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Wednesday, June 28, 2017

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अत्याचार के खिलाफ आक्रोशित नजर आ रहे है मजदूर व कर्मचारी।
मारूति उद्योग गुड़गाॅव में कर्मचारी संगठन बनाने व ठेका प्रथा का विरोध करने वाले तेरह श्रमिको को लम्बी कानूनी कार्यवाही के बाद उम्र केद तक की सजा सुना दी गयी लेकिन इस खबर पर किसी भी राष्ट्रीय अखबार व न्यूूज चैनल ने विशेष तबज्जो नही दी और न ही सरकार द्वारा श्रमिक पक्ष को यह समझाने की कोशिश की गयी कि वह किन कारणो के चलते श्रमिकों को स्थायी रोजगार देने के विरोध में है या फिर लचर श्रम कानूनों के जरिये श्रमिक वर्ग के अधिकारों की रक्षा करने का दावा करने वाला सरकारी तन्त्र अपने की नियमों व कानूनो की अवहेलना होने की स्थिति में प्रबन्ध तन्त्र के स्थान पर श्रमिको को ही दोषी कैसे ठहरा सकता है ? हाॅलाकि मारूति में श्रमिको के साथ जो कुछ हुआ या हो रहा है, उसमें कुछ भी नया नही है और न ही किसी राज्य अथवा केन्द्र की सरकार यह सुनिश्चित करना चाहती है कि औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने के नाम पर विभिन्न प्रकार की छूटो व अनुदानो से चलने वाले भारतीय उद्योग श्रमिक वर्ग की मेहनत की कमाई मारने की मंशा क्यों रखते है लेकिन इस सबके बावजूद कर्मचारियों के बीच व्याप्त असंतोष या तथाकथित अराजकता को खत्म करने के नाम पर श्रमिक संगठनो के दमन का यह सिलसिला कोई पहली घटना नही है ओर न ही कोई सरकार या फिर सरकारी ऐजेन्सी यह सुनिश्चित करने को तैयार है कि उद्योगपतियों द्वारा दशको से किये जा रहे श्रमिको के इस शोषण के खिलाफ एक माहौल बनाया जाय। हरियाणा, राजस्थान या फिर कुछ चुनिन्दा बड़े शहरो में ही नही बल्कि देश के लगभग सभी हिस्सो में मजदूर आन्दोलन, यूनियन बनाने के अधिकार और मजदूरो के मानवाधिकारो को कुचलने की एक बड़ी साजिश चल रही है तथा देश के विभिन्न हिस्सो में मजदूर व उनके विभिन्न संगठन इस नाइसांफी के खिलाफ संघर्ष कर रहे है लेकिन जनसामान्य की तबज्जो इस ओर से हटाने की साजिशो के तहत मीडिया को इस तरह की खबरों से दूर रहने की हिदायत है और मजीठिया आयोग की सिफारिशें लागू हो जाने या फिर विज्ञापनो का लालच तमाम समाचार पत्रो को मालिको व न्यूज चैनलों नेे सरकार का पिछलग्गू बने रहने का फैसला लेते हुए सरकार के पक्ष खड़े होने का फैसला लिया है। यह ठीक है कि चुनिन्दा छोटे समाचार पत्रो व ट्रेड़ यूनियनों के समाचारों को ही प्रमुखता से छापने वाली मैगजीनो या सप्ताहिकों ने इस घटनाक्रम को गम्भीरता से लिया है लेकिन इनके सीमित दायरें व कम पाठक संख्या के चलते श्रमिक संगठन आम जनता तक अपनी आवाज पहॅुचा पाने में असफल है और आन्दोलनरत् श्रमिक संगठनो व ट्रेड यूनियानों के बारे में यह मान लिया जाता है कि यह लोग सिर्फ अपना वेतन बढ़ाने का संघर्ष करते है। हम यह नही कहते कि श्रमिक संगठनो में गलत या उपद्रवी लोग नही है बल्कि अगर सही मायने में देखा जाय तो हम यह कह सकते है कि मजदूरो के शान्तिपूर्ण आन्देालनों को तोड़ने या फिर उनमें बिखराव की स्थिति लाने में अराजक तत्वों की बड़ी भूमिका होती है और अधिकतर मामलो में यह देखा गया है कि यह अराजक तत्व प्रबन्धन तन्त्र या पूॅजिपति वर्ग से मिले होते है लेकिन अगर देश का कानून या अदालत संगठन बनाने के मामले में हुई अराजकता को लेकर सामने आये इस पूरे घटनाक्रम के परिपेक्ष्य में बात की जाय तो हम पाते है कि गुड़गाॅव के मारूति उद्योग से जुड़े इस मामले में तथाकथित श्रमिक संगठन की कार्यकारणी के बारह सदस्यों समेत तेरह को उम्रकेद की सजा सुनाई गयी है जबकि चार मजदूरों को पाॅच साल और चैदह मजदूरो को तीस साल की सत्ता सुनाई गई है। गौरेतलब