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Friday, November 24, 2017

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हको की लड़ाई में

आरक्षण विरोधी आन्दोलनो का कोई निष्कर्ष न निकलता देख विभिन्न जातिगत् समूहो को आरक्षण की परिधि में शामिल किये जाने की माॅग हुई तेज।
पटेल समुदाय के लिये आरक्षण की माॅग को लेकर आन्दोलन खड़ा करने वाले हार्दिक पटेल उद्धव ठाकरे की शरण में है और खबरों पर अगर पूरी तरह यकीन किया जाय तो गुजरात विधानसभा के चुनावों में हार्दिक को आगे कर मोर्चा खोलने की जुगत लगा रही शिवसेना अपने इस वार से भाजपा व मोदी को दबाव में लेना चाहती है लेकिन सवाल यह है कि क्या हार्दिक भाजपा के राजनैतिक सहयोगी रहे बाला साहेब ठाकरें के सिद्धान्तो पर चलने वाली शिवसेना से तालमेल कायम रख पायेंगे या फिर अपने उपर लगे मुकदमों से निजात पाने कि लिऐ उन्होने फौरी तौर पर यह कदम उठाया है और ठीक चुनावी मौसम में वह एक बार फिर पटेल आरक्षण के मुद्दे को बुलन्द करते हुए अपनी राजनैतिक ताकत का अहसास कराने की कोशिश करेंगे। मूल रूप से आरक्षण विरोधी विचारधारा से सहमत लगने वाले हार्दिक पटेल इस वक्त अपने लिऐ आरक्षण की माॅग कर रहे गुर्जर व जाट समुदायों के भी सीधे सम्पर्क में है और अगर हालातों पर गौर किया जाय तो आर्थिक रूप से सम्पन्न मानी जाने वाली इन तमाम जातियों की समस्याओं भी एक सी ही है क्योंकि जाट व गुर्जर समुदाय के युवा दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में एकाएक ही बड़े जमीनो के भाव के बाद उच्च शिक्षित हो विलासितापूर्ण जीवन जीने के तरीके तो सीख गये है लेकिन नोटो की गर्मी दिखा खरीदी गयी डिग्रियों के मुताबिक इन्हें रोजगार नही मिल पा रहा। अपने पुस्तैनी काम-धंधो व खेती-बाड़ी को पहले ही दाॅव पर लगा चुके इन युवाओं के पास अब सिर्फ सरकारी नौकरी का ही आसरा है और युवाओं की इस ताकत को नजदीकी से परख चुके चतुर राजनेता इनका इस्तेमाल सत्ता की सीढ़ी बनाने में बखूबी कर रहे है। ठीक इसी तर्ज पर व्यवसायिक मानसिकता रखने वाला पटेल समुदाय भी पुस्तैनी काम धन्धो पर छाये मन्दी के दौर के बाद नौकरी को ही जीवनयापन का मुफीद संसाधन समझ रहा है तथा शिक्षा को लेकर जागरूक गुजरात का यह पाटीदार समाज भी अपनी चुनावों को प्रभावित करने में सक्षम जनंसख्या व राजनैतिक पकड़ के बूते अपना हक चाहता है और यह समस्या सिर्फ पाटीदार, गुर्जर या जाट समुदाय की नही है बल्कि अगर सम्पूर्ण राजनैतिक परिपेक्ष्य पर गौर किया जाय तो यह साफ दिखता है कि सवर्णो को आरक्षण दिये जाने या आरक्षण का आधार आर्थिक सम्पन्नता को बनाये जाने जैसे नारो के साथ समाज के अन्य वर्गो में भी खुद को आरक्षण की परिधि में लेने की माॅग उठ रही है तथा स्थानीय स्तर पर तमाम छोट-बड़े नेता अपनी चुनावी जीत सुनिश्चित करने के लिऐ इस तरह की तमाम मांगो के समर्थन में भी खड़े दिखते है लेकिन आरक्षण व्यवस्था के साथ कुछ जाति विशेष के लोगों के जुड़े होने व इस वर्ग को समाज के संगठित वोट