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Friday, July 21, 2017

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एक नई मुसीबत

ट्रम्प के बयानो व राजनैतिक कुटिलता का परिणाम है अमेरिका व अन्य यूरोपीय देशों में हो रही जातीय हिंसा।
अमेरिका के कन्सास शहर में एक नेवी के अवकाश प्राप्त कर्मचारी द्वारा बत्तीस वर्षीय भारतीय इंजीनियर की गोली मारकर की गयी हत्या को अमेरिका के नवनियुक्त राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के भड़काऊ भाषणों का असर माना जाना चाहिऐं या नही, यह एक बहस का मुद्दा हो सकता है क्योंकि इस पूरे घटनाक्रम में जहां श्रीनिवास कुचिभोतला की मृत्यु हो गयी वहीे उनके सहकर्मी व दोस्त आलोक मदासनी भी इस घटनाक्रम में बुरी तरह घायल हो गये लेकिन इस सम्पूर्ण घटनाक्रम का एक पहलू यह भी है कि दोनों भारतीयों को अपराधी की गोलाबारी से बचाने में अमेरिका का ही अन्य मूल निवासी चैबीस वर्षीय इयान ग्रिलोट भी घायल हो गया और उसने हमलावर का विरोध करते हुऐ कहा कि हमें इनपर गर्व हैं। अमेरिका जैसे आर्थिक रूप से सम्पन्न राष्ट्र के मूल निवासियों में अपने रोजगार व संसाधनों के उपयोग को लेकर उपजी असुरक्षा की इस भावना ने यूरोपीय देशों में रह रहे हजारों-हजार भारतीयों के जीवन को संकट में डालते हुऐ उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि उन्हें अब और आगे इस असुरक्षा की भावना मेें काम करना भी चाहिऐं या नही। अगर आगे भी असुरक्षा की यह भावना बढ़ती है तथा भारत व अन्य मुल्कों से जाकर यूरोपीय देशों की आर्थिक प्रगति में हाथ बंटा रहे प्रवासियों पर हमले जारी रहते है तो इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि सम्पूर्ण वैश्विक स्तर पर प्रतिभाओं व हुनरमंदों का एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर पलायन होगा और इस पलायन का असर सम्पूर्ण विश्व की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि अमेरिका समेत तमाम यूरोपीय देशों में काम करने वाले भारतीय व अन्य ऐशियाई देशों के पेशावर इन यूरोपीय देशों से मोटी कमाई कर अपने मुल्कों की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने में तो मदद करते ही है साथ ही साथ इन हुनरमंदो के अमेरिका समेत अन्य विदेशी मुल्कों में बस जाने के चलते इनके अपने मुल्को में इनसे कम हुनरमंदो को भी ठीक-ठाक रोजगार मिला हुआ है और अगर किसी सामूहिक हमले या फसाद की डर से इन प्रतिभाओं की अपने मूल स्थान की ओर वापसी होती है तो थोड़ी बहुत उठापटक के बाद यह प्रतिभाऐं अपने-अपने राष्ट्रोे में भी अपने लिऐ जगह बना लेगी तथा अपनी प्रतिभा व हुनर के बल पर विदेशी मुल्को मेें जा बसे यह तमाम हुनरमंद देर-सबेर यह हालात पैदा कर देंगे कि इनके नये कार्यक्षेत्रों में रोजगार के नये अवसर पैदा हो व इनके मुल्क आर्थिक मजबूती प्राप्त करें लेकिन अगर इन तमाम प्रतिभाओं ने एक साथ अमेरिका व यूरोपीय देशों को छोड़ने का फैसला ले लिया तो इन यूरोपीय मुल्कों की तमाम व्यवस्थाऐं डांवाडोल हो उठेगी। यूरोपीय मुल्कों के कानूनविद्, सरकारी महकमें व खुद डोनाल्ड ट्रम्प हालातों की गंभीरता को समझ रहे है और शायद यहीं वजह है कि कुर्सी संभालने के बाद ट्रम्प की उग्रता कहीं भी प्रदर्शित नही हो रही है लेकिन अपनी तमाम समस्याओं के लिऐ विदेशों से आकर अमेरिका व अन्य यूरोपीय मुल्कों में बस रहे ऐशियाई देशों के नागरिकों को ही जिम्मेदार मान बैठे कुछ स्थानीय बाशिन्दों को यह सबकुछ समझाना अब इतना आसान नही है क्यांकि ट्रम्प जैसे कई नेताओं ने एक राजनैतिक विचारधारा के रूप में इस तरह के बयानो को प्रमुखता से देकर अपने राजनैतिक फायदे के लिऐ इन मुल्को के स्थानीय बाशिन्दों को भड़काया है। इस समस्या का वास्तविक समाधान क्या निकलेगा तथा अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में डोनाल्ड ट्रम्प के चयन व विरोध के घटनाक्रमों के बीच उनके सत्ता संभालने के बाद, पहले घटनाक्रम के रूप में सामने आये इस हत्या के मामले पर उनकी असल प्रतिक्रिया क्या होगी, यह तो पता नही लेकिन इतना तय है कि इस सम्पूर्ण घटनाक्रम के बाद भारत में तेजी से बढ़ रहे डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों के समर्थको की संख्या में बडी कमी महसूस की जायेगी तथा भारत की लोकतात्रिक व्यवस्थाओं पर विश्वास करने वाले राजनेता व सत्ता के शीर्ष पर बैठे जनप्रतिनिधि एक बार फिर हालातों पर गौर करते हुऐ अपने छोटे राजनैतिक स्वार्थो को पूरा करने के लिऐ खेले जाने वाले क्षेत्रवाद, जातिवाद व भाषावाद के ‘बांटो और राज करो‘ के सिद्धान्त पर पुर्नविचार करेंगे।

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