है कि जिन चैदह मजदूरो को तीन साल की सजा हुई है वह पिछले चार वर्षों के चलते जेलो में बन्द होने के चलते अपनी सजा पूरी कर चुके है और रेाजी-रोटी के संकटो में जूझते इन श्रमिकों के इस कीमती एक साल का कानून के पास कोई हिसाब नही है। ठीक इसी तरह वह 117 मजदूर जिन्हे पूर्व में ही अदालत द्वारा बाईज्जत बरी कर दिया गया था लेकिन विभिन्न कारणो के चलते वह चार वर्षों तक जेल में रहे और लगभग 2500 वह मजदूर जिन्हे बिना कोई कारण बताऐं पहले ही गैरकानूनी तरीके से बर्खास्त कर दिया गया था, वैबजह ही लचर कानूनी व्यवस्था का खामियाजा भुगत रहे है लेकिन इनकी आवाज सत्ता के उच्च सदनो तक पहॅचाने वाली हर ताकत को बुलन्द होने से पहले ही खामोश करने के लिऐ हर कानून का रक्षक चकचैबन्द नजर आ रहा है और ऐसा मालुम देता है कि देश पर लागू उदारवादी अर्थव्यवस्था के बाद नेताओ व सरकारी तन्त्र ने अपना जमीर ही पूॅजीवाद के पास गिरवी रख दिया है। हो सकता है कि कर्मचारी व मजूदर वर्ग की हड़ताले आम आदमी को तकलीफे देती हो और तथाकथित आधुनिकता के नाम पर विभिन्न राजनैतिक विचारधाराओ या फिर सत्ता के ऊॅचे सोपानो पर विराजे जनप्रतिनिधियों के तथाकथित भक्तो केा कर्मचारियों व मजदूरों के संगठनो द्वारा दिया गया हड़ताल का नारा तन्त्र विरोधी लगता हो लेकिन यह सच है कि उपरोक्त मामले में अभियोजन पक्ष का केस व अदालत का फैसला दोनो बिना किसी सबूत व गवाही के सिर्फ वर्ग द्वेष पर आधारित है और यूनियन पंजीकृत कराने में मददगार प्रबन्धक वर्ग की अफसोसजनक मौत में मजदूरों की कोई भूमिका नही थी, इस तथ्य को अन्तिम रूप से साबित किया जा चुका है। ध्यान रहे कि सुपरवाइजर जियालाल (जिसे कि बाद में केस का मुख्य आरोपी बनाया गया है) के साथ मारपीट व गालीगलौच करने के साथ ही जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करने से शुरू हुई इस मामले की पटकथा यूनियन को खत्म करने के षणयंत्रो के साथ पहले ही लिखी जा चुकी थी तथा प्रबन्धन वर्ग व सरकार के गठजोड़ द्वारा हजारो मजदूरों केा पहले से ही प्रताणित किया जा रहा था जिससे गुड़गाॅव व मानेसर को पूर्व में ही छावनी में बदल दिया गया था। कितना आश्चर्यजनक है कि देश की जनता द्वारा चुने जाने वाले प्रधानमंत्री का ‘‘मैक इन इण्डिया’’ कार्यक्रम व इस कार्यक्रम से जुड़ने वाले तमाम देशी व विदेशी पूॅजीपतियों का सरकार पर भरोसा सस्ते व आज्ञाकरी श्रम पर निर्भर करता है और इसके लिये सरकारें एक ऐसी व्यवस्था की ओर आगे बढ़ने का प्रयास कर रही है जहाॅ कोई यूनियन न हो और न ही किसी अधिकार की माॅग उठे। इस व्यवस्था के खिलाफ वर्ष 2011 से ही ठेका व्यवस्था के खात्में की माॅग करते हुऐ कार्यस्थल पर सम्मान व प्रबन्धन के शोषण के खिलाफ आवाजे लगातार उठ रही और इस क्रम में होंडा, रीको, अस्ति, श्रीराम पिस्टन, डाईकन से लेकर बेलसोनिका तक के तमाम श्रमिक संगठनो द्वारा अपनी आवाजो को लगातार बुलन्द किया जा रहा है। मजदूर भयभीत नही है और न ही स्थायी व ठेका श्रमिको के इस विभाजन ने मजदूरो की एकता को विभाजित ही किया है लेकिन वर्तमान हालातों में औद्योगिक समूहो की शोषण व दमनकारी नीतियों के खिलाफ नेताओ व जनप्रतिनिधियों की चुप्पी देखकर अफसोस सा होता है और अफसोस की इस हालत में भगत सिह के अलावा कोई याद नहीं आता। इसलिऐं 23 मार्च को भगतसिंह की शहादत के अवसर मारूति सुजुकी मजदूर संघ (जो कि छः मारूति प्लांटो का सामूहिक संगठन है) ने मानेसर चलो का आवहन किया और अब चार अप्रैल को देशव्यापी प्रदर्शन की तैयारी चल रही है। मजदूरो के यह प्रदर्शन और आन्दोलन तो यूूं ही चलते रहेंगे लेकिन असल सवाल यह है कि क्या हमारी सरकारें इन आन्देालन से चेतेंगी या नही।

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