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Thursday, November 23, 2017

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हाँ, मैं एक दलित हूं और मेरा नाम क्या है, इससे कोई बहुत बड़ा फर्क नही पड़ता क्योंकि यह नाम या इससे मिलता-जुलता कोई नाम आपकी बहन, बेटी या मां का हो सकता है लेकिन सिर्फ नाम एक होने या एक जैसा होने से आप मेरी कोई मदद नही करेंगे क्योंकि आप ब्राहमण या क्षत्रीय हो सकते है या फिर आप समाज के उस तथाकथित सम्पन्न वर्ग के हिस्से भी हो सकते है जिनके लिये मेरी जैसी तमाम लड़कियों को शादी का झांसा देकर बहलाना-फुंसलाना और फिर अपनी सम्पन्नता या ऊँची पहुंच की आड़ लेकर कानून की पकड़ से दूर रहना रोजमर्रा का काम है। मैं यह नही मानती कि मेरा दलित होना एक अभिशाप है और न ही मुझे आज तक यह अहसास ही हुआ कि मेरा नीच जात से होना या फिर मेरे पिता का एक दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी होना मेरे आगे बढ़ने की राह में कोई बाधा खड़ी कर सकता है बल्कि यकीन मानिये कि जिन भी लोगो के साथ में पली बढ़ी या जिनके साथ भी मैंने काम किया उन्होंने मुझे कभी यह अहसास ही नहीं होने दिया कि मैं सामाजिक या अर्थिक सम्पन्नता की दृष्टि से उनके मुकाबले किसी भी मोर्चे पर पिछड़ी हुई हूं।

सामाजिक आयोजन हो या धार्मिक पूजापाठ, राजनैतिक सम्मेलन हो या जनमुद्दों पर कोई बहस या आन्दोलन, हर मोर्चे पर अपने सहकर्मियों के साथ कदम से कदम मिलाकर काम करते या उठते-बैठते, मुझे कभी यह अहसास ही नहीं हुआ कि उनमें या मुझमें कोई फर्क है और शायद आज भी मेरे तमाम सहयोगियों व साथियों की इसी भावना के चलते मैं अकेले इतनी बड़ी लड़ाई लड़ने की हिम्मत जुटा पायी हूं। हांलाकि इस लड़ाई को शुरू करने से पहले मेरे कई निकटवर्ती रिश्तेदारों व मुझे नजदीक से जानने वाले प्रबुद्धजनों ने मुझे यह उलाहना दिया कि मैं एक अकेली लड़की इस लंबी लड़ाई व कानूनी दावपेंच का मुकाबला कैसे कंरूगी और सीधे शरीर को बींधने वाली कुत्सित निंगाहों का सामना कर एक अपराधी को सजा दिलाना मेरे लिये कैसे संभव हो पायेगा लेकिन मैंने फैसला किया है कि मैं लडूंगी और जींतूगी भी। इसलिऐं इस लंबी लड़ाई में मुझे आप तमाम जनता जनार्दन के सहयोग व नैतिक समर्थन की आवश्यकता है और इसके लिये मैं आपसे किसी पर्दे के पीछे रहकर बात नही कंरूगी बल्कि मैंने फैसला किया है कि हर मोर्चे पर अपनी पहचान सार्वजनिक करते हुऐ खुलेआम इस व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष कर अपराधी को जेल के सीकचों के पीछे पहुचायें बिना चैन से नहीं बैठूगीं।

हांलाकि मेरे कुछ सहयोगी मेरी पहचान सार्वजनिक करने के पक्ष में नही है लेकिन मेरा मानना है कि अपराध मैंने नही किया जो मुझे मुंह छिपाने की जरूरत हो, इसलिऐं मैं अपनी लड़ाई खुद लड़ते हुऐ झांसी की रानी की तरह मौत को गले लगाना, घुट-घुट कर जीने से कहीं बेहतर समझुगी। अब असल मुद्दे की ओर आते हुऐ मैं आप सभी प्रबुद्धजनों के समक्ष शपथपूर्वक बयान करती हूं कि मैं जो कुछ भी कहुंगी वह सच कहूंगी और इस सच की शुरूवात कुछ इस तरह से है कि एक लोक कलाकार व सामाजिक कार्यकर्ता के रूप मे काम करते हुऐं हाल ही से कोई ढाई-तीन वर्ष पूर्व एक अमित त्रिपाठी नाम का लड़का खुद को मीडिया का फोटोग्राफर बताते हुऐ मेरी जिन्दगी में आया। शुरूवाती मुलाकातों व आपसी बातचीत के बाद हमारी नजदीकियां बढ़ी और जैसा कि हर प्रेम कहानी में होता है ठीक उसी अंदाज में उसने मुझे भी शादी का आश्वासन देकर मेरे साथ शारिरीक संबंध बना लिये। मेरे पास ऐसा एक नहीं बल्कि सैकड़ों सबूत है जो यह साबित करते है कि उसने न सिर्फ मुझे शादी का आश्वासन दिया था।

