राजनीति के गलियारों से | Jokhim News

Friday, August 18, 2017

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राजनीति के गलियारों से

मुख्यमंत्री की कुर्सी सम्भालने के बाद अपने ऐजेण्डे पर जुटे योगी।
सन्त से राजनेता बने योगी आदित्यनाथ को देश और दुुनिया की जनता सिर्फ उतना ही जानती है जितना कि उनके बारे में मीडिया द्वारा प्रचारित किया गया है और यहाॅ पर यह कहने में कोई हर्ज नही है कि नाथ सम्प्रदाय के ध्वजवाहक के रूप में अपने गुरू गोरखनाथ द्वारा उठायी गयी धर्म पताका को सहेंजे हुऐ यह युवा सन्त अपनी कर्मठता की हदो तक जिद्दी है। नाथ सम्प्रदाय की कठिन साधना पद्धति व तप से गुजरकर गोरखपुर समेत समस्त पूर्वाचंल के राजनैतिक समीकरणों को साधने वाले इस योग पुरूष ने कभी भी सार्वजनिक रूप से अपने ज्ञान या सिद्धियों का दिखावा नही किया और न ही एक राजनेता के रूप में आदित्यनाथ को यह जरूरत महसूस हुई कि चुनावी मौसम में अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिऐ वह अपने निर्वाचन क्षेत्र की खाक छानते फिरे लेकिन इस सबके बावजूद मीडिया के एक बड़े हिस्से ने उन्हे फायर ब्राॅड नेता का नाम दिया और हर छोटे-बड़े चुनाव मे उनपर यह आरोप लगे कि वह साम्प्रदायिकता को हवा देकर अपने राजनैतिक समीकरण मजबूत कर रहे है। हो सकता है कि तथाकथित धर्मनिरपेक्ष ताकतों को यह लगता हो कि महज छब्बीस वर्ग की अल्पायु में पहला लोकसभा चुनाव जीतने वाला यह युवा तुर्क अपने निर्वाचन क्षेत्र में गठित युवा वाहिनियों व राम मन्दिर आन्दोलन की आड़ में अपना धार्मिक ऐजेण्डा लागू कर एक वर्ग विशेष का नेता बन बैठा है और राजनैतिक शुद्धिकरण के नाम पर गलियो व चैराहो के नाम बदलने की राजनीति या फिर एक धर्म विशेष के विरूद्ध की गयी बयानबाजी ही इस युवा सन्त की असली ताकत है लेकिन अगर हकीकत में देखा जाय तो आदित्यनाथ ने सन्त से नेता बनने के बाद अपने मठो व आश्रमों में सिमटी अपार धन सम्पदा का व्यापक जनहित में इस्तेमाल कर आम आदमी के दिल में जगह बनाने की कोशिश की है और उनके प्रभाव क्षेत्र में फैले मठ-मन्दिरों द्वारा चलाये जाने वाले अस्पताल, अन्नग्रहो व स्कूलो ने उन्हे जन-जन का नेता बनाया। अगर सूत्रो के हवाले से आ रही खबरो को सही माने तो उ0प्र0 का मुख्यमंत्री बनने की रेस में केशव मौर्य को आगे माना जा रहा था लेकिन मुख्यमंत्री का नाम घोषित होने से ठीक पहले अमित शाह व संघ की पदाधिकारियों के बीच हुई बैठक में योगी का नाम तेजी से आगे आया और इस मसले पर शाह द्वारा की जा रही न नुकर के बाद मोहन भागवत ने सीधे इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से बात की। योगी आदित्यनाथ का नाम आगे कर संघ जहाॅ एक ओर अपने हिन्दूवादी ऐजेण्डे को लागू रखना चाहता है वहीं केशव प्रसाद मौर्य व दिनेश शर्मा को डिप्टी सीएम का दर्जा देकर गरम दल व नरम दल के बीच सामजस्य बनाये रखने की बात भी सामने आ रही है और इसे भाजपा का मीडिया मेनेजमेन्ट ही कहा जायेगा कि योगी आदिल्यनाथ का नाम उ0प्र0 के मुख्यमंत्री के रूप