कैशलैश व्यवस्था या गरीबमार | Jokhim News

Friday, June 23, 2017

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कैशलैश व्यवस्था या गरीबमार

आम आदमी पर लगातार बढ़ रहा कर का बोझ चिन्ताजनक
नोटबन्दी के बाद जनचर्चाओं में आये कैशलैस के नारे को परवान चढ़ाने की नीयत से मोदी सरकार द्वारा बैंको से नकद धन की निकासी व जमा करने पर टैक्स वसूलने का निर्णय लिया गया है। सरकार का मानना है कि इस तरह न सिर्फ नकदी के अवैध लेनदेन पर रोक लगेगी बल्कि घाटे में जा रही बैंको की अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिऐ आय के नये श्रोत भी सामने आयेंगे। हो सकता है कि सरकार की सोच ठीक हो और वह साफ नीयत से नकदी के लेनदेन पर रोक लगाते हुए व्यवस्था में पारदर्शिता लाने की कोशिंश कर रही हो लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार ने इतना बड़ा फैसला लेने से पहले पूरी तैयारी कर ली है या फिर ठीक नोटबन्दी की तर्ज पर कई तरह के किन्तु-परन्तु के साथ इन नियमों में भी बदलाव किये जाते रहेंगे। भारत की आम जनता, जिसमें बड़ी संख्या में घरेलू व कामकाजी महिलाऐं शामिल हैं, अपनी सामान्य दिनचर्या में नकदी के लेनदेन व नकद धनराशि सहेजकर रखन पर यकींन करती है, शायद यहीं कारण है कि मोदी सरकार द्वारा एकाएक हजार व पाॅच सौ का नोट बन्द कर देने पर न सिर्फ बैंको के बाहर जनसामान्य की बड़ी-बड़ी भीड़ दिखाई दी बल्कि सरकार द्वारा पूर्व में छापे गये हजार-पाॅच सौ के लगभग सभी नोट बाजरिया बैंक सरकार के पास वापस आ गये और सरकार सिवाय बयानबाजी के कुछ नही कर सकीं। अपनी इस हार पर खिसियायें सरकारी तन्त्र ने पहले तो अपने पुराने नोट बदलने के लिऐ लाइनों पर लगे आम आदमी की मजाक उड़ायी और फिर नियमों में बार-बार बदलाव कर यह कोंशिश की कि आम आदमी को दुश्वारियों का सामना करना पडे लेकिन इस सारी जद्दोजहद के बावजूद भी जब सरकार के पास अपनी उपलब्धि के रूप में कुछ नही बचा तो सरकारी तन्त्र ने आॅकड़ों में हेरफेर कर नोटबन्दी के तमाम फायदें बताते हुऐ यह साबित करने की कोशिश की कि अपने इस निर्णय के माध्यम से वह व्यवस्था में एक बड़ा व क्रान्तिकारी बदलाव लाने की तैयारी कर रही है। बैंको में लगी लम्बी लाइन को अपनी एक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करने वाली सरकार ने नोटबन्दी को लेकर बढ़ते दिख रहे जनाक्रोश को देखते हुऐ कैशलेस का नारा दिया और जनता को यह समझाने की कोशिंश की गयी कि अगर वह चाहे तो बिना किसी सरदर्द के नकद नोटो के लेनदेन के बिना भी अपना काम चला सकती है लेकिन इस व्यवस्था के उपयोग में खाते से पैसो का स्थानांतरण करने के लिए जिम्मेदार कम्पनियों द्वारा प्रत्येक लेनदेन पर शुल्क लेने की वजह से यह व्यवस्था परवान नहीं चढ़ पायी और न ही सरकार आम आदमी को यह समझाने में सफल रही कि नैट बैंकिग आदि व्यवस्थाओं के क्या फायदें है ? बैंको में बढ़ रहे काम के बोझ के खिलाफ संगठित श्रम शक्ति के रूप में बैंक कर्मचारियों का आन्दोलनात्मक रूख देखते हुऐ सरकार ने बैंको में धन जमा करने अथवा निकासी को लेकर कई तरह के नये नियम बनाये और जमा करने व निकासी की सीमा निर्धारित करने के साथ ही साथ इस संदर्भ में संख्यात्मक निर्धारण के बाद होने वाले लेनदेन पर सरकार की ओर से शुल्क लिया जाना तय हुआ। हो सकता है कि यह तरीका बैंको की आय में बढ़ोत्तरी करते हुऐ उनकी माली हालत सुधारने तथा आन्दोलनरत् बैंक कर्मियों का आक्रोश थामने के मामले में कारगर साबित हो और बैंको के