Saturday, March 25, 2017

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करि उपाय कुशल बहुतेरे

एक बार फिर दावानल की चपेट में है उत्तराखण्ड के वन क्षेत्र।
पहाड़ो पर ठंड का असर समाप्त भी नही हुआ है और जंगलो के धधकने की खबर आने लगी है। जंगलो की सुरक्षा के लिऐ जिम्मेदार वन विभाग अपनी साधन हीनता या सीमित साधनो का हवाला देते हुऐ स्थितियों को काबू में लेने का प्रयास तो कर रहा है लेकिन उसकी कोशिशों में लाचारी साफ झलक रही है और यह माना जा रहा है कि हर बार की तरह इस बार भी इस दावानल को बुझाने के लिऐ आसमानी बारिश का इन्तजार है। हाॅलाकि प्रदूषण नियन्त्रण व पर्यावरण संरक्षण के लिऐ कई मोर्चो पर प्रयास करने का दावा कर वाले एनजीटी ने अभी तक जंगल की इस आग को लेकर कड़ा रूख नही अपनाया है और न ही हालात इतने खतरनाक हुऐ है कि न्यायालय या अन्य प्राधिकरणों ने इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़े लेकिन फरवरी माह के इस दूसरे पखवाड़े में ही जंगलो की आग को लेकर जो खबरे सामने आ रही है उनके आधार पर यह कहा जा सकता है कि अगर हालातो पर वक्त रहते काबू नही किया गया तो मई-जून में हालात वाकई में भयावह हो सकते है। गर्मी के मौसम में जंगलो में आग लगने का घटनाक्रम उत्तराखण्ड के लिऐ नया नही है और यह माना जाता है कि प्रतिवर्ष होने वाली इस अप्राकृतिक घटना के चलते हजारों हेक्टेयर जंगल व लाखो की तादाद में जंगली जानवरों का नुकसान होता है लेकिन इस तरह की तमाम आपदाओं से लगातार जूझने के बावजूद भी हमारे पास इस तरह की समस्याओं का कोई समाधान नही है और न ही सरकारी स्तर पर इस तरह के संसाधन जुटाने का कोई उपाय किया गया है कि युद्ध स्तर पर कार्यवाही कर इस समस्या का कोई फौरी समाधान ढूढा जा सके। दिहाड़ी मजदूरों व संविदा कर्मियों के भरोसे हरे पेड़ो की टहनियों व अन्य सामान्य किस्म के औजारो से बुझायी जाने वाली उत्तराखण्ड के जंगलो की आग में झुलसकर मरने वाले अथवा घायल वनकर्मियों व स्थानीय निवासियों के ईलाज व मुआवजें का कोई निश्चित प्रबन्ध न होने के चलते अपनी जान पर खेलकर जंगलो को बचाने वाले कर्मचारियों व स्थानीय निवासियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है और स्थानीय स्तर पर जंगलो को अपना देवता मानने वाले ग्रामीणों ने अब जंगलो की ओर रूख करना ही छोड़ दिया है लेकिन वन विभाग के तमाम आला अफसर व नौकरशाह यह मानते है कि जंगलो में आग लगने की असल वजह स्थानीय जनता द्वारा अच्छे चारे व वनोपज को प्राप्त करने का लालच ही है। ऐसा माना जाता है कि जंगलो में होने वाली खार-पतवार और अन्य झाड़ीनुमा पेड़ो को नष्ट कर नई घास पैदा करने के उद्देश्य से जंगलो में लगायी जाने वाली आग को ग्रामीण जनता द्वारा नियोजित कर इसका लाभ उठाने की परम्परा सदियों पुरानी है लेकिन इधर पिछले कुछ दशकों से वनो की सुरक्षा को लेकर बढ़े वन विभाग के प्रभुत्व ने स्थानीय जनता का जंगलो के प्रति मोह भंग कर दिया है और ऐसा प्रतीत होता है कि जंगलो की आग अब स्थानीय स्तर पर ग्रामीण के बेंचेन नही करती। ग्रामीण जनता के हाथो में सदियों तक महफूज रहे वनो को व्यवसायिकता की कुदृष्टि से बचाने के लिऐ उन्हे स्थानीय देवी-देवताओ केा समर्पित करने तथा वनो में कटान या चुगान से सम्बन्धित कोई भी फैसला लेने से पहले वन देवी का आवहन कर उससे अनुमति लेने की परम्परा अब पुरानी हो चुकी है। सरकार द्वारा गठित वन महकमें में लगातार बढ़ रही साहबों की संख्या तथा इससे भी ज्यादा तेजी से बढ़ रही साहबो की आमदनी यह इशारा तो करती है कि वनाच्छादित क्षेत्रफल बढ़ाने तथा जंगली जानवरो को जंगल में ही रोक रहने के लिऐ फलदार वृक्षो की संख्या बढ़ाने के इस खेल में कोई गडबडझाला तो है लेकिन सरकारी कामकाज के मामले में सिर्फ वोट देने तक ही मतलब रखने आम आदमी इन तमाम ताकाझाकियों से दूर रहना चाहता है जिसके चलते पेड़ लगाने ही नही बल्कि जंगलो में आग को बुझाने या जंगलो के इर्द-गिर्द बनी मानव बस्तियों व वन गुर्जरो को हटाने और वनो पर आधारित पर्यटन को बढ़ावा देने जैसे कई तरीकों से सरकारी धन को ठिकाने लगाने के रास्ते ढूढे जाने लगे है। सरकार द्वारा इस बहुमूल्य वन सम्पदा को दावानल से बचाने के लिऐ किये जाने वाले इन्तजामातों का प्रत्येक वर्ष कितना फायदा होता है यह हम सबसे छुपा नही है लेकिन इस बहाने जंगलो में होने वाले सेर-सपाटे व अफसरों की आवाजाही तथा अनियोजित तरीके से बढ़ रहे पर्यटन ने वनो में लगने वाली आग के दौरान पेट्रोल का काम करने वाली पालीथीन को हमारे सुरक्षित वन क्षेत्रो में पहुॅचा दिया है जिस कारण किसी भी जंगल में लगने वाली एक चिंगारी कब शोला बनकर भड़क उठे, कहा नही जा सकता है। इसलिऐं सरकार को चाहिऐ कि वह एक बार फिर प्रकृति की इस अनमोल धरोहर को स्थानीय जनता को सौपने का निश्चय दे और स्थानीय वन उपजो के इस्तेमाल व वन क्षेत्रो की सुरक्षा को लेकर पंचायत स्तर पर जिम्मेदारी सुरक्षित की जाय।

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