Friday, March 24, 2017

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जो जीता वही सिकन्दर

दिलचस्प होते जा रहे चुनावी मुकाबले में भाजपा व काॅग्रेस ने झौकी पूरी ताकत।
चरमोत्कर्ष पर पहुॅच चुके चुनाव प्रचार के बीच चुनावी हार-जीत का गणित लगभग स्पष्ट होता दिख रहा है तथा उत्तराखण्ड के राजनैतिक हालात यह इशारा कर रहे है कि निर्दलीयों की एक बड़ी जमात के साथ विधानसभा पहुॅच रहे कुछ नामाचीन चेहरे आगामी सरकार के गठन को लेकर सत्तापक्ष की मुश्किलें बढ़ा सकते है। अगर अपनी बात की शुरूवात सुदूरवर्ती पर्वतीय आंचल से करे तो पृथक राज्य की पैरोकार विचारधारा के लिऐ यह सन्तोषजनक पहलू हो सकता है कि भाजपा की अन्दरूनी लड़ाई के चक्कर में उक्रांद के शीर्ष नेता काशी सिंह ऐरी जीत के नजदीक दिख रहे है और अगर हालातों में कोई बड़ा उलटफेर नही हुआ तो अपनी सीमित संख्या के बावजूद उक्रंाद इस बार भी सरकार बनाने में अहम् भूमिका निभाते हुऐ सत्ता के शीर्ष पदो को हासिल कर सकता है लेकिन सत्ता हासिल करने के बाद काशी सिंह ऐरी के समक्ष उक्रांद के तमाम खेंमो को एक साथ जोड़कर चलने व सरकार को उक्रंाद की नीतियों व सिद्धान्तो को मानने के लिऐ मजबूर करने की जिम्मेदारी होगी। अब देखना यह है कि मौका मिलने पर काशी सिह ऐरी इस जिम्मेदारी को कितनी सक्रियता व तत्परता से उठा पाते है क्योंकि वह भाजपा के एक बड़े व कद्दावर नेता को चुनाव हराकर ही विधानसभा पहुॅचने में सफल होंगे और जीतने के बाद उनके कन्धो पर यूकेडी को एकजुट रखने के अलावा स्थानीय जनता की जनापेक्षाओं पर खरा उतरने की जिम्मेदारी भी होगी। ठीक इसी क्रम में उन्हीं के खेमे के नेता माने जाने वाले उक्राद के वर्तमान अध्यक्ष पुष्पेश त्रिपाठी की बात करें तो यह स्पष्ट दिखता है कि शुरूवाती दौर में आगे माने जा रहे पुष्पेश इस बार भी वर्तमान विधायक मदन बिष्ट से पिछड़ सकते है और यह आश्चर्यजनक रूप से देखा जा रहा है कि मदन बिष्ट की विरोधी मानी जाने वाली काॅग्रेस की हरीश रावत लाॅबी इस बार जीजान से मदन बिष्ट के प्रचार में जुटी है जिस कारण भाजपा के उम्मीदवार महेश नेगी शुरूवाती दौर से ही तीसरे स्थान के लिऐ संघर्ष कर रहे है। पूर्व में दिल्ली विश्व विद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके मदन सिह बिष्ट कि छवि एक दंबग नेता वाली रही है और काॅग्रेस में हुई बगावत के दौरान पूरी शिद्धत के साथ हरीश रावत सरकार के पीछे खड़े रहने के कारण सिर्फ उनके क्षेत्र की जनता ही नही बल्कि पूरे उत्तराखण्ड की जनता उन्हें एक मजबूत नेता मानती है लेकिन स्थानीय बढ़ी-बूढ़ी महिलाओं को मदन में अपना बेटा व युवाओ को उनमें बड़ा भाई नजर आता है क्योंकि स्थानीय तीज-त्योहारों या फिर छोटे-बड़े आयोजनों के अवसर पर मदन सिह बिष्ट एक विधायक या नेता के रूप में नही बल्कि सामाजिक सरोकारों से जुड़े आधार स्तम्भ के रूप में इस क्षेत्र की जनता के सुख-दुख में शामिल रहे है और उनकी यही योग्यता उन्हें दोबारा विधायक पद का प्रबल दावेदार बनाती है। जनता के बीच चर्चा है कि अगर काॅग्रेस दोबारा सत्ता में लौटती है तो मदन सिंह बिष्ट शार्तिया मन्त्री होंगे जबकि यूकेडी के पुष्पेश को निर्दलीयों के समर्थन की दरकार के बावजूद मन्त्री शायद न भी बनाया जाय क्योंकि उनकी पार्टी के वरीष्ठ नेता काशी सिह ऐरी की चुनावी जीत शर्तिया तय लगने के चलते ऐरी की दावेदारी मजबूत है। हाॅलाकि द्वाराहाट सीट से बसपा के ग्रीस चैधरी समेत चार अन्य निर्दलीय उम्मीदवार मैदान में है लेकिन असल चुनावी मुकाबला पुष्पेश त्रिपाठी व