बल्कि एक जिम्मेदार पति की भूमिका का निर्वहन करते हुऐ वह मेरे आने-जाने तक के प्रबन्ध करते हुऐ लगभग रोज ही मेरे घर तक आता था और मेरे परिवार के लोगों को उसने मौका देखकर अपने घर में बात करने व एक दुल्हन की तरह अपने घर ले जाने का वायदा भी किया था। मैं यह मानती हूं कि यह मेरी गलती थी जो मैंने उसकी बातों में आकर उसे अपना तन व मन समर्पित कर दिया और अगर देखा जाय तो मैं आज उसी गलती की सजा भी भुगत रही हूं लेकिन सवाल यह है कि इस सजा को मैं अकेले क्यों भुगतू । इसी लिए मैंने इस सारे मामले को लेकर कानून की शरण में जाना ज्यादा उचित समझा और दिनांक 16.12.2016 को डीजीपी उत्तराखंड के नाम सम्बोधित एक पत्र के माध्यम से मेरे द्वारा इस सम्पूर्ण मामलें पर विस्तृत रूप से प्रकाश डालते हुऐ शिकायत दर्ज की गयी जिसकी प्रतिलिपि जिलाधिकारी देहरादून, पुलिस महाधिक्षक देहरादून व राज्य महिला आयोग को भी की गयी। उपरोक्त पत्राचार के बाद राज्य महिला आयोग ने तो मेरा मामला संज्ञान में लेते हुऐ इस संदर्भ में एक पत्र वरीष्ठ पुलिस अधीक्षक देहरादून को भेजा किन्तु स्थानीय पुलिस ने मेरे पत्रों को संज्ञान में लेकर कोई कार्यवाही करने की जहमत नही उठायी।

मेरा विश्वास था कि कानून देर-सबेर मेरी मदद जरूर करेगा, इसलिऐं मैंने उपरोक्त मामले में राष्ट्रीय दलित आयोग, महिला आयोग, मानवाधिकार आयोग जैसे संस्थानों में पत्राचार करने के अलावा इस संदर्भ में किसी से भी कोई जिक्र नही किया और मुकदमा दर्ज होने व पुलिस जांच का इंतजार करने लगी लेकिन मेरा विश्वास धीरे-धीरे टूटने लगा क्योंकि पुलिस के तमाम उच्चाधिकारी आरोपी के प्रेस फोटोग्राफर होने के कारण मेरी अर्जी पर तवज्जों देकर ही राजी नही थे और एक लंबे इंतजार के बाद मुझे इस संदर्भ में महिला हेल्पलाईन बुलाया भी गया तो मेरे प्रार्थनापत्र के आधार पर नहीं बल्कि आरोपी द्वारा की गयी शिकायत के आधार पर । हां इतना जरूर है कि इस बीच में उसकी माताजी व अन्य रिश्तेदार कई माध्यमों से दबाव डालकर मुझसे अपने प्रार्थना पत्र वापस लेने की बात करते रहे तथा मुझे यह आश्वासन भी दिया गया कि आरोपी की शादी होने दो उसके बाद यह तुम्हारे भी सम्पर्क में रहेगा व तुमको भी बीवी की तरह ही रखेगा। अफसोसजनक है कि एक सभ्य समाज में मां-बाप व अन्य नजदीकी रिश्तेदार अपने बेटे को रखैल रखने की सलाह दे रहे है और एक महिला दूसरी महिला के खिलाफ जाने के लिये इस हद तक भी गिरने को तैयार है। खैर पुलिस हैल्पलाईन में तमाम सबूत व दस्तावेज दाखिल करने के बाद बड़ी मुश्किल से दिनांक 01.02.2017 को मेरी रिपोर्ट लिखी गयी और मजिस्ट्रेट के समक्ष बयान व मेडिकल जांच के बाद पुलिस फिर चुपचाप बैठ गयी। पूछताछ पर पहले मुझसे कहा गया कि कार्यवाही चल रही है और फिर बताया कि आरोपी उच्च न्यायालय नैनीताल से अपनी गिरफ्तारी के विरूद्ध स्टे ले आया हैं।

