बदले हुऐ निजाम में | Jokhim News

Sunday, September 24, 2017

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बदले हुऐ निजाम में

उत्सव के माहौल में पीछे छूटी जनापेक्षाओं की चिन्ता।
नमो-नमो के नारे के साथ उत्तराखण्ड की भाजपा के नेतृत्व वाली त्रिवेन्द्र सिह रावत सरकार ने अब पूरी तरह कार्यभार सम्भाल लिया है और मन्त्रीमण्डल के बंटवारे समेत तमाम सरकारी फैसलो में स्पष्ट दिख रही मोदी व अमित शाह की जोड़ी की छाप के अलावा ऐसा भी बहुत कुछ है जो वर्तमान सरकार की कार्यशैली पर एक नजर डालते हुऐ सरकारी कामकाज के तौर-तरीको की समीक्षा करने को उकसाता है। प्रदेश की नौकरशाही में सरकार द्वारा किया गया बड़ा फेरबदल यह संकेत देता है कि वह वाकई में कड़े फैसले लेने के हक में दिखाई दे रही है और अपने शुरूवाती दौर से ही कड़क प्रशासक की छवि कायम करने के मूड में दिख रहे त्रिवेन्द्र अपने कई मजबूत फैसलो के दम पर जनता के बीच अलग छवि बनाना चाहते है। अब यह तो वक्त ही बतायेगा कि भाजपा के इन पाॅच सालो के शासनकाल में जनता को हासिलात क्या होंगे लेकिन अगर मौजूदा माहौल पर गौर करे तो हम पाते है कि स्थानीय जनता मतदान को लेकर किये गये अपने फैसले से खुश है और ज्यादा खुशी इस बात की है कि उत्तराखण्ड के साथ ही साथ उ0प्र0 में भी भाजपा की ही सरकार है। स्थानीय जनता का पढ़ालिखा वर्ग और देश के दूसरे हिस्सों में रहने वाला पहाड़ी जनसमुदाय इस सोच के साथ खुश है कि इन दोनो ही सरकारों के अस्तित्व में आने के बाद उत्तराखण्ड राज्य निर्माण के बावजूद लटके रह गये सम्पत्ति बॅटवारे से जुड़े तमाम फैसले आसानी व जल्दी से अस्तित्व में आयेंगे और संसाधनो की कमी से जूझ रहे इस नवगठित व छोटे राज्य को कुछ नयी व्यवस्थाऐं मिलेंगी, तो स्थानीय गरीब जनता व सुदूरवर्ती पहाड़ो पर रहकर अपना दुरूह जीवन गुजार रही एक बड़ी आबादी यह सोचकर खुश है कि इस बार बीजेपी के राज में उत्तराखण्ड ही नही बल्कि उ0प्र0 पर भी पहाड़ का लाल काबिज है। यह अलग बात है कि खुद को सन्त घोषित कर चुके योगी आदित्यनाथ खुद को पहाड़ी मानते है या नही लेकिन ‘खुद को बहलाने के लिऐ यह ख्याल अच्छा है’ कि आदिल्यनाथ के सभी निकटवर्ती रिश्तेदार व माता पिता अभी पहाड़ पर ही रहते है और उनकी शिक्षा-दिक्षा का एक बड़ा हिस्सा पहाड़ पर ही गुजरने के कारण वह अभी भी खुद को थोड़ा पहाड़ी सा महसूस करते होंगे। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि एक लम्बे संघर्षो के बाद अस्तित्व में आये तथा संघर्षकारी पृष्ठभूमि वाले पहाड़ में इस वक्त हर्ष का माहौल है और इस अपार हर्ष की स्थिति के लिऐ भी जनता खुद ही जिम्मेदार है। शायद यही वजह है कि पहाड़ की मूलभूत समस्यायें व आर्थिक दुश्वारियाॅ पीछे छूट गयी है और स्थानीय स्तर पर मौजूद कई छोटी-बड़ी समस्याओं के बावजूद आदमी यह देखना चाहता है कि आखिर उसकी बेहतरी के लिऐ सरकार द्वारा क्या कदम उठाये जा रहे है ? पलायन, पहाड़ो पर खस्ताहाल स्कूल या अस्पताल और बिजली पानी की समस्याऐं अभी चर्चा का विषय नही है क्योंकि आम आदमी जानता है कि किसी भी सरकार के पास कोई जादू की छड़ी नही है और अगर सरकारी तन्त्र चाहे भी तो सत्ता पर काबिज होने तक इन तमाम समस्याओं का समाधान सम्भव नही है। ठीक इसी तर्ज पर सरकारी कर्मी, संविदा कर्मचारी व अतिथि शिक्षकों समेत बेरोजगारों व विभिन्न तकनीकी अहर्ताओं से युक्त बेकारो के संगठन भी सरकार की कार्यशैली पर नजर बनाये हुऐ है और बगैर किसी चेतावनी या नारे के त्रिवेन्द्र रावत को सरकारी कामकाज के तौर-तरीके समझने व व्यापक जनहित में कठोर फैसले लेने का पूरा मौका दिया जा रहा है। भाजपा के नेताओ व विधायको के बीच बैचनी का आलम तो है और खुद को मन्त्री पद अथवा दायित्वों के योग्य मानने वाले तमाम जनप्रतिनिधि व पार्टी कार्यकर्ता त्रिवेन्द्र रावत के हर राजनैतिक कदम पर अपनी नजर बनाये हुऐ है लेकिन अपनी माॅगो को लेकर सरकार के समक्ष दबाव बनाने या फिर ध्यान आकर्षण