मदन बिष्ट के बीच ही माना जा रहा है और इस बार मदन आश्चर्यजनक रूप से मजबूत लग रहे है क्यांेकि क्षेत्र में उनकी विरोधी लाॅबी सक्रिय नही है। अब अगर अल्मोड़ा जिले के अन्य विधानसभा क्षेत्रो को बात करे तो सबसे पहले हमारी नजर रानीखेत पर जा टिकती है जहाॅ भाजपा के प्रत्याशी अजय भट्ट पूरी तैयारियों के साथ चुनाव मैदान में डटे हुऐ है लेकिन उन्ही की पार्टी के विद्रोही उम्मीदवार डाॅ. प्रमोद नैनवाल ने उनकी मुश्किलें बढ़ा रखी है तथा संगठन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी के अलावा नेता प्रतिपक्ष का ओहदा होने के बावजूद भी अजय भट्ट रानीखेत छोड़ने की स्थिति में नहीं है। हाॅलाकि उनके मुख्य प्रतिद्वन्दी के रूप में करन मेहरा अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि व क्षेत्रीय समीकरणों के आधार पर स्वाभाविक रूप से ही मजबूत नजर आ रहे है और प्रदेश के मुखिया हरीश रावत से उनके पारिवारिक रिश्ते उन्हें स्वाभाविक मजबूती भी प्रदान कर रहे है क्योंकि इसी विधानसभा क्षेत्र के तहत भिकियासैण में मुख्यमंत्री का प्रेतृक गाॅव भी है। काॅग्रेस के अलावा यूकेडी के प्रताप शाही व बसपा के कृपाल राम भी इस विधानसभा क्षेत्र में अपना दाॅव खेलने की कोशिश कर रहे है लेकिन मुख्य मुकाबला भाजपा व काॅग्रेस के बीच ही बताया जा रहा है। अब अगर हम अल्मोड़ा जिले के एक अन्य महत्वपूर्ण विधानसभा क्षेत्र जागेश्वर की बात करें तो यहाॅ वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष गोविन्द सिह कुंजवाल मैदान में है जबकि भाजपा ने अल्मोड़ा के छात्र संघ अध्यक्ष रह चुके सुभाष पाण्डे को मैदान में उतारा है। पूर्व में यूकेडी के बेनर तले चुनाव लड़ चुके सुभाष पाण्डे जमीनी संघर्षो से जुड़े हुऐ नेता है तथा स्थानीय स्तर पर जनसंघर्षो का उनका अपना इतिहास रहा है लेकिन उनका मुकाबला गाॅधीवादी नेता माने जाने वाले कुंजवाल से है और अपने इन पाॅच वर्षो के कार्यकाल के दौरान कुंजवाल ने स्थानीय स्तर पर इतने काम करा दिये है कि साधारण तौर-तरीकों से उनपर पार पाना आसान नही है। यूं तो इस सीट पर यूकेडी ने महेन्द्र सिह रावत को मैदान में उतारा है और बसपा से तारादत्त पाण्डे भी चुनाव लड़ रहे है लेकिन यूकेडी के कुछ कार्यकर्ताओ के बीच सुभाष पाण्डे अभी भी लोकप्रिय है और अगर उन्हे भाजपा के कार्यकर्ताओ का ठीक-ठाक सहयोग मिल जाता है तो वह कुंजवाल की मुसीबतें बढ़ा सकते है। इसी क्रम में एक अन्य महत्वपूर्ण विधानसभा क्षेत्र सल्ट की बात करने पर हम पाते है कि वर्तमान विधायक सुरेन्द्र सिह जीना इस विधानसभा क्षेत्र से मजबूत उम्मीदवार है तथा काॅग्रेस के दिग्गज नेता रंजीत रावत की कर्मस्थली होने के बावजूद रंजीत का सल्ट के स्थान पर रामनगर से चुनाव लड़ना कुछ खटकता भी है। इस क्षेत्र में काॅग्रेस ने तेज तर्रार नेत्री व ब्लाक प्रमुख गंगा पंचोली को मैदान में उतारा है जबकि बसपा की ओर से भोले शंकर, यूकेडी से गंगा देवी तथा उपपा से नारायण सिह के अलावा पाॅच अन्य निर्दलीय भी यहाॅ मैदान में है। प्रदेश के मुखिया हरीश रावत के अलावा भाजपा की ओर से भगत सिह कोश्यारी व अजय टम्टा भी इन विधानसभा क्षेत्रो में नजदीकी से नजर रखें हुऐ है तथा यूकेडी भी अपने सिमटते हुऐ जनाधार को बचाये रखने के लिऐ यहाॅ मजबूती से प्रदर्शन करने के मूड में दिख रही है। अब यह तो वक्त ही बतायेगा कि सत्ता का ऊॅट किस करवट बैठेगा लेकिन आने वाले दिनो में चुनावी मुकाबला पूरी तरह दिलचस्प होने की उम्मीद है।

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