माध्यम से किया जाने वाला लेनदेन आम आदमी के जीवन में भी एक पारदर्शिता लाये लेकिन अगर आम आदमी के नजरियें से देखा जाय तो बैंको के माध्यम से किया जाने वाला यह लेनदेन न सिर्फ उसकी निजी जिन्दगी में सरकारी ताकझाक का एक तरीका है बल्कि बैंको में नकद राशि की जमा व निकासी पर सरकारी शुल्क थोपने से आम आदमी की परेशानियाॅ बढ़ने ही वाली है क्यांेकि अगर वह अपने लेनदेन को सीमित करते हुए एक साथ ज्यादा नकदी बैंक से निकलता है तो उसे फिजूलखर्ची का डर बना रहता है जबकि बैंको के माध्यम से लेनदेन पर उसे अपने खाते के हैक होेने, नैटवर्क की समस्या या फिर अतिरिक्त करों के बोझ से जूझना पड़ता है। हालातों के मद्देनजर सरकारी नियम व कायदें कानून आम आदमी पर भारी पढ़ते नजर आ रहे है और अगर वह इन नियमों का अनुपालन करता है तो अपनी आय पर एक बार ईमानदारी से कर चुका दिये जाने के बावजूद उसे अपने रोजमर्रा के जीवन में कई तरह के करो से जूझना पड़ सकता है जबकि इन नियमों का अनुपालन न करना उसे जेल तक पहुॅचा सकता है। काबिलेगौर है कि यह समस्या देश के उस मध्यम वर्ग के लिऐ काफी गम्भीर है जो अपने निजी जीवन में नेताओं से बहुत कुछ अपेक्षा रखने के बावजूद सत्तापक्ष से ईमानदारी व बेदाग दामन की उम्मीद करता है और अन्ना आन्दोलन जैसे जनहित की बात करने वाले सामाजिक व गैर-राजनैतिक प्रकरणों में जिस वर्ग की भागीदारी हमेशा बनी रहती है। यह तथ्य किसी से छुपा नही है कि राजनीति में होने वाले तमाम तरह के व बेहिसाब खर्चो को देखते हुऐ भ्रष्टाचार राजनेताअेां के जीवन का एक अहम् अंग माना जाता है और जन सामान्य के बीच नेताओं को लेकर कई तरह के किस्से-कहानियों को चर्चा का विषय बनाने तथा आम आदमी को इस राजनैतिक भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने के लिऐ तैयार करने में देश के मध्यम वर्ग का बड़ा हाथ रहा है लेकिन इस बार यही मध्यम वर्ग केन्द्र सरकार के निशाने पर है और केन्द्र सरकार के आधीन तमाम सरकारी ऐजेन्सियाॅ व स्थानीय निकाय यह साबित करने में जुटे हुऐ है कि ‘असली चोर’ यही मध्यम वर्ग है जिसने अपनी आय का एक हिस्सा गलत तरीके के कमाने व खपाने के जरिये खोजे है। अगर सरकारी संस्थानों में कार्यरत् बाबू तबके की सम्पत्तियों का ब्योरा व उनकी शाह खर्ची के किस्से जुटाने शुरू किये जाय तो पहली नजर में यह तथ्य गलत प्रतीत नही होता लेकिन गम्भीरता से गौर करने पर यह पता चलता है कि देश व समाज के निर्माण में सक्रिय भागीदारी निभाने वाला यहीं वह तबका है जो बिना किसी हानि-लाभ के देश के निर्बल वर्ग व सरकार चलाने वाले महकमों के बीच की सीढ़ी बन दशकों से अपना फर्ज अदा कर रहा है और यह तय है कि सरकार बनने व गिराने के खेल में सक्रिय भागीदारी निभाने वाला तथा आम जनमानस के बीच सरकार की लोकप्रियता अथवा जनविरोधी होने का संदेश देने वाला यह तबका देश की राजनीति में बड़े बदलाव लाने की ताकत रखता है। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि हिन्दुत्व के नाम पर मोदी को सत्ता के उच्च सदनो तक पहुंचाने में इस तबके का बड़ा योगदान है तो आम आदमी पार्टी के अस्तित्व में आने या फिर कांग्रेस के राजनैतिक रूप से कमजोर होने के लिऐ भी यहीं तबका जिम्मेदार है। इन हालातों में मोदी सरकार के यह सुधारात्मक आदेश तथा लगातार बढ़ रही महंगाई किस हद तक आम आदमी को संतुष्ट करते हुऐ मतदाता को मोदी व भाजपा के पक्ष में बनाये रखते है, कहां नही जा सकता।

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