सावधानी हटी तो दुघर्टना घटी | Jokhim News

Monday, December 11, 2017

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सावधानी हटी तो दुघर्टना घटी

शिवरात्रि पर विशेष।
धर्म और आस्था मानवीय समाज के ऐसे पहलू है जो सार्वजनिक रूप से चर्चा के दौरान भी नितांत निजी लगते है तथा ऐसा प्रतीत होता है कि इस तरह की चर्चाओं के माध्यम से कुछ लोगो पर व्यक्तिगत् रूप से प्रहार किया जा रहा है। हाॅलाकि हमारा उद्देश्य कतई यह नही होता और न ही हम किसी धर्म अथवा जाति को व्यक्तिगत् रूप से निशाना बनाते हुऐ इस तरह के सवालो को उठाने की कोशिश करते है लेकिन जब धर्म व आस्था का सैलाब लोगो के मन मन्दिर से निकलकर सड़को पर अतिक्रमण करने लगता है और धार्मिक भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिऐ शक्ति प्रदर्शन को जीवन का अहम् हिस्सा मान लिया जाता है तो यह कहना पड़ता है कि कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ जरूर है। मौका शिवरात्रि का है तो बात कावड़ यात्रा से शुरू करने की कोशिश करते हुऐ हम यह अनुमान लगाते है कि गंगाजल के महत्व व पवित्रता को ध्यान में रखते हुऐ संसाधन विहीन हमारे पूर्वजो ने अपने दैनिक जीवन में उपयोग व पूजापाठ के लिऐ गंगाजल लाने हेतु कावड़ की व्यवस्था का प्रचलन किया होगा तथा इस बहाने देश-विदेश में धर्म के प्रति सम्मान व गंगा समेत तमाम नदियों की पवित्रता व स्वच्छता बनाये रखने का सन्देश देते हुऐ धर्मप्रेमियों व धर्मगुरूओ ने इस व्यवस्था केा अपनाया होगा लेकिन इधर बीते दो-तीन दशको में कावड़ यात्रा के दौरान होने वाली अभद्रता तथा डाक कावड़ के नाम यतायात के नियतों को धता बताते हुऐ अराजकता फेलाने की कोशिश को देखते हुऐ ऐसा प्रतीत हेाता है कि कुछ लोग निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिऐ इस तरह की अव्यवस्था व अन्धविश्वास को बढ़ावा देने में लगे है। सावन की शिवरात्रि के बाद अब इस शिव रात्रि के मौके पर भी कावड़ को बढ़ावा देने की कोशिशें शुरू हो गयी है और कन्धे पर कावड़ रखकर सड़क घेरकर चलने की कोशिशें करते कावड़ियों को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि उनका ध्यान भोले की भक्ति से कहीं ज्यादा अपनी इन हरकतों से झगड़े को हवा देने पर है। हाॅलाकि इस तरह के आयोजनों व धार्मिक मेलो के अवसरों पर अतिरिक्त रूप से चैकन्नी रहने की आदी हो चुकी भारतीय पुलिस व अन्य तमाम सुरक्षा ऐजेन्सियाॅ इन मौको पर अराजकता फैलाने की कोशिशों को अकसर नाकाम कर देती है लेकिन ‘सावधानी हटी तो दुघर्टना घटी’ वाले अन्दाज में इस तरह के समागमों, यात्राओं या अन्य आयोजनों के दौरान भगदड़ की आंशका व अराजकता की सम्भावनाओ से इनकार नही किया जा सकता। इस तरह के अवसरों पर जुटने वाली भीड़ की मानसिकता को समझकर इस समस्या का स्थायी समाधान ढूंढने की आवश्यकता दुनिया के हर देश व धर्म केा है लेकिन हमारे देश में यह समस्या कुछ ज्यादा ही गम्भीर होती दिखाई दे रही है क्योंकि हमने राजनीति और धर्म का ऐसा घालमेल कर दिया है