Saturday, March 25, 2017

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चुनाव दर चुनाव है, अब इंकलाब चाहिऐं

भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं के तहत होने वाले चुनावों के तौर तरीके में महसूस की जा रही है व्यापक फेरबदल की जरूरत।
जैसा कि हमने पूर्व में भी चिन्ता व्यक्त की थी कि उत्तराखण्ड जैसे छोटे प्रदेशो में सिर्फ वोट काटने के लिऐ अथवा किसी प्रत्याशी विशेष के समीकरण बिगाड़ने के लिऐ चुनाव मैदान में उतरने वाले बसपा समेत तमाम अन्य छोटे दलो के या फिर निर्दलीय प्रत्याशी कानूनी प्रक्रिया के तहत बिल्कुल सही होने के बावजूद भी लोकतन्त्र को नुकसान पहुंचा रहे है और चुनाव मैदान में प्रत्याशियों की एक बड़ी संख्या के कारण सिर्फ पन्द्रह से बीस फीसदी तक मत हासिल करने वाले प्रत्याशी की चुनावी जीत सुनिश्चित मानी जाने के कारण पेशावराना अन्दाज में चुनाव लड़ने वाले नेताओं ने अपनी सोच का दायरा छोटा कर लिया है। हालाँकि लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं के तहत इस सब में एक बड़ा बदलाव लाये बिना व्यवस्थाओं में सुधार सम्भव नही है और न ही कोई सरकारी फैसला या न्यायालय किसी भी सामान्य नागरिक को चुनाव लड़ने से रोक सकता है लेकिन अगर हम चाहे तो एकजुटता के साथ तमाम निर्दलीय व छोटे दलो के अलावा राष्ट्रीय राजनैतिक दलो से भी चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों से उनके विज़न, चुनाव लड़ने के कारण, प्राथमिकताओं तथा सम्पत्ति व चुनावी खर्च से जुड़े सवाल सार्वजनिक मंचो से पूछकर उन्हें चुनाव लड़ने से हतोत्साहित कर सकते है। हमारे कीमती समर्थन के लिऐ जनता के बीच आने वाले प्रत्याशी से यह जरूर पूछा जाना चाहिऐं कि अपने निजी जीवन में उसे ऐसी क्या अनुभूतिया व अनुभव है जिसके कारण उसे लगता है कि वह समाजसेवा के लिऐ बिल्कुल उपयुक्त व्यक्ति है या फिर चुनावी राजनीति में आने से पूर्व अथवा इसके साथ-साथ उसने समाजिक क्षेत्र में ऐसे क्या काम किये है जो उसे यह लगता है कि जनता उसे अपना नेता चुन लेगी और चुनाव जीतने के बाद वह पहले वाले जनप्रतिनिधि से बेहतर काम कर पायेगा। कितना आश्चर्यजनक है कि ‘भेड़िया दसान’ सी हो चुकी राजनीति के इस दौर में राजनेता या राजनैतिक दल एक मंच से आता है और अपने रटे-रटाये जुमलो में कुछ बातें कहना शुरू कर देता है लेकिन उसे इतनी फुर्सत नही होती कि वह जनता से जुड़े या फिर जनता की ओर से आने वाले सवालों का जवाब दे सके या फिर उसके पास जनता के सवालो का जवाब ही नही होता। इन दोनो ही स्थितियों में जनता की मजबूरी होती है कि वह अपने मन की बात या अपनी इच्छा से घोषणाऐं करने वाले राजनैतिक दलो में से किसी एक के पक्ष में मतदान करें या फिर इनमें से कोई नही (नोटा) का बटन दबाकर खुद को तटस्थ घोषित करे लेकिन दोनो ही स्थितियों में उसके पास ऐसी कोई ताकत नही होती कि वह गलत प्रत्याशी को चुनकर आने से रोक सके या फिर एक बार चुने हुऐ प्रत्याशी की कारगुजारियों के खिलाफ अगले चुनाव से पहले कुछ भी अच्छा-बुरा बोल सके। प्रत्याशी और चुने जाने के बाद जनप्रतिनिधि हर मौके पर इन्हीं तमाम छूटो का फायदा उठाते दिखते है और स्थानीय स्तर पर जनता के हितों की रक्षा का बड़ा दायित्व होने के बावजूद भी इन नेताओ को उनकी किसी भी कमी या गलती के लिऐ जिम्मेदार नही ठहराया जा सकता। हो सकता है कि हमारे संविधान निर्माताओं को लगा हो कि राजनीति में जिस तरह के लोग आने चाहिऐ उन्हें अपनी जिम्मेदारियों व दायित्वों का गहराई से अहसास होगा और वह अपनी सेवाभावना के बलबूते ही चुनाव लड़ने जैसा बड़ा कदम उठाकर इस महती जिम्मेदारी का निर्वहन करने को तैयार होंगे लेकिन हालात