कयासो के इस दौर में | Jokhim News

Thursday, August 24, 2017

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कयासो के इस दौर में

भाजपा व काॅग्रेस के अलावा निर्दलीय भी कर रहे है सरकार गठन के परिपेक्ष्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का दावा।

प्रत्याशियों का भाग्य ईवीएम मशीनों में बन्द हो चुका है और समर्थक आॅकड़ो व किवदन्तियों के आधार पर हार-जीत का पूर्वानुमान लगाने में जुटे हुऐ है लेकिन इस सारी कयासबाजी के बीच राज्य के विकास व व्यापक जनहित की बाते पीछे छूट गयी है और कोई भी प्रत्याशी, राजनैतिक दल या खुद को जनता का नुमाइन्दा कहने वाला छुटभैय्या नेता यह चर्चा करने को तैयार नही है कि इस चुनावी मौसम में पकड़ी गयी लाखो करोड़ की अवैध शराब, ड्रग्स या फिर नकद धनराशि पर किस नेता या राजनैतिक दल का स्वामित्व था और चुनाव के बाद इस तरह की तमाम बरामदगियों को लेकर सरकार या प्रशासन क्या कार्यवाही करेगा। लोकतन्त्र के इस महापर्व को नजदीक से जानने की कोशिशों के तहत हमने पाया कि देवभूमि उत्तराखण्ड में चुनाव के दौरान दोनो ही राष्ट्रीय राजनैतिक दलो के बढ़े नेता स्थानीय मुद्दो व जनसमस्याओं से दूर भागते रहे तथा अपने सम्बोधनो के जरिये आम आदमी की नब्ज टटोलने में माहिर माने जाने वाले देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी मतदाता को यह आश्वासन देने में असफल नजर आये कि उसकी छोटी-छोटी समस्याओं का समय रहते निदान किया जायेगा लेकिन इस सबके बावजूद राज्य के चुनावों में बढ़ा मतदान प्रतिशत् यह इशारा करता है कि मतदाता ने सबकुछ पहले से ही तय कर रखा था और उसे अपना निर्णय सुनाने के लिऐ किसी जनसभा, चुनाव प्रसार या फिर अन्य प्रोपेगण्डे की जरूरत नही थी। इस तथ्य से इनकार नही किया जा सकता कि छोटे होते निर्वाचन क्षेत्रो में चुनाव मैदान में उतरने वाले अधिकाॅश प्रत्याशियों की जन्मकुण्डली से जनता अधिकांशतः वाकिफ रहती है तथा चुनावी मौके पर सार्वजनिक किये जाने वाले आय व सम्पत्ति के विवरण ने अधिकांश नेताओ के झूठ की कलई खोलते हुऐ यह साबित कर दिया है कि वह सिर्फ जनसेवा या पद-प्रतिष्ठा के लिऐ ही चुनाव मैदान में नही उतरे है लेकिन इस सबके बावजूद अब तक यह माना जाता था कि चुनावी मौके पर जनता के बीच जाने वाले जनप्रतिनिधि व प्रत्याशी मतदाताओं के बीच शराब व रूपया बाॅटने के अलावा स्थानीय स्तर की छोटी-छोटी समस्याओं पर भी गम्भीर नजर रखते है और चुनावों के मौसम में इन तमाम समस्याओं के समाधान का आश्वासन राजनैतिक मंचो से जनता को दिया जाता है किन्तु इस बार आश्चर्यजनक रूप से तमाम प्रत्याशियों या राजनैतिक दलो द्वारा ऐसा कोई आश्वासन जनता को नही मिला है और शराबखोरी, पहाड़ो से पलायन, मूलभूत सुविधाओं के अभाव व पर्यावरण संरक्षण एवं वन्य जीवो की सुरक्षा को लेकर सख्त होते कानूनो के चलते जनसामान्य को होने वाली परेशानियों  पर देानो ही राष्ट्रीय दलो के बड़े नेता व प्रत्याशी चुप्पी साधे रहे। हाॅलाकि इन तमाम मुद्दो व ज्वलन्त विषयों को उठाने का कुछ निर्दलीय प्रत्याशियों व क्षेत्रीय दलो द्वारा पूरा प्रयास किया गया और जनता ने इन तमाम प्रत्याशियों को मुख्य मुकाबले में ला खड़ा कर इनकी कोशिंशो को सराहने का प्रयास भी किया लेकिन त्रिकोणीय हो चुके चुनाव मुकाबलों के बीच ऐसे कितने चेंहरे विधानसभा पहुचेंगे और सरकार गठन को लेकर इनकी क्या भूमिका होगी, यह अभी निश्चित तौर पर कहा नही जा सकता। यह ठीक है कि मतदान के बाद विभिन्न माध्यमों से छनकार आ रहे सर्वेक्षणों व चुनाव नतीजों के संदर्भ में अनुमानों के आधार पर यह लग रहा है कि दोनों ही राजनैतिक विचारधारा से जुड़े लोग अपनी-अपनी पूर्ण बहुमत वाली सरकार