Saturday, March 25, 2017

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  • सभी देश वासियो को जोखिम न्यूज़ की तरफ से गड्तंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाये - आपका संजीव पन्त

महिला सशक्तिकरण के नारे के साथ

विश्व महिला दिवस पर विशेष।
वैश्विक स्तर पर मौजूद संसाधनो व सत्ता, के आधे हिस्से पर दावेदारी के साथ मनाया जाने वाला विश्व महिला दिवस, अब कुछ सेमिनारों व शक्ति प्रदर्शन का आधार मानी जाने वाली महिला रैलियों तक सीमित होकर रह गया है तथा हर महिला को शिक्षित कर रोजगार करने लायक बनाने व कन्या भ्रूण हत्या पर रोक लगाये जाने के वादे के साथ महिला सशक्तिकरण व महिला सुरक्षा को ध्यान में रखते हुऐ कई तरह के कानून बनाने वाली सरकारी व्यवस्था अपने ही नियमो व कानूनों का अनुपालन करने में असफल नजर आ रही है। यह ठीक है कि भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था के अन्र्तगत् अपने अधिकारो के लिऐ संघर्ष कर रहे महिला संगठनो नेेे सड़को पर प्रदर्शन कर या फिर अन्य माध्यमों से राजनैतिक दलो पर दबाव बना कई नये नियमों व कानूनों को अस्तित्व में लाकर महिलाओं की ताकत को बढ़ाने का प्रयास किया है और महिलाओं में आयी चेतना व जागरूकता के चलते कुछ मामलों में महिलाओं की स्थिति में सुधार भी देखा गया है लेकिन महिलाओं के खिलाफ होने वाले आर्थिक व सामाजिक अपराधो के प्रति जनता व व्यवस्था के शीर्ष पर बैठी राजनैतिक व गैरराजनैतिक ताकतों के नजरियें तथा महिलाओं को ज्यादा आजादी देने जाने के नाम पर समाज में लगातार बढ़ती दिख रही अराजकता को देखते हुऐ यह समझ में नही आ रहा है कि तथाकथित आधुनिकता व आजादी के नाम पर हम अपने देश व समाज को कहाॅ ले जा रहे है और महिलाओं के खिलाफ होने वाले तमाम तरह के सामाजिक अपराधो व उत्पीड़न की मानसिकता से निपटने का कारगर तरीका क्या है? यह स्वयं में एक बड़ा गम्भीर प्रश्न है कि क्या महिलाओं को आजादी दिये जाने के नाम पर उन्हे खुलेआम सिगरेट या शराब का सेवन करने की छूट होनी चाहिऐं क्योंकि भारतीय समाज में पुरूषों या युवाओं का खुलेआम इस तरह की अराजकता करना फैश्न का एक हिस्सा माना जाता है या फिर युवा स्त्री-पुरूषों के बीच पूर्णतः आपसी राजमन्दी से बनने वाले शारीरिक सम्बन्धो को सिर्फ इसलिऐं बलात्कार का दर्जा दिया जाना चाहिऐं क्योंकि एक अन्तराल तक इस तरह के सम्बन्धो में रहने वाली महिला से विवाह करने में पुरूष द्वारा असमर्थता जतायी गई है। हो सकता है कि हमारे द्वारा उठाये गये कुछ सवाल या मुद्दे खुद को प्रगतिवादी कहलाने वाले महिला संगठनो द्वारा पसन्द न किये जाते हो या फिर महिला सशक्तिकरण के नारे को अपनी राजनैतिक प्रगति की सीढ़ी बना आगे बढ़ने के लिऐ जनता को उद्देलित करने वाले कुछ राजनैतिक समूह हमारी बिना किसी लाग लपेट के कहीं जाने वाली बातो से इत्तेफाक न रखते हो लेकिन इस तथ्य को नकारा नही जा सकता कि दशकों से किये जा रहे महिला दिवस के आयोजनों व महिलाओं को केन्द्र में रखकर बनायी जाने वाली तमाम योजनाओं की घोषणाओं के बावजूद देश में महिलाओं की आर्थिक व सामाजिक स्थिति में अपेक्षाकृत सुधार नही देखा गया है जबकि फैशन की दौड़ में सरपट भागी जा रही हमारी युवा पीढ़ी ‘इस आजादी’ के मायने ही गलत समझ रही है और वैक्तिक स्वतन्त्रता को सामाजिक सरोकारों से जोड़कर हम अपने आदर्शो व समाज को एकजुट करने वाले बन्धनो का बंटाधार करने में जुटे है।

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