के लिऐ किसी भी तरह की कार्यवाही को अंजाम नही दिया जा रहा क्योंकि समाज का हर वर्ग भाजपा की इस पूर्ण बहुमत वाली सरकार को काम करने का पूरा मौका देने के मूड में है या फिर यह मान लिया गया है कि मोदी व अमित शाह के दिशानिर्देशो पर चल रही इस पूर्ण बहुमत वाली सरकार पर हाल-फिलहाल कोई दबाव काम नही करने वाला। ऐसा नही है के भाजपा के इस राज में समस्यायें स्वतः ही समाप्त हो गयी है और पहाड़ो की विरासत व संस्कृति सहेजकर रखने के नाम पर इसका मंचीय प्रदर्शन करने पर जोर देने वाली प्रवासी ताकतो ने अब यह मान लिया है कि इस पहाड़ी राज्य में पूर्ण बहुमत वाली सरकार के गठन के बाद उनकी जिम्मेदारियाॅ अब समाप्त हो चली है लेकिन यह भी सत्य है कि कमजोर विपक्ष के चलते कुछ लोग अभी यह ही नही समझ पा रहे कि शुरूवात कहाॅ से करनी है। हालातों के मद्देनजर त्रिवेन्द्र रावत पर खुद को साबित करने की चुनौती तो है ही साथ ही साथ उन्हे सतपाल महाराज जैसे बड़े कद वाले और हरक सिह रावत जैसे अख्खड़ नेता को भी साथ लेकर चलना है और शायद यहीं वजह है कि नौकरशाही में फेरबदल या फिर मन्त्रियों के बीच विभागो के आंबटन जैसे तमाम कदमों को फॅूक-फॅूक कर रख रहे त्रिवेन्द्र अपने हर फैसले में हाई कमान को साथ लेकर चलना चाहते है लेकिन यह सिलसिला बस यूं ही कितना लम्बा चलेगा और मुख्यमंत्री आवास से कई बड़ी उम्मीदें रखने वाला तबका कब तक चुपचाप बैठा यह सबकुछ देखता रहेगा, कहा नही जा सकता। सरकार के समक्ष उच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों का पालन करते हुऐ राजस्व को बनाये रखने की चुनौती तो है ही साथ ही साथ सरकारी तन्त्र विधानसभा के माध्यम से अनुपूरक बजट ला अपने रोजमर्रा के खर्चो के इन्तजामात की कोशिशों में भी लगा है लेकिन इस सारी जद्दोजहद में उस मतदाता वर्ग की चिन्ता अभी कहीं नही दिख रही जिसने सरकार को इस मुकाम तक पहुॅचने का मौका दिया है। इन हालातों में अगर हम यह कहें कि उत्तराखण्ड की त्रिवेन्द्र रावत के नेतृत्व वाली सरकार जनापेक्षाओं के मद्देनजर काम कर रही है तो यह शायद जल्दबाजी होगी लेकिन जनपक्ष के पास सरकारी कामकाज के तरीके पर नजर बनाये रखने के अलावा और कोई चारा भी नही है क्योंकि जनता भाजपा के प्रति आशावान दिख रही है। अब यह तो वक्त ही बतायेगा कि नौकरशाही पर अकुंश रखने की नीयत से सरकार द्वारा बड़े पैमाने पर किये गये तबादले क्या परिणाम देते है और सरकार के मन्त्री अपनी-अपनी योग्यताओं का प्रमाण देते हुऐ जनसामान्य केा किस किस्म की राहत या उपलब्धियों से नवाजते है लेकिन इतना तय है कि सरकार गठित होने के बाद भावावेश के अतिरेक से प्रवाह शून्य होता दिख रहा एक आम उत्तराखण्डी मौजूदा सरकार से कई तरह की उम्मीदें लगाये बैठा है और उसे विश्वास है कि आगामी लोकसभा चुनावों में एक बार फिर पाॅचो ही सीटे हासिल करने के लिऐ भाजपा कुछ ऐसे कदम अवश्य उठायेगी जिन्हे आने वाले कल के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिखा जा सकेगा। हो सकता है कि हम मौजूदा सरकार से कुछ ज्यादा ही उम्मीदें लगाये बैठे हो और अपने हर छोटे-बड़े फैसले के लिऐ हाईकमान के इशारें का इन्तजार करने को मजबूर दिख रही त्रिवेन्द्र रावत की सरकार उस गति व नीयत से काम नही कर पाये जिसकी उम्मीद की जा रही है लेकिन इतना तय है कि हालफिलहाल इस सरकार द्वारा किसी भी तरह के भ्रष्टाचार या मनमानी किये जाने के फैसले सामने आने की सम्भावना नही है क्येांकि उसे मिले भारी जनसमर्थन के साथ ही जनापेक्षाओं पर खरा उतरने की मजबूरी भी उसके मुॅह बाॅये खड़ी है। लिहाजा अटकलों व अपने भीतर उमड़ रहे जनहित के प्रश्नो को यहीं पर विराम देते हुऐ हम भी शान्ति के साथ सरकार की कार्यशैली व उसके मौजूदा फैसलो पर एक समीक्षात्मक नजर डालने के साथ ही त्रिवेन्द्र सिह रावत व उनके मन्त्रीमण्डल को अपनी इच्छाओं के अनुरूप काम करने का एक मौका प्रदान करते है।

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