के गठन का दावा कर रहे है और इस स्थिति में निर्दलीय या छोटे दलो के विधायको की भूमिका नगण्य हो सकती है लेकिन असल हकीकत ग्यारह मार्च के बाद ही सामने होगी और चुनाव परिणामों के परिपेक्ष्य में एक नजर डालने के बाद ही इस संदर्भ में कुछ कहना उचित होगा। तब तक मुख्ममंत्री पद के दावेदारों पर एक नजर डालने पर हम पाते है कि हाल-फिलहाल हरीश रावत ही काॅग्रेस के खेमें में मुख्यमंत्री पद के एक मात्र व सशक्त दावेदार होंगे लेकिन काॅग्रेस के चुनाव जीतकर सरकार बनाने की स्थिति में हरीश रावत का राष्ट्रीय राजनीति में कद बढ़ना तय है और इन स्थितियों में काॅग्रेस हाईकमान हरीश रावत को उपयोग लोकसभा चुनावों में करना चाहेगा तो इन्दिरा ह्नदयेश को मुख्यमंत्री पद का ताज मिल सकता है लेकिन अगर काॅग्रेस हाईकमान में अन्दर तक पैठ रखने वाले प्रकाश जोशी भी विधानसभा चुनाव जीतते है तो इन समीकरणों में व्यापक फेरबदल देखने को मिल सकता है। इसके ठीक विपरीत भाजपा खेमें में मुख्यमंत्री पद के दावेदारों की एक लम्बी फेहिस्त है और हर दावेदार का अपना-अपना समीकरण व अपना-अपना चुनावी गणित है लेकिन मोदी व अमित शाह की जोड़ी के अब तक के फैसलो पर नजर डालने पर यह महसूस किया जा रहा है कि सरकार बनाने की स्थिति में भाजपा किसी गैरविवादित व युवा चेहरे को आगे करेगी। हाॅलाकि सतपाल महाराज खुद को मुख्यमंत्री पद का बेहतर दावेदार मानते हुऐ पहली बार राज्य के विधानसभा चुनावों के मैदान में उतरे है और पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल खंडूरी व विजय बहुगुणा ने अपनी दावेदारी सुरक्षित रखने की नीयत से अपने बेटी-बेटे को मैदान में उतारा है लेकिन भाजपा के बढ़े नेताओं ने इस विषय में अभी तक पत्ते नही खोले है और चुनाव नतीजे सामने आने के बाद तात्कालिक परिस्थितियों के आधार पर ही यह सबकुछ तय होने की सम्भावना है। अब देखना यह है कि राज्य की जनता किस राजनैतिक दल को सरकार गठन का जनादेश देती है या फिर कौन सा राजनैतिक दल आधे-अधूरे जनादेश के बावजूद निर्दलीयों के सहयोग से सरकार बनाने में कामयाब रहता है और राज्य की राजनीति में अभी तक निर्णायक भूमिका निभाते रहे निर्दलीय व अन्य छोटे दलो के विधायक इस बार सरकार गठन में क्या भूमिका निभाते है। उपरोक्त के अलावा हाल ही से लगभग एक वर्ष पूर्व काॅग्रेस में हुई बगावत के चलते अंजाम दी गयी सरकार गिराने की असफल साजिश तथा इस साजिश के बाद दल-बदल कर भाजपा में आये तमाम काॅग्रेसी चेहरों को एक बार फिर चुनाव मैदान में उतारकर चुनावी रण जीतने की दिशा में भाजपा द्वारा की गयी किलेबन्दी यह तय करेगी कि आगामी वर्षो में इस राज्य की राजनीति किस दिशा की ओर जायेगी क्योंकि भाजपा द्वारा सत्ता प्राप्त करने की दिशा में किया गया यह प्रयोग अगर सफल रहता है तो सत्ता में बने रहने की चाह में हमारें माननीय दल-बदल के इस तरीके को चुनाव दर चुनाव अमल में लाते रहेंगे लेकिन अगर दल-बदल कर चुनाव मैदान में उतरे बारह पन्द्रह में से अधिकांश चेहरे अपना चुनाव हार जाते है तो इन तमाम नेताओ के राजनैतिक भविष्य पर एक प्रश्नचिन्ह लगने के साथ ही साथ राज्य की राजनीति में इस तरह की उठा-पटक पर भी अघोषित लगाम लगेगी। कुल मिलाकर कहने का तात्पर्य यह है कि उत्तराखण्ड की स्थानीय जनता द्वारा अपने फैसले पर मोहर लगा देने के बाद अब आगे की परिस्थितियाॅ और भी रोमांचक व रोचक हो गयी है तथा इन परिस्थितियों में सिवाय कयासबाजी के हमारे पास और कोई विकल्प भी नही है। इसलिऐं आइये, वक्त का इंतजार करते हुए ईश्वर से प्रार्थना करे कि वह आगे आने वाली सरकारों को व्यापक जनहित में फैसले लेने काबिल व समझदार बनाये।

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