बैंक का एक हिस्सा मान लिये जाने के कारण कोई भी राजनैतिक दल या राजनेता संविधान में प्रदत्त आरक्षण की व्यवस्था पर पुर्नविचार करने अथवा समय की आवश्यकतानुसार इसकी व्याख्या करने की हिम्मत नही जुटा पा रहा। यह ठीक है कि पूर्व में आरक्षण विरोधी आन्दोलनों को पर्दे के पीछे से समर्थन देने वाले नेताओं व विचारधारा पर इस समय आरक्षण को लेकर कठोर फैसले लेने का दबाव है और लगातार महंगी हो रही शिक्षा व्यवस्था के साथ ही साथ तेजी से कम हो रहे रोजगार के अवसरों के चलते समाज का एक बड़ा हिस्सा सभी को समान अवसर दिये जाने के पक्ष में भी दिखता है लेकिन पूर्व में हुऐ आरक्षण विरोधी आन्दोलनों का हश्र देखने के बाद अब समाज के ताकतवर समूहो ने अपने सोचने व समझने के तरीके बदल दिये मालुम होते है। हाॅलाकि यह कहा जाना मुश्किल है कि प्रतिवर्ष के हिसाब से करोड़ो रोजगार सृजित करने का दावा करने वाली वर्तमान सरकार अपनी रोजी-रोटी से जुड़े मुद्दो के लिऐ विभिन्न जातिगत् समूह बनाकर सरकारी कामकाज में बाधा पहुॅचाने वाले इन युवा समूहों को कब तक इस तरह उलझाये रखने में कामयाब हो पायेगी लेकिन हालात यह इशारा कर रहे है कि लगातार टालने और अपने राजनैतिक स्वार्थो की पूर्ति के लिऐ युवाओं को भड़काने के इस खेल में देश एक अलग तरह के अन्र्तविरोध में फॅसता जा रहा है। यह ठीक है कि सरकार के पास भी इस तरह की समस्याओं का कोई त्वरित समाधान नही है और न ही कोई राजनैतिक दल या सरकार इस स्थिति में है कि वह एक ही झटके में गरीब व निचले समुदायों को दिये जाने वाले आरक्षण के क्रम में बड़ी तब्दीली कर सके लेकिन इस तरह की समस्याओं को लगातार टाला जाना या फिर इनका अस्थायी समाधान करते हुए अपने राजनैतिक हित तलाशना इस देश को एक अलग तरह के अन्र्तद्धन्द या गृह युद्ध की स्थिति में ले जा रहा है। सरकार को चाहिऐं कि वह शिक्षा के क्षेत्र में कुछ नये प्रयोग करते हुऐ इसे स्वरोजगार से जोड़ने वाली तथा सर्वसुलभ बनाये लेकिन तेजी से निजीकरण की ओर बढ़ रही सरकार इस क्षेत्र को व्यापारियों के लिऐ खोल चुकी है और गुणवत्ता विहीन शिक्षा प्राप्त कर तेजी से बढ़ रही बेरोजगारों की फौज को रोजगार के अवसर दे पाने में नाकाम सरकारें उन्हे बेरोजगारी भत्ते या अन्य तरह की मुफ्तखोरी की ओर ले जा रही है। सरकार अगर चाहती तो निचले स्तर पर छोटे उद्योगों व हस्त शिल्प को बढ़ावा देते हुऐ रोजगार के अवसर तथा उत्पादन बढ़ा सकती थी लेकिन तमाम किस्म की सुविधाऐं व बैंक श्रणो को चन्द उद्योगपति समूहो के दायरे तक सीमित रखने की सोच के साथ आगे बढ़ रही राजनीति से इस तरह की उम्मीदें भी बेमानी है। इन हालातों में कभी अच्छे दिनो तो कभी अच्छी योजनाओ की ओर निहार रहे युवाओ के बगावती तेंवरो का फायदा उठाने वाले जाति विशेष के नेताओ से कुछ उम्मीद करना तो बेमानी है लेकिन निठल्ले बैठे युवा समूहों के पास काम का आभाव उन्हें इन्ही राजनैतिक चरित्रो की गणेश परिक्रमा करने को मजबूर कर रहा है।

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