Thursday, April 27, 2017

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जवाबदेही से दूर

नौकरशाहों व जनप्रतिनिधियों में तेजी से बढ़ रहा है आर्थिक कदाचार
नौकरशाही व राजनेताओं के बीच बेहतर तालमेल की खबरें अक्सर आम आदमी के लिऐ परेशान का सबब बनती है और आज की भाषा में इसे राजकाज पर हावी नौकरशाही का नाम दिया जाता है क्योंकि शासनतंत्र से जुड़े अधिकांश मामलों में यह देखा जाता है कि अफसर सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेताओं व मन्त्रियों को नकारते हुऐ अपनी मनमानी करने लगते है लेकिन इधर बिहार से जुड़े ताजा मामले में यह शायद पहली बार है जब नौकरशाहों की टोली ने खुलेआम सरकार में बैठे नेताओं व मन्त्रियों के फैसलों की अवमानना का ऐलान किया हैं यह भी शायद पहली बार है जब नौकरशाही व राजनेता खुलकर एक दूसरे के आमने-सामने आते दिख रहे है और अपने एक सहकर्मी की गिरफ्तारी से बोंखलायी आईएस लाॅबी ने नेताओं व सरकार द्वारा मौखिक तौर पर दिये फैसले न मानने की घोषणा की हैं । लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के तहत जनता द्वारा चुनी गयी सरकार द्वारा लिये गये फैसलों का क्रियान्वयन करने की जिम्मेदारी नौकरशाहों के है और इसके लिऐ सरकारी तंत्र में एक लंबी चैड़ी व्यवस्था करते हुऐ विभिन्न स्तर पर कर्मचारियों को अमला बनाया गया है जो कि शीर्ष स्तर पर सरकारी बाबू अर्थात शासन तंत्र के सचिवों या आईएस लाॅबी द्वारा संचालित किया जाता है। हांलाकि किसी भी व्यवस्था या कानून में यह उल्लेख नही है कि शासन स्तर पर लिये जाने वाले फैसलों के क्रियान्वयन के लिऐ जिम्मेदार बाबू लाॅबी (शासन स्तरीय सचिव) का आईएस होना ही जरूरी है लेकिन आईएस को राष्ट्रीय स्तर पर सर्वोच्च सेवा का दर्जा देने वाले सरकारी तंत्र ने यह परिपाटी डाल दी है। और इन पिछले पैंसठ-सत्तर वर्षों में आईएस कैडर को इतना मजबूत कर दिया गया है कि इस सेवा के तहत चयनित होने वाला कर्मचारी अगर स्वेच्छा से घर न बैठे तो अधिकांश मामलों में उसे सेवानिवृत्ति के योग्य ही नही माना जाता। सरकारी स्तर पर बनने वाले विभिन्न आयोग, अर्द्धसरकारी संगठन व स्वैच्छिक संस्थाऐं अवकाश प्राप्ति के बाद इनकी ऐशगाह है तो सरकारी सेवाओं में रहते हुऐ इनके संसाधनों का उपयोग करना भी इन्हें अच्छी तरह आता है। शायद यहीं वजह है कि सरकारी अफसरों की यह फौज अब नेताओं के दिमाग में खटकने लगी है और पांच सालों के लिऐ जनता के बीच से चुनकर आने वाले जनप्रतिनिधियों को यह लगने लगा है कि संविधान द्वारा प्रदत्त तमाम शक्तियों से आच्छादित होने के बावजूद कई मामलों में उनकी ताकत इन सरकारी बाबुओं से कम है। इन स्थितियों में संवैधानिक ताकतों का कार्यपालिका से टकराना तथा मौका-बमौका कार्यपालिका पर शासनतंत्र के ऊपर हावी होने के आरोंप लगना लाज़मी है। हांलाकि स्थितियां पहले इतनी विकट नही थी क्योंकि उस दौर में राजनीति व्यवसाय न होकर सेवा की भावना थी और सेवा भाव से राजनीति में आने वाले नेताओं का आत्मबल व राजनैतिक चरित्र इतना ऊंचा था कि किसी भी नौकरशाह की उसे सीधे जवाब देने या फिर सरकारी तंत्र की नाक के नीचे एकाएक बड़ी गड़बड़ करने की हिम्मत नहीं होती थी। ऐसा नही है कि उस दौर में राजनैतिक भ्रष्टाचार बिल्कुल नही था या फिर चुनाव मैदान में उतरने वाले नेता ‘घर फूंक तमाशा देख‘ वाले अंदाज में अपने चुनावी व राजनैतिक खर्चे पूरे करते थे लेकिन इतना जरूर है कि इस दौर में जनता के बीच से चुना गया जनप्रतिनिधि व सरकार चलाने को जिम्मेदार मंत्री आदि नेता सीधे तौर पर किसी भी तरह के भ्रष्टाचार में शामिल होने या फिर अधिकारियों से लेन-देन करने से बचने का प्रयास करते थे। इस दौर में कार्यकर्ताओं की बहुत पूछ थी क्योंकि अपने तमाम छोटे-बड़े काम अधिकारियों के माध्यम से कराने के लिऐ तमाम नेता व मंत्री इन्हीं कार्यकर्ताओं के नाम का सहारा लेते थे और अधिकारी वर्ग भी संगठन अथवा सरकार से जुड़े कार्यकर्ताओं का काम बिना किसी ना नुकर के कर देते थे। शायद यहीं वजह ळै कि इस दौर में लगभग हर राजनैतिक दल के पास