नेतृत्व क्षमता पर उठते सवाल | Jokhim News

Wednesday, June 28, 2017

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नेतृत्व क्षमता पर उठते सवाल

दोनो ही विधानसभा क्षेत्रो से चुनाव हारे मुख्यमंत्री हरीश रावत।
एक मुख्यमंत्री के रूप में हरीश रावत का दो-दो विधानसभा क्षेत्रो से चुनाव हारना वाकई में चिन्ताजनक है और अगर चुनावी हार-जीत को ही जनमत का पैमाना माना जाय तो यह कहने में कोई हर्ज नही है कि एक लम्बे अर्से से पहाड़ की राजनीति कर रहे हरीश रावत एक मुख्यमंत्री के रूप में जनता द्वारा स्वीकार नही किये गये। हाॅलाकि हार और हरीश रावत का चोली दामन का साथ रहा है और अगर हरीश रावत के राजनैतिक इतिहास पर गौर करे तो हम यह पाते है कि हर चुनावी हार के बाद उनका राजनैतिक कद बड़ा है लेकिन इस बार उन्हे हासिल हुई यह दोहरी हार उस राज्य के भविष्य को लेकर कई तरह के सवाल खड़े करती है जिसके कि वह लगभग तीन वर्षो की अवधि तक मुख्यमंत्री रहे और एक मुख्यमंत्री के रूप में पहाड़ो के विकास व पहाड़ी अस्मिता को सामने लाने की बात जिस अन्दाज में उन्होने सार्वजनिक मंचो से की। सत्ता के शीर्ष पर रहते हुए हरीश रावत से भी गलतियाॅ हुई होंगी और इस तथ्य से भी इनकार नही किया जा सकता कि ‘इकला चलो’ वाले अन्दाज में काम कर रहे हरीश रावत की जिद के चलते ही काॅग्रेस कुछ मोर्चो पर कमजोर हुई लेकिन यह सवाल अपनी जगह कायम है कि क्या दो-दो जगहों से एक साथ चुनाव हारने के बाद हरीश रावत जनता के नेता माने जायेंगे या नही और आने वाले कल में वह काॅग्रेस के चुनावी चेहरें होंगे या नहीं ? अगर हरीश रावत की मनोस्थिति पर गौर करे तो एक बड़ी हार के बावजूद सामने आये उनके संयमित बयान व उनके वर्तमान आवास पर लगा मुलाकातियों का मजमा यह साबित करता है कि उनका जलवा अभी खत्म नही हुआ है और वह एक योद्धा वाले अन्दाज में आगामी रण की तैयारी में जुट गये है लेकिन हारे हुऐ सिपाहियों की फौज को लामबन्द कर उन्हे एक लम्बे युद्ध के लिऐ तैयार करना और मतलब परस्त हो चुकी राजनीति में अपनी जरूरत के चेहरे तलाश करना वाकई में उनके लिये कठिन होगा। यह ठीक है कि उनके इर्द-गिर्द अक्सर नजर आने वाले उनके समर्पित समर्थक संकट की इस घड़ी में एक दीवार की तरह अपने नेता के साथ खड़े है और एक बड़ी चुनावी हार के बावजूद काॅग्रेस हाईकमान ने अभी तक हरीश रावत की नेतृत्व क्षमता पर सवाल खड़े नही किये है लेकिन यह देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि प्रदेश में बनने वाली भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार उन तमाम फैसलो को किस तरह लेती है जो कि हरीश रावत सरकार ने इन पिछले तीन वर्षो में लिये थे और जनमत संग्रह के दौरान हरीश रावत सरकार के विरोध में अपने मताधिकार का प्रयोग करने वाली जनता व्यापक जनहित से जुड़े मुद्दो पर प्रदेश की वर्तमान सरकार का किस अन्दाज में प्रतिकार करती है। इस तथ्य को नकारा नही जा सकता कि पहाड़ी पृष्ठभूमि से राजनीति में आये हरीश रावत ने अपनी मेहनत व सेवा भावना के चलते यह मुकाम हासिल किया और उनके राजनैतिक जीवन में लगने वाले कई किन्तु-परन्तुओं के बावजूद वह आजीवन काॅग्रेस के सच्चे सिपाही की तरह लोकतान्त्रिक मूल्यों की लड़ाई लड़ते रहे लेकिन एक मुख्यमंत्री के रूप में इन तीन वर्षो का अनुभव उन्हे बहुत सी नसीहतें दे गया और अपने इन तीन वर्षो के कार्यकाल में उन्होने बहुत नजदीक से यह अनुभव भी किया कि राज्य गठन के इन सोलह-सत्रह वर्षो में एक आम पहाड़ी की सोच में किस तरह बदलाव आया है। हो सकता