में सामने आने से पहले जो मीडिया आदित्यनाथ को उग्र हिन्दूवादी ऐजेण्डे का नायक बता पानी पी-पीकर कोस रहा था वही मीडिया अगले ही दिन योगी की शान में कसीदें पढ़ने लगा। हो सकता है कि येागी आदित्यनाथ के रूप में एक उग्र हिन्दूवादी नेता के चेहरे को आगे कर संघ इधर एकाएक ही एकजुट होती दिख रही तमाम हिन्दूवादी ताकतों व एक झण्डे के नीचे आती दिख रही तमाम हिन्दू जातियों को राजनैतिक वोट बैंक के लिहाज से अपने साथ जोड़े रखना चाहता हो लेकिन अगर आदित्यनाथ के काम करने के तरीके व शिक्षा, स्वास्थ्य व अन्य जनहितकारी सुविधाओ के लिहाज से उनके रूझान को देखते हुऐ गौर फरमाये तो हम यह कह सकते है कि योगी का सबको साथ लेकर चलने का तरीका तथा जनसुविधाओं पर उनका नजरिया उन्हे सम्पूर्ण उ0प्र0 में एक मजबूत राजनेता के रूप में स्थापित कर सकता है। हालातों के मद्देनजर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या आने वाले कल में योगी आदित्यनाथ देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिऐ एक चुनौती हो सकते है और एक सफल मुख्यमंत्री के रूप में उनका काम करने का तरीका व अपने लोगो को मजबूत करते हुऐ एक अलग गुट खड़ा करने की आदत आने वाले कल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिऐ मुसीबतें बढ़ा सकती है। हमने देखा कि नरेन्द्र मोदी ने बड़ी ही सफाई से उम्र का सवाल उठाते हुऐ प्रधानमंत्री पद के तमाम दावेदारों को इस दौड़ से बाहर रखा है और अपने एक विशेष अन्दाज के जरिये युवा मनो में छाये प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मीडिया का इस्तेमाल करना भी खूब जानते है। इन हालातों में यूपी की सत्ता पर काबिज होने के बाद योगी आदित्यनाथ को संत समाज व संघ का साथ अगर यूं ही मिलता रहा और वह बिना किसी हिचक व रोक टोक के अपने पूर्ववर्ती अन्दाज में व्यापक जनहित से मुद्दो पर तबज्जो देते रहे तो कोई कारण नही है कि यूपी की सल्तनत उन्हे राजनीति में बड़ा मुकाम हासिल करने का मौका दे। फिलहाल तो येागी का पूरा ध्यान कानून से जुड़ी समस्याओं के समाधान पर है और वह स्थानीय पुलिस की छवि को निखारने की कोशिशों में जुट गये मालुम होते है लेकिन एक अन्तराल के बाद वह संगठनात्मक स्तर पर अपनी स्थिति को मजबूत करने और जनता के बीच अपनी उपलब्धता को बनाये रखने की दिशा में भी प्रयास करेंगे, ऐसे हमारा मानना है। अपने हिन्दूत्ववादी ऐजेण्डे के तहत योगी ने मुख्यमंत्री आवास समेत तमाम सरकारी भवनो का शुद्धिकरण करने व इनका भगवाकरण करने का प्रयास भी शुरू कर दिये है और यह कहने में कोई हर्ज नही है कि अपने इन प्रयासो के चलते वह स्वाभाविक रूप से जनचर्चाओं का हिस्सा बने रहेंगे। अगर ऐसा होता है तो संघ की मजबूरी होगी कि वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व अमित शाह की जोड़ी पर अपना दबाव बनाये रखने के ऐजेण्डे के तहत योगी की कार्यशैली का बढ़ावा दे और देश के अगले प्रधानमंत्री के तौर पर उनका नाम आगे बढ़ाया जाय।

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