजूद मोदी सरकार द्वारा लिये गये तमाम छोटे-छोटे फैसले और भाजपा के कार्यकर्ताओं व संघ के स्वंयसेवको द्वारा मौका-बमौका लगायें जाने वाले ‘भारत माता की जय’ जैसे सारगर्भित नारे वर्तमान में जनमानस को पूरी तरह प्रभावित करते हुऐ चुनाव नतीजों पर अपना असर डाल रहे है। ऐसी हालत में मोदी व अमित शाह के नेतृत्व में काम कर रही भाजपा द्वारा राज्यों में गठित की गयी जनहिततकारी सरकारें अपने फैसलो में मोदी का ही अनुशरण करती प्रतीत होती है तो इसमें हर्ज ही क्या है लेकिन राजनीति में आये इस बदलाव के लिऐ हम सिर्फ नरेन्द्र मोदी, अमित शाह या केजरीवाल को ही दोषी नही मान सकते और न ही यह माना जा सकता है कि राष्ट्रहित में बड़े-बड़े निर्णय लेने वाला सरकारी तन्त्र सिर्फ इसी तरह की मदारीगिरी के चलते एक लम्बे समय तक सत्ता में टिका रह सकता है। यह ठीक हे कि पंजाब, उत्तराखण्ड व उत्तर प्रदेश समेत पाॅचों ही राज्यो की सरकारों के पास अभी काम करने व बड़े निर्णय लेने के लिऐ बहुत वक्त है और मजबूत विपक्ष के आभाव में मोदी के राजनैतिक वजूद को कोई बड़ी चुनौती नही दिखती लेकिन सवाल यह है कि क्या कोई भी सरकारी तन्त्र व्यवस्था के तहत आने वाली मूलभूत समस्याओं को अनदेखा कर बहुत ज्यादा लम्बे समय तक सत्ता पर काबिज रह सकता है। गम्भीरता से मनन करने पर इस प्रश्न का जबाव नकारात्मक रूप में ही सामने आता है और ऐसा प्रतीत होता है कि विकल्प के आभाव में भारतीय राजनीति एक ऐसे दलदल की ओर जा रही है जहाॅ विपक्ष को समाप्त कर सत्ता पर बने रहना ही शासक वर्ग का एकमात्र उद्देश्य है लेकिन क्या इस अव्यवस्था के लिऐ सिर्फ सत्ता पक्ष ही दोषी है और लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं के तहत मतदान करने वाले वर्ग की सरकार बनाने के अलावा अन्य कोई जिम्मेदारी नही है। यह एक गम्भीर प्रश्न है जिसपर हम सभी ने व्यापक विचार विमर्श करना चाहिऐं लेकिन फिलहाल तो हम विभिन्न राज्यों की सरकारों द्वारा लिये जाने वाले छोटे-छोटे किन्तु लोक लुभावन फैसलो का असर देखने में व्यस्त है।

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