है कि इस चुनावी हार के बाद हरीश रावत राजनीति के मोर्चे पर इतने सक्रिय न रह पाये कि वह रात-दिन एक कर चुनाव प्रचार के सिलसिले में पहाड़ या देहात की धूल फॅाकते रहे और यह भी हो सकता है कि अगले दो वर्षो में मतदाताओ को अपनी भूल का अहसास हो जिसके चलते टीम हरीश रावत आगामी लोकसभा चुनावों में इस हार की टीस को मिटा सके लेकिन सवाल यह है कि क्या हरीश रावत की व्यक्तिगत् हार या जीत के सहारें उत्तराखण्ड का राजनैतिक भविष्य तय होगा और सत्ता पक्ष से बगावत कर विपक्ष में शामिल होने वाले बागी विधायक उत्तराखण्ड के इतिहास की नयी इबादत लिखेंगे। हम यह तो नही कहते कि विधानसभा चुनावों में काॅग्रेस को मिली यह करारी हार उन लोगो के लिऐ एक राजनैतिक तमाचा होगी जो दलीय निष्ठा या राजनैतिक शुचिता की बात करते है और भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष या फिर इस पहाड़ी राज्य में विकास की बयार जिनका एकमात्र उद्देश्य है लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि इस चुनाव में बागी विधायको व ठीक चुनावी मौसम में सत्ता पक्ष छोड़कर भाजपा में शामिल हुऐ नेताओ को मिली भारी जीत उत्तराखण्ड की राजनीति में एक खास कार्य-संस्कृति को जन्म देगी और कोई बड़ा आश्चर्य नही होगा अगर आने वाले सालो में यह एक परम्परा ही न बन जाय। हाॅलाकि सत्तापक्ष को मिला पूर्ण बहुमत और मन्त्रीमण्डल के गठन को लेकर दिख रही खामोश सी खीचताान यह इशारा कर रही है कि इस बार अस्तित्व में आने वाली सरकार को काम करने के लिऐ सार्थक माहौल मिलेगा और बिना जरूरत के थोपे जाने वाले उपचुनावों की बन्दिशो से भी राज्य की जनता को मुक्ति मिलेगी लेकिन यह भी खुद में एक बड़ा सवाल है कि क्या राज्य में गठित होने वाली जनहितकारी सरकार अपने रोजमर्रा के खर्च के लिऐ केन्द्र सरकार से अनुदान जुटाने में सफल रहेगी। यह ठीक है कि अपने चुनावी सम्बोधनो में मोदी व अमित शाह की जोड़ी ने इस प्रदेश की जनता को डबल इंजन का आश्वासन देकर हर तरीके से मदद किये जाने को लेकर अश्वस्त किया है लेकिन यह सवाल अपनी जगह कायम है कि क्या नई सरकार का मुखिया उन तमाम आश्वासनों को पूरा कर पायेगा जो कि पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत द्वारा अपनी चुनावी घोषणाओं के माध्यम से दिये गये थे। ध्यान देने योग्य विषय है कि प्रदेश में सिर्फ सरकार बदली है आम आदमी की मानसिकता नही और यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि पूर्ववर्ती सरकारों ने मुख्यमंत्री राहत कोष समेत तमाम तरह को इमदादें बाॅट कर आने वाली सरकार के लिऐ संकट के नये पैमाने खडे़ कर रखे है। हो सकता है कि नवगठित सरकार हाल-फिलहाल इस तरह की व्यवस्थाओं पर रोक लगा दे और अघोषित आर्थिक तंगी के नाम पर राज्य सरकार के तमाम जरूरी खर्चो के अलावा अन्य सभी व्ययो में कटौती की कौंशिश की जाय लेकिन अन्ततोगत्वा लोकसभा चुनावों में एक बार फिर पाॅचो लोकसभा सीटे हासिल करने के लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रही भाजपा को इस प्रकार के सभी चितपरिचित दाॅवो को आजमाना ही होगा और उस समय हरीश रावत बहुत याद आयेंगे। इसलिऐ अभी यह कहना तो जल्दबाजी होगी कि इस चुनावी हार को हरीश रावत की राजनैतिक पारी की हार समझा जा सकता है लेकिन काॅग्रेस वाकई में संकट के दौर से गुजर रही है और इन कठिन परिस्थितियों में इसे एकजुट रखने व चुनावी मोर्चे पर फिर खड़ा करने के लिऐ अथक परिश्रम की आवश्यकता अभी से महसूस की जा रही है।

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