Thursday, April 27, 2017

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हाथी की धमक के बावजूद

उत्तराखण्ड के राजनैतिक क्षितिज पर न जाने क्यों विलुप्त होते दिख रहे है बसपा के पूर्व विधायक व मजबूत प्रत्याशी।
उत्तराखण्ड की राजनीति में काॅग्रेस और भाजपा के बाद बहुजन समाज पार्टी को भी एक मजबूत राजनैतिक दल माना जाता है तथा राज्य में अब तक हो चुके लगभग सभी विधानसभा व लोकसभा चुनावों के अलावा तमाम उपचुनावों में भी बसपा की बराबर भागीदारी रही है लेकिन अगर चुनाव दर चुनाव कम हो रही बसपा की ताकत पर गौर करें तो ऐसा लगता है कि राज्य की अधिकांश विधानसभा सीटो पर प्रायोजित तरीके से चुनाव लड़ने वाले इस क्षेत्रीय दल का उपयोग तमाम नेता अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिऐ करते है और एक विशेष रणनीति के तहत व बसपा के बेनर तले ऐसे चेहरों को चुनाव लड़वाया जाता है जो जातिगत् या सामाजिक आॅकड़ो के आधार पर चुनावी दृष्टि से मजबूत माने जा रहे प्रत्याशी के वोट काटने की रणनीति को सफल बना सके। हाॅलाकि कुछ लोगो ने बसपा में रहते हुऐ अच्छा प्रदर्शन किया है और उत्तराखण्ड की राजनीति के लिऐ मुफीद माने जाने वाले गठबन्धन सरकारों के दौर में बसपा के बेनर तले चुनाव जीते विधायको को मन्त्री भी बनाया गया है लेकिन अधिकांश मामलो में यह देखा गया है कि चुनावी मुकाबलों में कड़ी टक्कर देने वाले बसपा के प्रत्याशियों को काॅग्रेस या भाजपा द्वारा कम ही पसन्द किया जाता है जबकि रस्मअदायगी के तौर पर चुनाव लड़कर किसी मजबूत प्रत्याशी को थोड़ा कम-ज्यादा नुकसान पहुॅचा रहे प्रत्याशियों पर अपनी सुविधा के अनुसार दोनों ही राजनैतिक दल तवज्जों देते है। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि बसपा की ओर से अपने प्रत्याशी को चुनाव लड़ने के लिऐ कोई अंशदान नही दिया जाता और संगठन की स्टार प्रचारक के रूप में मायावती की कोई सभा या मीटिंग रखवाने की स्थिति में तमाम तरह के खर्चों को भी वहन करना पड़ता है लेकिन इस सबके बावजूद बसपा के पास प्रदेश की लगभग सभी सीटो पर चुनाव लड़ने के लिऐ चेहरों की कमी नही है और यह अपने आप में एक आश्चर्यजनक कर देने वाला तथ्य हो सकता है क्योंकि राज्य की अधिकांश विधानसभा सीटो पर जातिगत् समीकरण भी ऐसे नही है जो यह माना जाय कि इन सीटो पर चुनाव लड़ना किसी भी प्रत्याशी के लिऐ घाटे का सौदा नही है। अगर पिछले चुनावी आॅकड़ो पर गौर करे तो यह स्पष्ट दिखता है कि ऐसे विधानसभा क्षेत्र बहुत कम है जहाॅ बसपा पिछले दो-तीन विधानसभा चुनावों के दौरान लगातार दूसरे या तीसरे नम्बर पर रही हो और उसपर भी तुर्रा यह है कि मजबूत प्रत्याशियों ने दूसरी या तीसरी बार खुद भी बसपा से चुनाव लड़ना पसन्द नही किया है जिस कारण प्रत्याशी बदलते ही बसपा को पड़ने वाले मतो का प्रतिशत् तेजी से गिरा है। इसके अलावा यह तथ्य भी काबिलेगौर है कि स्थानीय स्तर पर मजबूत नजर आने वाले बसपा प्रत्याशी पर हाईकमान की भी कोई तवज्जों नही है और न ही बसपा में चुनाव में किये गये प्रदर्शन के आधार पर संगठन स्तर पर दायित्व दिये जाने या प्रदेश में संगठन को मजबूत करने का प्रावधान है। कुल मिलाकर देखा जाए तो हम यह पाते है कि राज्य गठन के बाद