इस पूरे मामले को विस्तार से आप सभी प्रबुद्धजनों व सम्मानित जनता के बीच रखने का मुख्य कारण यह है कि मैं न्याय चाहती हूं और कानून के नुमाइन्दे मेरे पूरे मामले को घुमाफिरा कर आरोपी को बचाने में लगे है तथा लोकतंत्र का चैथा स्तम्भ होने का दावा करने वाला मीडिया, आरोपी के हिन्दुस्तान समाचार पत्र से जुड़े होने के कारण इस संदर्भ में किसी भी सच को जनता के सामने नही आने देना चाहता। मेरे कुछ साथियों ने आरोपी की गिरफ्तारी व उस पर हरिजन एक्ट के तहत कार्यवाही किये जाने के संदर्भ में प्रशासन पर दबाव बनाने के लिऐ धरना-प्रदर्शन की अनुमति हेतु दिनांक 09.02.2017 को चुनाव आयुक्त उत्तराखंड (देहरादून) से भी पत्राचार किया किन्तु किसी ने भी हमारी स्थिति, परेशानी व भावनाओं पर तवज्जों नही दी क्योंकि मनुवादी मानसिकता से ग्रसित सारा मीडिया, पुलिस प्रशासन व नौकरशाही एक दलित महिला को ही दोषी मानते हुऐ आरोपी के साथ खड़े थे। मुझे न्याय की तलाश है जबकि स्थानीय पुलिस-प्रशासन आरोपी के पक्ष में है और आरोपी पर बलात्कार का मुकदमा कायम होने के बावजूद वह गलत तथ्यों के आधार पर न्यायालय से गिरफ्तारी के विरूद्ध स्टे लेकर शादी कर दूसरी महिला की जिन्दगी बर्बाद करने की तैयारी कर रहा है।

मैं चाहती हूं कि आरोपी को हरिजन उत्पीड़न जैसी संगीन धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज कर गिरफ्तार किया जाय लेकिन पुलिस मेरे द्वारा दिनांक 16.12.2016 को दिये गये प्रार्थना पत्रों पर कोई कार्यवाही नही कर रही। इन हालातों में मेरे पास जनता की अदालत में आने के सिवा और कोई चारा नहीं है और मैं चाहती हूं कि आप सभी दुख की इस घड़ी में मेरे साथ खड़े हो व आरोपी को जेल भेजने में मेरी मदद करें। मेरी मदद के लिऐ इस सम्पूर्ण घटनाक्रम को प्रचार-प्रसार देना (क्योंकि तमाम बड़े समाचार पत्र इस विषय पर कोई समाचार प्रकाशित नही कर रहे) तथा अपने-अपने स्थानों से दून पुलिस के खिलाफ बयान जारी करना व प्रदर्शन करना मेरे लिऐ मददगार साबित हो सकता है और आप डीजीपी उत्तराखंड (फो.0135-2714656,9411112735), वरीष्ठ पुलिस अधीक्षक (फोन न. 0135-2716203, 9411112706) देहरादून आदि को फोन कर इस मामले की जानकारी प्राप्त करने की कोशिशों के तहत उनपर मानसिक दबाव बनाकर मेरी मदद भी कर सकते है। किसी भी प्रकार की कानूनी मदद, अथवा उपरोक्त संदर्भ में दबाव बनाने के लिऐ आपको किसी भी तरह के तथ्यों, सबूतों या दस्तावेजों की जरूरत महसूस होती है तो कृपया अपना वर्डसअप या ईमेलआईडी hr.gpus@gmail.com पर मैसेज करे।

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