संगठन के उद्देश्यों हेतु समर्पित कार्यकर्ताओं की एक फौज होती थी और संगठन के विस्तार या चुनावी जलसों आदि के लिऐ भी नेताओं को बहुत प्रयास नही करना पड़ता था। इसके बाद राजनीति में उच्च पदों पर आसीन चरित्रों ने अपने नजदीकी या घनिष्ठ सम्बन्धियों को अपना निजी सचिव या सलाहकार बनाना शुरू किया तथा कई तरह के आर्थिक लेनदेन व अन्य सहमति निजी सचिव व सलाहकार के माध्यम से की जाने लगी लेकिन कई तरह के किन्तु-परन्तु होने के बावजूद आर्थिक भ्रष्टाचार के मामले अधिकारी व जन-प्रतिनिधि के बीच एक पर्दा इस दौर में भी बना रहा और यह माना गया कि अपने अधिनस्थ कर्मचारी या निकटवर्ती सहयोगी के माध्यम से गलत या सही काम करने वाले हमारे जनप्रतिनिधियों व सरकार के जिम्मेदार पदों पर बैठे नेताओं व अधिकारियों के बीच एक स्वघोषित अनुशासन बना हुआ है किन्तु इधर पिछले तीन दशकों के भीतर उदारवाद की खड़खड़ाहट ज्यों-ज्यों हमारे देश में तेज हुई त्यों-त्यों नेता व नौकरशाह अधिक भ्रष्ट व सस्ते नजर आने लगे। गैर सरकारी लेनदेन एवं कदाचार के मामलों में मध्यस्थों की जरूरतें समाप्त हो गयी और वरीष्ठ नौकरशाह व सत्ता के शीर्ष पदों पर बैठे नेता ‘हमाम में सब नंगे वाले अंदाज में खुलकर अपनी जरूरतें व हिस्सेदारी की मांग एक दूसरे के सामने रखने लगे। यह एक ऐसा दौर आया जिसमें भ्रष्टाचार को भारत जैसे देशों में जीवन का आवश्यक अंग मान लिया गया तथा रिश्वत देकर काम हो जाना ईमानदारी की परिभाषा में शामिल हो गया लेकिन इस दौर में भी गलत और सही के बीच एक पारदर्शिता देखी गयी तथा सही या गलत का यही लिहाज नौकरशाह व राजनेताओं के बीच के तालमेल को बेहतर बनाये रहा। इस दौर में आर्थिक घोटाले, भ्रष्टाचार और सरकारी धन की लूट तो खूब हुई लेकिन इस लूट को जायज व जरूरी बताने के लिऐ विकास कार्यों को भी तेजी से अंजाम दिया गया। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि इस दौरान देश ने आर्थिक प्रगति खूब की और आम आदमी की जीवनशैली में भी सुधार देखा गया लेकिन नौकरशाह व जनप्रतिनिधि की यह नजदीकी कालान्तर में आम आदमी को खलने लगी क्योंकि कमाई के हिसाब से तय होने वाली ट्रांसफर व पोस्ंटग की दरो ने शासनतंत्र को एक बाजार बना दिया और इस खुले बाजार में ‘लूट की खुली छूट‘ का हल्ला कुछ ऐसा मचा कि बेईमानों की बन आई। राजनैतिक के स्थान पर पूर्णतः भुगतान पर आधारित हो चुका चुनावी कार्यकर्ता अपने योगदान के बदले सत्ता में भागीदारी मांगने लगा और सत्तापक्ष के कार्यकर्ताओं को शासन व अधिकारियों द्वारा तवज्जों दिये जाने की बात खुले मंच से होने लगी। इन हालातों में कुछ लोग इस बेईमानी की इंतहा के विरोध में भी लामबंद होने लगे और जनवादी चिन्तकों के संघर्षों के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आये ‘सूचना का अधिकार‘ जैसे काूनन भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में नेता व अधिकारियों की जवाबदेही व जिम्मेदारी तय करने के लिऐ दबाव डालने लगे। नतीजतन नेता व अधिकारी अपने अधिनस्थों पर दबाव डालते हुये मौखिक आदेशों पर गलत कार्यो को अंजाम देने लगे और नतीजे अधिकारियों व नेताओं की आपसी तानातनी या फिर नौकरशाही पर बेलगाम होने के आरोंपो के रूप में हमारे सामने है। अब यह तय हमने करना है कि यहां राजनेता ज्यादा गलत है या फिर नौकरशाह और अगर गंभीरता से देखा जाय तो इस सम्पूर्ण व्यवस्था में ही कई कमियां है क्योंकि जनतंत्र के अभिन्न अंग के रूप में मतदान के द्वारा सरकार बनाने व अपना प्रतिनिधि चुनने की ताकत तो दी गयी और हमने भी अपनी इस ताकत का भरपूर इस्तेमाल करते हुऐ कुछ चुनिन्दा लोगों को सरकार चलाने की जिम्मेदारी भी दी लेकिन चुने जाने के बाद जनप्रतिनिधियों व नौकरशाहों की जवाबदेही तय करने का अधिकार हमें नही दिया गया और अगर गंभीरता से गौर करें तो बिहार से लेकर दिल्ली तक तमाम तरह की उठापटक के पीछे नेताओं व नौकरशाहों की जवाबदेही तय न होना ही सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार का प्रमुख कारण है।

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