कि अब धर्म के नाम पर दी जाने वाली हर तकरीर व समाज सुधार की बात को राजनीति के चश्में से देखना जरूरी हो गया है। यह ठीक है कि देश की अर्थव्यवस्था में साफ सुनाई दे रही उदारवाद व आधुनिकता की आहट ने परिवार की परिभाषाऐं बदली है तथा मैं, मेरी बीवी और मेरे बच्चे तक सीमित हो चुका वर्तमान दौर का लगभग हर मध्यम वर्गीय भारतीय जब स्वंय या अपने परिवार को कष्टों से घिरा पाता है तो उसे अपने इर्द-गिर्द केाई अन्य सहारा नही दिखाई देता। हालातों से घिरा ऐसा पीड़ित जब धर्म व ईश्वर की शरण में जाने की कोशिश करता है तो यहाॅ धर्म के धन्धेबाज उसे घेर लेते है और मन्दिर से लेकर शमशान तक इतने तरीके के कर्मकाण्ड व आंडबर उसका इन्तजार कर रहे होते है कि वह मजबूरी में हर कर्मकाण्ड की कीमत पैसे से चुकाकर इस दुविधा को पार करने की कोशिश करता है। बस यहीं पर अन्धविश्वास का जन्म होता है और रूढ़ियों व किवदन्तियों में फॅसा आम आदमी ईश्वर को प्रसन्न करने के लिऐ हर उस तौर-तरीके को आजमा लेना चाहता है जिसकी उसने थोड़ी भी चर्चा सुनी हो। हालात के मद्देनजर आध्यात्मिक शान्ति व धर्म की शरण में जाने पर मिलने वाले ज्ञान की बाते पीछे छूट जाती है और विभिन्न आयोजनों के जरियें ईश्वर केा प्रसन्न करने या फिर उससे अपने जाने-अनजाने पापो की क्षमा माॅगने की कवायद धरी की धरी रह जाती है तथा माया के भ्रमजाल में फॅसा साधारण मनुष्य से लेकर ज्ञानी जन तक इस दिखावे में लगा रह जाता है कि किस युक्ति से उसकी व उसके द्वारा किये जाने वाले आयोजनों की चर्चा समाज के ज्यादा से ज्यादा बड़े हिस्से में हो। धर्म के विस्तार व रक्षा के नजरिये से इस तरह की चर्चाओं को कतई गलत भी नहीं माना जा सकता और न ही कोई सरकार या व्यवस्था इस तरह के आयोजनों पर प्रतिबन्ध ही लगा सकती है लेकिन सामाजिक सुरक्षा व भेदभाव वाली नीति पर प्रभावी रोक लगाने के लिऐ कुछ ऐसे इन्तजामात किये जाने जरूरी है जिससे कि अराजक तत्व व स्वार्थी लोगों की जमात इस तरह के आयोजनों से नाजायज फायदा न उठा सके। भारतीय धर्म, संस्कृति एवं हमारी उपासना की पद्धति स्वयं में एक अजब कौतहुल समेटे हुऐ है तथा इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि अगर हम ठीक-ठाक रीति व नीति से प्रभु चरणो का वन्दन करते है तो हमारी तमाम शंकाओ व समस्याओं का स्वतः ही समाधान हो जाता है क्योंकि शान्त मन व चित्त एक आसान राह सुझाने में हमारी मदद करता है। इन हालातों में यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि अगर शान्त मन से प्रभु चरणो में किया गया वन्दन ही हर समस्या का समाधान है तो फिर इसके लिऐ तरह-तरह के ढोल पीटने या फिर सड़को और चैराहो पर जलसो का आयोजन करने का क्या औचित्य। समाज को धार्मिक रूप से जाग्रत व एकजुट करने के लिऐ यह सबकुछ एक हद तक जरूरी हो सकता है लेकिन अगर यह जरूरते हमारे सामान्य जनजीवन को ही प्रभावित करने लगे तो हमें अपने तौर-तरीको पर पुर्नविचार के लिऐ भी तैयार रहना चाहिऐ।

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