बता रहे है कि वर्तमान में चुनाव जीतना और सरकार चलाना ही नही बल्कि चुनाव लड़ना भी एक व्यवसाय हो गया है तथा राजनीति के इस खेल में खिलाड़ियों ने सत्ता के शीर्ष पदो पर अपनी कब्जेदारी बनाये रखने के लिऐ इतने किन्तु-परन्तु खड़े कर दिये है कि सेवाभावना, जनकल्याण या फिर जनसामान्य का हित जैसी तमाम बाते बेमानी हो गयी है। जनता की अदालत में चुनावी हार-जीत के लिऐ हाजिरी लगाने वाले नेता चुनाव जीतने के बाद जनहित या क्षेत्र की आवाज के नाम पर खुद को मन्त्री बनाये जाने या फिर संसाधन व सुरक्षा मुहैया करवाये जाने की बात शुरूवात कर देते है तथा जनापेक्षाओं को पूरा करने व विकास कार्याे के नाम पर ठेकेदारो की भीड़ नेताजी के इर्द-गिर्द जुटनी शुरू हो जाती है लेकिन संगठन अथवा नेताजी की नीतियों से प्रभावित होकर चुनाव दर चुनाव नेताजी या पार्टी का झण्डा ढोने वाला आम कार्यकर्ता जहाँ का तहाँ ही नजर आता है। हालाँकि लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं के तहत जनसमस्याओं पर नेताजी की निगाहबन्दी के लिऐ जनता को अपनी चुनी हुई सरकार या नुमाइन्दो से मिलने, उनके सम्मुख अपनी बात रखने तथा सुनवाई न होने पर शान्तिपूर्वक तरीके से विरोध प्रदर्शन करने के अधिकार दिये गये है तथा अपनी चुनावी जीत को बरकरार रखने के लिऐ लगभग सभी जनप्रतिनिधि अपने निर्वाचन क्षेत्र की जनता पर विशेष तवज्जो भी देते है लेकिन चुनावी जीत के बाद इन तमाम जनप्रतिनिधियों को सोच का दायरा सीमित हो जाता है और अपने व्यक्तिगत् हितो को ध्यान में रखते हुऐ वह उसी पन्द्रह-बीस फीसदी जनता की बात सुनता है जो कि चुनावों के दौरान उसके निकट सम्पर्को में रही होती है। जनप्रतिनिधि ही चुनी हुई सरकार का मन्त्री बनता है तथा शासन व सत्ता के अन्य तमाम जिम्मेदार पदो का दायित्व भी उसी के पास होता है लेकिन इस सिकुड़ती सोच के साथ सरकार की कमान सम्भालने वाले मन्त्री व विधायक अपने पद के साथ न्याय नही कर पाते और उनके अधीनस्थ विभागो की तमाम योजनाओ में से अधिकतम् का बजट उनकी विधानसभा की ओर ही दिखाई देता है जिसके कारण राज्य सरकार द्वारा विकास की मद में ठीक-ठाक खर्च होने के बावजूद भी ढांचा अनियोजित ही दिखाई देता है। उपरोक्त के अलावा अपने विधानसभा क्षेत्रो तक ही सीमित होते जा रहे सरकार के मन्त्री व अन्य जनप्रतिनिधि राष्ट्रीय राजनीति में राज्य के योगदान को भी कम करते प्रतीत हो रहे है तथा चुनाव मैदान में उतरने के इच्छुक दावेदारों की एक अच्छी खासी सूची हर राजनैतिक दल के पास होने के बावजूद भी हमारे पास ऐसे नेताओ का अभाव होता जा रहा है जो सम्पूर्ण प्रदेश या फिर देश के एक बड़े हिस्से में अपना असर रखते हो। नतीजतन चुनावी मोर्चे पर भीड़ इक्कट्ठी करने के लिऐ हमें फिल्मी हस्तियों या फिर नामचीन खिलाड़ियों की दरकार होती है और राज्य के चुनावों में जनता के सामने रखने को हमारे पास कोई सर्वसम्भत चेहरा नही होता। कितना आश्चर्यजनक है कि खुद को राष्ट्रीय राजनैतिक दल कहने वाले कई राजनैतिक संगठन चुनावों के मौसम में अपने विपक्षी संगठनो में तोड़फोड़ कर चुनाव लड़ने के लिऐ जिताऊ चेहरा तलाशते नजर आते है और चुनावी हार-जीत को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना देश के प्रधानमंत्री भी हल्के व चलताऊ किस्म के बयान देने को मजबूर हो जाते है। यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या कोई चुनाव आयोग या फिर आचारसंहिता इन व्यवस्थाओं में सुधार ला सकती है या फिर अब समय आ गया है कि भारत के नीतिनियन्त्रओं ने चुनावों की वर्तमान लोकतान्त्रिक प्रणाली को आवश्यकताओं की कसौटी में कसना होगा।

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