प्रदेश मे तेजी से अपना जनाधार खोती जा रही बसपा का चुनावी गणित कुछ अटपटा सा है और इसके बेनर तले चुनाव लड़ने वाले अधिकांश प्रत्याशियों को अपनी जीत से कहीं ज्यादा उत्सुकता दूसरे दल के प्रत्याशी की हार में है। अगर बसपा के इतिहास पर गौर करें तो हम पाते है कि उत्तराखण्ड राज्य के अस्तित्व में आने से पहले ही दो नये पहाड़ी जिले चम्पावत और बागेश्वर गठित कर पहाड़ की राजनीति में धमक देने वाली मायावती के दौर में जिला पंचायत अध्यक्ष अल्मोड़ा रहे जवाहर सिह परिहार बसपा के एक मजबूत नेता माने जाते थे। उस दौर में मायावती के क्षेत्र में आगमन पर उनका स्वागत् सोने के मुकुट से करने वाले परिहार की वर्तमान दौर में राजनीति में ही कोई बिसात नही है। ठीक इसी तरह दो बार सितारगंज विधानसभा क्षेत्र के विधायक रह चुके नारायण पाल तथा पिछले विधानसभा चुनावों में भीमताल विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के प्रत्याशी को कड़ी टक्कर देने वाले उनके बड़े भाई मोहन पाल का अब राजनीति के मैदान में कोई पता नही चल रहा है और इसी क्रम में बसपा के अन्य पूर्व विधायको को भी रखकर देखे तो वह यातो राजनीति से विलुप्त है या फिर काॅग्रेस के बेनर तले चुनाव लड़ रहे है। हालातों के मद्देनजर यह शक गहराता है कि बसपा के शीर्ष नेतृत्व द्वारा बार-बार प्रत्याशियों को बदला जाना या फिर विपक्षी प्रत्याशी को कड़ी टक्कर देने वाले प्रत्याशी को दोबारा मैदान में न उतारना कहीं एक रणनीति का हिस्सा तो नही है और अपने कुछ छिपे हुऐ उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिऐ बसपा का शीर्ष नेतृत्व या फिर कोई अन्य राजनैतिक दल मतदाताओं का बेवकूफ तो न ही बना रहा है। काबिलेगौर है कि उत्तराखण्ड के पर्वतीय अंचलो में काॅग्रेस का स्थायी वोट बैंक माना जाने वाला दलित व मुस्लिम वर्ग का मतदाता कई विधानसभा सीटो पर भाजपा की हार का स्थायी कारण दिखता है लेकिन इधर राज्य गठन के बाद छोटे हुऐ विधानसभा क्षेत्रो में अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद न होने के बावजूद भी बसपा के बेनर तले चुनाव लड़कर वोट काटने की प्रक्रिया को पूरा करने की कोशिशों के तहत कुछ प्रत्याशी भाजपा को जिताने के लिऐ ही मैदान में खड़े मालुम होते है। हाॅलाकि इधर पिछले कुछ समय से दलित व मुस्लिम वर्ग के मतदाताओं की सोच में भी बदलाव आता दिख रहा है और वह जातिगत् समीकरणों या धार्मिक आधार पर लामबन्द होने की जगह प्रत्याशी के गुण-दोष के आधार पर मतदान करने लगे है लेकिन इससे समीकरणो के आधार पर चुनावी हार-जीत तय करने की प्रक्रिया में कोई फर्क आता नही दिख रहा है और कुछ राजनैतिक दल पूरी सूझ-बूझ के साथ पारदर्शी व स्वच्छ समझी जाने वाली भारतीय लोकतन्त्र की इस चुनावी प्रक्रिया से खिलवाड़ करते प्रतीत हो रहे है। एक जागरूक मतदाता होने के नाते हमारा कर्तव्य बनता है कि हम इस तरह की साजिशों को बेनकाब करें और एक स्थायी वोट बैंक जैसे जुमलोे के साथ चुनावी जीत की बात करने वाले बसपा जैसे तमाम दलो के प्रत्याशियों से यह तहकीकात जरूर करें कि आखिर स्थानीय दलित व मुस्लिम परिवारों को उनका ही वोट बैंक क्यों मान लिया जाय।

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